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बस्तर का गोंचा/रथ महापर्व: भारतीय संस्कृति की देव यात्रा (जातरा) का प्रतीक

बस्तर का गोंचा/रथ महापर्व:  भारतीय संस्कृति की देव यात्रा (जातरा) का प्रतीक

क्या आप जानते है बस्तर में रथ यात्रा का नाम गोंचा पर्व कैसे पड़ा? गुंडीचा शब्द, जो भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथयात्रा का अभिन्न हिस्सा है।भारत की सांस्कृतिक धारा में कुछ शब्द केवल ध्वनि नहीं होते, वे इतिहास, आस्था और परंपरा के सेतु बन जाते हैं।

'गुंडीचा' जो ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथयात्रा का अभिन्न हिस्सा है। पुरी की जगन्नाथ यात्रा में जब भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र अपने भव्य रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हैं, तब उनका गंतव्य स्थान होता है- गुंडीचा मंदिर। लोकविश्वास के अनुसार, गुंडीचा देवी, भगवान जगन्नाथ की मौसी हैं, और यह यात्रा वस्तुतः प्रभु का अपनी मौसी के घर आगमन है। गुंडीचा मंदिर में भगवान कुछ दिनों तक विश्राम करते हैं, फिर पुनः मुख्य मंदिर में लौटते हैं। यह केवल यात्रा नहीं, वरन् देवत्व और जनमानस के स्नेह का जीवंत पर्व है।


गुंडीचा मंदिर,पुरी ओडिशा 

यह परंपरा छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में भी देखने को मिलती है। यहाँ की रथयात्रा को 'गोंचा पर्व' कहा जाता है, जो विद्वानों के अनुसार 'गुंडीचा' शब्द का लोक रूपांतरण है। बस्तर की बोली, उच्चारण की सहजता और जनजीवन की सरलता ने 'गुंडीचा' को 'गोंचा' में ढाल दिया। किंतु शब्द का मर्म आज भी अक्षुण्ण है।

इस पर्व के नामकरण के विषय में यह बात भी ध्यान लाती है, भगवान जगन्नाथ जब रथयात्रा में निकलते हैं, तो कहा जाता है वे अपनी मौसी के घर 'गुड़ी' (मंदिरों को बस्तर में देव गुड़ी कहा जाता है) जा रहे हैं।यह पर्व वास्तव में गुड़ी जाने की यात्रा है। यही 'गुड़ी जा' बोलचाल में 'गुड़ीचा' बना और बस्तर में 'गुड़ीचा' का लोक-रूप 'गोंचा' बन गया।
बस्तर के रथ यात्रा में आपको तुपकी चलाने की अनोखी परंपरा, पेंग की मार, गजामूंग प्रसाद और लोक मान्यताएँ देखने को मिलती है। ऐसा नहीं था कि राजा पुरुषोत्तम देव के पूर्व जगन्नाथ की मान्यताएं बस्तर में विद्यमान नहीं थीं। जगन्नाथ प्रभु की कीर्ति और यश चारों दिशाओं में फैली हुई थी। बस्तर के तत्कालीन राजा पुरुषोत्तम देव पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर तक दंडवत करते हुए पहुंचे थे।  राजा पुरुषोत्तम देव की भक्ति और श्रद्धा से प्रसन्न होकर पुरी के पुजारियों ने उन्हें ‘रथपति’ की उपाधि प्रदान की थी। साथ ही, उन्हें भगवान जगन्नाथ का 16 पहियों वाला विशाल रथ भी भेंट किया गया। लेकिन उस विशाल रथ को तेजी से बस्तर तक लाना संभव नहीं था, इसलिए राजा ने उसे तीन हिस्सों में विभाजित कर दिया एक रथ 8 पहियों का और दो रथ 4-4 पहियों के बनाए गए।

                            

इन्हीं रथों में से एक 4 पहियों वाला रथ, बस्तर में गोंचा पर्व के लिए समर्पित किया गया।  राजा पुरुषोत्तम देव अपने साथ पुरी से आरण्यक ब्राह्मण समाज के लोगों को भी बस्तर लाए, जिन्होंने यहां भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र के 22 देव विग्रहों की स्थापना की। प्रारंभ में जगदलपुर में एक कच्चे मंदिर में जगन्नाथ जी की पूजा होती थी। लेकिन कुछ वर्षों बाद मंदिर में आग लगने से वह नष्ट हो गया। इसके बाद लोगों ने राजा से आग्रह कर सिरहासार भवन के पास पक्का मंदिर बनवाया। इसी मंदिर में आज भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र के 22 देव विग्रह प्रतिष्ठित हैं।


जगन्नाथ मंदिर, जगदलपुर

बस्तर रियासत में एक समय 7 रथों की परिक्रमा निकाली जाती थी, जिनमें 6 रथों में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह रहते थे, जबकि 7वें रथ में भगवान रामचंद्र का विग्रह रखा जाता था। वर्तमान में परिक्रमा में 3 रथ ही निकाले जाते हैं। गोंचा पर्व में तुपकी चलाने की परंपरा। तुपकी एक देसी बंदूक की तरह होती है, जिसे बांस, ताड़ के पत्ते, रंगीन कागजों और लकड़ी से तैयार किया जाता है। दरभा इलाके में बांस की बहुलता के कारण, मुख्यतः धुरवा जनजाति के लोग तुपकी निर्माण में पारंगत हैं। तुपकी में गोलियों के रूप में इस्तेमाल होती है पेंग या पेंगु, जो एक जंगली लता मालकांगिनी का फल है।
पेंग का प्रयोग केवल खेल तक सीमित नहीं, इसका औषधीय महत्व भी है। इससे निकाले गए तेल को जोड़ों के दर्द, गठिया और वात-रोग में अचूक माना जाता है। लोक मान्यता है कि गोंचा स्थल पर तुपकी की मार पड़ने से शरीर की व्याधियाँ दूर होती हैं। यही कारण है कि यहां तुपकी की मार खाने में भी लोग आनंद महसूस करते हैं।गोंचा पर्व में शहर की गलियाँ, बाजार और मंदिर परिसर एक जीवंत मेले में तब्दील हो जाते हैं। ग्रामीण तुपकी और पेंग बेचते हैं, महिलाएं गजामूंग प्रसाद तैयार करती हैं। युवा-युवतियों के बीच पेंग की मार और ठिठोली माहौल को और अधिक जीवंत बना देती है। कभी-कभी तुपकी छीनने और तोड़ने की नौबत भी आती है, पर यह सब केवल हंसी-मजाक और परंपरा का हिस्सा होता है।

गजामूंग यानी अंकुरित मूंग और गुड़ का यह महाप्रसाद न केवल बहुत स्वादिष्ट होता है, बल्कि सुपाच्य भी होता है। अपने बीमार देव के स्वास्थ्य और आहार के प्रति लोक की यह  प्रेमपूर्ण चिन्ता भारत के सिवा विश्व में अन्यत्र कहाँ देखने मिल सकती है?


गजामुंग प्रसाद 

राजा पुरुषोत्तम देव की पुरी यात्रा से लेकर तुपकी चलाने की लोक परंपरा तक गोंचा पर्व इतिहास, आस्था, लोककला और सामाजिक एकता का सजीव मेल है। ‘गुंडीचा’ से ‘गोंचा’ हो जाना केवल भाषा का परिवर्तन है, भाव का नहीं। और यही तो हमारी सांस्कृतिक एकता का सूत्र भी है, जो आज भी बस्तर की लोकस्मृति में प्रतिवर्ष रथयात्रा के रूप में स्वयं को प्रकट करता है। 

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