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नक्षत्र: रेवती | योग: प्रीति | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 मई 2026

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बस्तर दशहरा: शक्ति की उपासना और महिषासुर पर विजय की यात्रा (भाग 03)

बस्तर दशहरा: शक्ति की उपासना और महिषासुर पर विजय की यात्रा (भाग 03)

बस्तर दशहरा के प्रमुख अनुष्ठान एवं विधियाँ
भारतीय संस्कृति में ज्योति कलश स्थापना का अत्यंत ही महत्व है। पुराणों में वर्णित घटस्थापना और अखंड ज्योति, देवी शक्ति के आह्वान की पद्धति है और हमारे अध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का एक माध्यम है। मिट्टी का कलश, पवित्र जल, पल्लव, अक्षत, सुपारी और शुद्ध घृत या तेल से दीप प्रज्वलन का विधान है। कलश पंचमहाभूतों का साकार प्रतिबिम्ब है,  मिट्टी का पात्र पृथ्वी तत्व, गंगाजल जलतत्व, अखंड दीप अग्नि तत्व, आम के पत्ते वायु तत्व और रिक्त अंतरिक्ष आकाश का द्योतक है।  


कलश प्रज्ज्वलित करते बस्तर नरेश कमलचंद्र भंजदेव

अन्य स्थानों की तरह दंतेश्वरी मंदिर में भी कलश की स्थापना हमें दिखाई देती है। माई दन्तेश्वरी देवी के मंदिर के साथ साथ अन्य देवी मंदिरों में वर्षों से अपनी आस्था तथा मनोकामना की पूर्ति हेतु निरंतर ज्योति कलश जलाते आ रहे हैं। पूर्व में दन्तेश्वरी मंदिर में बस्तर राजपरिवार के नाम से केवल एक दीप प्रज्वलित किया जाता था, किंतु सन् 1973–74 में रायपुर और जगदलपुर के कुछ भक्तों ने दन्तेवाड़ा स्थित माई दन्तेश्वरी मंदिर के समक्ष मनोकामनाओं के लिए ज्योति कलश जलाया। तब से ज्योति-कलशों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कलश स्थापना को लेकर भक्त अर्जी और विनती के साथ अपने संकल्प प्रकट करते हैं। आज हजारों श्रद्धालु अलग से मनोकामना-दीप भी जलाते हैं।


ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करते पुजारीगण

जोगी बिठाई
बस्तर दशहरा की परंपरागत अनुष्ठानों में अगला चरण “जोगी बिठाई” का होता है। किंवदंती है कि पूर्व में नवरात्र की निर्विघ्न की कामना से एक हल्बा समाज का साधक राजमहल के समीप अपने सुविधानुसार बैठ गया। कुछ समय बाद वह आकर्षण का केंद्र बन गया और कई दिनों तक आसन की कठोरता से मानो मिट्टी में धँस-सा गया। राजा ने उसे “जोगी” का पद दिया। तब से आमाबाल परिवार के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने नाम के आगे “जोगी” जोड़ते हैं और इसी परिवार का कोई पुरुष सिरहासार भवन में यह रस्म पूरा करता है। यह दायित्व हर वर्ष बदल-बदलकर निभाया जाता है। परिवार स्वयं को हल्बा समुदाय का बताता है, यद्यपि कुछ लोग उन्हें पनका समुदाय का भी मानते हैं।


साधना में बैठा जोगी: सिरहासार भवन

जोगी बिठाई की शुरुआत में माई दन्तेश्वरी के सेवक-सेविकाएँ, मांझी, चालकी और बाजे-गाजे की मंडली के साथ दन्तेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी लाल कपड़े से ढकी तलवार हाथ में लेकर जोगी का स्वागत करते हैं और उन्हें मावली माता मंदिर ले जाते हैं। वहाँ का वातावरण शांत रहता है। मावली माता के चरणों में जोगी साष्टांग प्रणाम करता है; यहीं के पुजारी पूजा-अर्चना और आरती कराते हैं तथा जोगी की आरती भी होती है। सभी उपस्थित जन मौन रहकर जोगी की सफल साधना के लिए मन ही मन प्रार्थना करते हैं। इसके पश्चात जोगी को फूल-माला पहनाई जाती है, बाहों पर तलवार बाँधी जाती है और जुलूस सिरहासार भवन की ओर बढ़ता है। मुण्डा समुदाय का विशिष्ट “डिबडिबी” (मुण्डा बाजा) पूरे दशहरे में प्रमुख रूप से बजता है।

सिरहासार भवन में नारियल, धूप, अगरबत्ती आदि के साथ पूजा के बाद जोगी के लिए आसन लगाया जाता है। पूर्व में घास-फूस बिछाया जाता था, अब गद्दा बिछाया जाता है। इसके बाद मुख्य पुजारी जोगी से गले मिलकर आसन ग्रहण कराते हैं। नौ दिनों तक दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ती रहती है। जोगी की पोशाक अब सफेद पायजामा-कुर्ता होती है, जिसकी व्यवस्था शासन की ओर से होती है; पहले सफेद धोती प्रचलित थी। जोगी इन नौ दिनों में पानी, फल और दूध ही ग्रहण करता है और जोगी बिठाई के अतिरिक्त अन्य कार्यक्रमों में भाग नहीं लेता। आज का सिरहासार भवन पूर्व में नहीं था। यहाँ केवल एक झोपड़ी थी, जहाँ एक सिरहा बैठकर लोगों की दुख-तकलीफ सुनता और उन्हें दूर करने का उपाय बताता था। उसी परंपरा के कारण इस स्थान का नाम “सिरहासार” पड़ा। 
बेल नेवता
परंपरा के अनुसार बस्तर के लोग ग्राम सरगीपाल को माँ दुर्गा का वास मानते हैं। बस्तर दशहरा में सम्मिलित होने हेतु देवी को निमंत्रण देने के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष षष्ठी को पुजारीगण सरगीपाल जाकर बेल-युग्म तलाशते हैं और उसे लाल कपड़ा तथा नारियल बाँधकर चिह्नित करते हैं। सप्तमी को राजपरिवार, दन्तेश्वरी मंदिर के पुजारी, मांझी-चालकी और समाज के लोग वहाँ पहुँचते हैं। नृत्य-दलों की अगुवाई में बेल वृक्ष तक जुलूस जाता है, ग्राम-देवी दुर्गा का आह्वान कर परंपरानुसार पूजा होती है, बकरे की बलि दी जाती है और बेल तोड़ी जाती है। यह पूजा बस्तर दशहरा के सफल सम्पन्न होने की मंगल-कामना और देवी को औपचारिक निमंत्रण देना है।


बेल-पूजा के दौरान बस्तर के राजा कमलचंद्र भंजदेव: ग्राम सरगीपाल

बस्तर दशहरा में सम्मिलित होने के लिए माई दन्तेश्वर को परंपरानुसार न्योता दिया जाता है। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार, पुजारीगण, बस्तर दशहरा समिति के सदस्य और शासन-प्रशासन के प्रतिनिधि दन्तेवाड़ा स्थित मंदिर में उपस्थित रहते हैं और विशेष आरती कर मावली माता को आमंत्रित करते हैं।
मावली माता का आगमन
आश्विन शुक्ल पक्ष अष्टमी की देर रात मावली माता की डोली जिया-डेरा (जगदलपुर) पहुँचती है। वहाँ ठहरने की व्यवस्था होती है। जगदलपुर प्रस्थान से पूर्व दन्तेवाड़ा में डोली की विधिवत पूजा-अर्चना पुजारीगण और प्रशासन के सहयोग से की जाती है, तत्पश्चात जिया (पुजारी) और उनके साथी डोली के साथ जगदलपुर के लिए रवाना होते हैं। मार्ग में स्थान-स्थान पर माई की डोली और छत्र के दर्शन किए जाते हैं और आशीर्वाद लिया जाता है।
मावली परघाव
बस्तर दशहरा में मावली परघाव का दृश्य अत्यंत उत्साहजनक होता है। मावली माता की डोली का स्वागत अत्यंत ही सम्मानपूर्वक किया जाता है। दन्तेश्वरी माई की छत्र-छाया प्राप्त करने के लिए आमंत्रित विभिन्न ग्रामों के देवी-देवता भी इस परघाव में सम्मिलित होते हैं। जैसे ही डोली जिया-डेरा पहुँचती है, उसे लेकर आए पुजारियों के पैर धोकर उनका अभिनंदन किया जाता है और दिनभर वहाँ सत्कार चलता है। परंपरा के अनुसार शाम लगभग आठ बजे कार्यक्रम प्रारंभ होता है। 


बस्तर दशहरा में मावली परघाव का दृश्य

पहले डोली जिया-डेरा से सुकमा जमींदार, फिर कुटरू जमींदार, उसके बाद पुरी-पट्टनम जमींदार को क्रम से सौंपी जाती थी। अंत में कुटरू-बाड़ा पहुँचने पर राजा दर्शन करते थे और डोली अपने कंधे पर उठाते थे। वर्तमान में पुजारीगण डोली को सीधे कुटरू-बाड़ा तक लाते हैं, जहाँ से राजा और उनके सहयोगी उसे कंधे पर लेकर आगे बढ़ते हैं। पूरे मार्ग में आतिशबाजी होती है, पथ पर पुष्प बिछाए जाते हैं और दर्शनार्थियों की लंबी कतार लगी रहती है। यह परघाव बस्तर दशहरा की सबसे आकर्षक झाँकियों में से एक मानी जाती है।
कुटरू बाड़ा से दन्तेश्वरी मंदिर की दूरी लगभग एक किलोमीटर है, जिसे तय करने में सामान्यतः डेढ़ से दो घंटे लगते हैं। डोली को राजा, राजगुरु, दन्तेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी और राजपरिवार के सदस्य कंधे पर उठाकर मंदिर तक पहुँचाते हैं। मुण्डा बाजा और मांझी-चालकी की टोलियाँ शोभायात्रा के साथ चलती हैं। 
दंतेश्वरी देवी को मावली कह कर पुकारा जाता है। दन्तेवाड़ा में मावली माता की मूर्ति पर चंदन लेप किया जाता है और नए वस्त्रों से अलंकृत किया जाता है। नगर सीमा पर राजपरिवार, जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक पारंपरिक सम्मान के साथ स्वागत करते हैं। जगदलपुर के दन्तेश्वरी मंदिर में मावली माता की पालकी को अतिथि के रूप में अग्रस्थल पर रखा जाता है, ताकि श्रद्धालु सुगमता से दर्शन कर सकें।
नवरात्र-पूजा
जोगी बिठाई के पश्चात आश्विन शुक्ल द्वितीया से सप्तमी तक प्रातःकाल पुजारी अपने-अपने मंदिरों में पूजा-पाठ करते हैं। इस अवधि में अनेक श्रद्धालु दन्तेवाड़ा तक पैदल यात्रा कर माई दन्तेश्वरी के दर्शन करते हैं। साधना क्रम में देवी के नौ रूपों, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री, का विधि-विधान से पूजन किया जाता है।
बस्तर दशहरे का प्रमुख आकर्षण: दंतेश्वरी देवी की रथ यात्रा (फूलरथ)
आश्विन शुक्ल द्वितीया से सप्तमी तक चार पहियों वाला रथ फूल रथ  कहलाता है। परिक्रमा से पूर्व चावल, अगरबत्ती, नारियल, एक काला और एक लाल बकरा, मोगरी मछली तथा अग्र-चक्रों के सामने एक-एक अंडा अर्पित किया जाता है। विधि सम्पन्न होने के बाद धुरवा और मुरिया समुदाय के लोग रथ खींचते हैं। रथ को जगन्नाथ मंदिर के सामने रोका जाता है, फिर दन्तेश्वरी के छत्र के साथ मावली, कंकालिन और जगन्नाथ मंदिरों में क्रमिक पूजा होती है। इसके पश्चात मुख्य पुजारी सीढ़ी से रथ पर रथारूढ़ होते हैं, राउरीन(केंवट परिवार की सुहागिन महिलाएं) पुष्प फेंककर नजर उतारती हैं, पुलिस-बल सलामी देता है और परिक्रमा प्रारंभ होती है। परिक्रमा के उपरांत रावरीन अंतिम आरती उतारते हैं। पूर्वकाल में रथारोहण के दिनों में राजा विशेष वेशभूषा धारण करते थे, वर्तमान में दन्तेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी छत्र लेकर रथ पर आरोहण करते हैं।


बस्तर दशहरे का प्रमुख आकर्षण: दंतेश्वरी देवी की रथ यात्रा

जगन्नाथ मंदिर से राजमहल तक की परिक्रमा पूर्ण होने पर प्रतिदिन दन्तेश्वरी देवी की विशेष आरती की परंपरा निभाई जाती है। इस अनुष्ठान में यादव और धाकड़ समाज की सुहागिन महिलाएं सम्मिलित होती हैं। रथ पर आरूढ़ देवी की आरती सिंह ड्योढ़ी से ही की जाती है। प्रथम पुष्प रथ परिक्रमा के दिन दो सौभाग्यवती स्त्रियां आरती करती हैं और उसके बाद प्रत्येक दिन आरती करने वाली महिलाओं की संख्या एक-एक कर बढ़ती जाती है। इस प्रकार अंतिम बाहर रैनी परिक्रमा में बारह महिलाएं सामूहिक रूप से आरती करती हैं। इन महिलाओं को राउरीन कहा जाता है और इनमें केवल नियत घरानों की सुहागिनें शामिल होती हैं। आरती के समय सुहागिन महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा और घूंघट धारण करती हैं। उनके हाथों में फूल, अक्षत और दीप से सजा थाल होता है। आरती का क्रम इस प्रकार होता है कि पहली महिला क्रम पूरा करने के बाद पीछे हट जाती है और दूसरी महिला आरती आरंभ करती है। रथ परिक्रमा की यह प्रथा विजय रथ तक चलती है। छह पुष्प रथों की परिक्रमा तक यह संख्या आठ तक पहुंचती है और भीतर-बाहर रैनी विधान में विजय परिक्रमा के बाद बारह महिलाएं सामूहिक रूप से आरती करती हैं। यही महिलाएं आगे चलकर मावली मंदिर परिसर में कलश स्थापना कर गौरा-गौरी की पूजा भी संपन्न करती हैं।


राउरीन महिलाये आरती के लिए जाती हुई

महाअष्टमी दुर्गा-पूजा
बस्तर दशहरा का कालक्रम स्थानीय परंपरा के अनुसार चलता है। यहाँ महाअष्टमी पर्व के लोकमान्यता में दन्तेश्वरी का गौर वर्ण महागौरी से समरूप माना जाता है। इस दिन बाह्य पूजा के साथ तप, संयम और अंतःशुद्धि पर विशेष बल दिया जाता है। महागौरी की आराधना के माध्यम से भक्त क्लेश-निवारण, इंद्रिय-संयम और आचार-विचार की निर्मलता का संकल्प लेते हैं।
निशा-जात्रा
बस्तर दशहरे की कुछ विधियाँ तांत्रिक साधना परंपरा से भी सम्बद्ध हैं। दुर्गा महाअष्टमी की अर्धरात्रि को अनुपमा चौक स्थित निशा जात्रा गुड़ी में रात्रिकालीन पूजा सम्पन्न होती है। मावली मंदिर से राउत समाज बारह कांवड़ों में भोग और पूजा-सामग्री लाता है। माई दन्तेश्वरी समिति के सदस्य, देव-प्रतिमाएँ, बाजे-गाजे और शोभायात्रा के साथ लोग गुड़ी पहुँचते हैं। निर्धारित स्थानों पर भोग रखकर राजपरिवार की उपस्थिति में विधि पूर्ण की जाती है और कुल तेरह बकरों की बलि अर्पित होती है। इसी कारण अश्विन शुक्ल अष्टमी और नवमी को रथ-परिक्रमा नहीं होती, इन दिनों स्थानीय देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के अनुष्ठान सम्पन्न किए जाते हैं। माना जाता है कि निशा जात्रा गुड़ी में माता दन्तेश्वरी (माँ का एक और नाम माणिकेश्वरी) का निवास है। इस गुड़ी का निर्माण बीसवीं शताब्दी में राजाश्रय से हुआ था और समय-समय पर प्रशासन द्वारा इसका जीर्णोद्धार किया जाता है।


महाअष्टमी की अर्धरात्रि :निशा-जात्रा

महानवमी कुंवारी पूजा विधान
महानवमी पूजन में कुंवारी पूजा के तहत 9 कुंवारी कन्याओं और 1 बालक की पूजा की जाती है। नवरात्र में कन्या पूजन की परंपरा है, कन्याएं माता का स्वरूप मानी जाती हैं। इनकी विधिवत पूजा और भोजन कराया जाता है, विशेषकर नवमी को 9 कन्याओं की पूजा होती है। 
जोगी उठाई
नवमी तिथि को संध्या के समय जोगी उठाई रस्म होती है। इष्ट देवी की पूजा के बाद 9 दिन योग अनुष्ठान में बैठे जोगी को पुजारी, चालकी, मांझी, मेम्बरीन, गणमान्य नागरिकों और दशहरा समिति के सदस्यों की मौजूदगी में उठाया जाता है। जोगी बिठाई के क्रम में मंदिरों के दर्शन कर खांडा (तलवार) को मावली मंदिर में पुनः स्थापित करता है, फिर काली कंकालिन और राम मंदिर में पूजा करता है। इसके बाद कुलदेवी की आराधना और पर्व के शांतिपूर्ण समापन के लिए आभार प्रकट करते हुए उपवास तोड़ता है। 
भीतर रैनी
बस्तर दशहरे का सबसे बड़ा दिन विजयादशमी का होता है। इस दिन अस्त्र-शस्त्र पूजन के बाद मुख्य पुजारी देवी छत्र और खड्ग के साथ आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ पर सवार होकर मावली मंदिर की परिक्रमा करते हैं।  यह रथ, फूलरथ से बड़ा और अलग बनावट वाला, भीतर रैनी रथ या विजय रथ कहलाता है, जिसे कोड़ेनार किलेपाल परगना के लोग खींचते हैं। यह रथ बहुत बड़ा होता है और इसके आठ पहिए होते हैं। इस रथ को खींचने की जिम्मेदारी सिर्फ किलेपाल और कोडेनार परगनों के लोगों को मिलता है। परिक्रमा पहले की तरह जगन्नाथ मंदिर से शुरू होती है और दंतेश्वरी मंदिर के सामने खत्म होती है। रथ-यात्रा के बाद मांई जी की आरती होती है और फिर उनके छत्र उतारने की रस्म पूरी की जाती है।

परिक्रमा के बाद माड़िया समुदाय के लोग रथ को रात में चुराकर 3 किमी दूर कुमडाकोट में छिपाया जाता है, जहाँ ओड़िसा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश-तेलंगाना से 3000 से अधिक देवी-देवताओं के प्रतीक जुटते हैं।

बस्तर में रथ चुराने की परंपरा के पीछे एक जनश्रुति है। कहा जाता है, एक समय राजा राज्य-सुरक्षा को लेकर निश्चिंत हो गये थे। सेनापति बार-बार सचेत करता रहा, पर असर नहीं हुआ। तब उसने कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ योजना बनाई। आधी रात में महल का रथ चुपचाप नगर-सीमा पार कुम्हड़ाकोट के घने जंगल में छिपा दिया गया। सुबह खबर फैली कि रथ चोरी हो गया। राजा ने चारों दिशाओं में सैनिक भेजे। काफी खोज के बाद सेनापति ने सुराग दिया और राजा को उसी जंगल तक ले गया। रथ सुरक्षित मिल गया तो राजा ने राहत की साँस ली।  तब सेनापति ने सच बताया कि यह सब उसकी ही योजना थी, ताकि राजा सुरक्षा पर फिर से ध्यान दे। राजा ने अपनी लापरवाही स्वीकार की, सैनिकों की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की और रक्षा व्यवस्था मजबूत करने का संकल्प लिया। तभी से प्रतीकात्मक “रथ-चोरी” की परम्परा बन गई। 


विजय रथ में भीतर रैनी:  विजयादशमी

दूसरे दिन राजपरिवार और जनता कुम्हड़ाकोट में नवाखानी पर्व मनाते हैं, जहाँ राजा अपनी कुल देवी को नया अन्न अर्पित करते हैं। इसके बाद दन्तेश्वरी मंदिर का पुजारी मांई जी के छत्र के साथ, राजपरिवार आगे-आगे, रथ के मार्ग से राजमहल के सिंहद्वार तक पहुँचते हैं।
काछिन जात्रा
काछिन जात्रा काछनदेवी को विदाई देने की रस्म है, जिसमें पूजा-अर्चना, बलि और कृतज्ञता भेंट की जाती है। यह भंगाराम चौक के पास, पथरागुड़ा मार्ग पर बाँवस मुण्डा तालाब के समीप आयोजित होती है, जहाँ सिराहा, काछनदेवी और स्थानीय देवी-देवता बाजे-गाजे के साथ उपस्थित होते हैं। 
मुरिया दरबार
मुरिया दरबार एक ऐतिहासिक परंपरा है, जो 8 मार्च 1876 को शुरू हुई। रियासत काल में यह दरबार जनता और राजा के बीच संवाद का माध्यम था, जहाँ मांझी, मुखिया, कोटवार जैसे जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याएँ प्रस्तुत करते थे। यह स्थानीय न्याय-प्रणाली के रूप में स्थापित थी, जिसमें जन-समस्याओं पर चर्चा और त्वरित समाधान होता था। यह परंपरा आज भी जारी है। 


वर्ष २०२४ का मुरिया दरबार

कुटुम जात्रा
कुटुम जात्रा दशहरा पर्व के समापन पर दन्तेश्वरी माई की विदाई से पहले आयोजित रस्म है। इसमें विभिन्न ग्रामों के देवी-देवताओं को पूजा, बलि और नवीन वस्त्र-भेंट देकर सम्मानित किया जाता है। यह आयोजन क्षमा-याचना, सुख-समृद्धि की कामना और देवी-देवताओं की विदाई के लिए होता है। 

दन्तेश्वरी माई जी की विदाई
दन्तेश्वरी मांई की विदाई दशहरा के समापन की भव्य रस्म है। जगदलपुर में एक सप्ताह रहने के बाद, मांई जी की छत्र और डोली को शोभायात्रा के साथ दन्तेवाड़ा के लिए विदाई दी जाती है। इस अवसर पर पुजारी, राजपरिवार, जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और समाज प्रमुख उपस्थित रहते हैं। मंच को फूलों से सजाकर पुलिस बैंड और सशस्त्र बल द्वारा सलामी दी जाती है। 


दन्तेश्वरी माई जी की विदाई

बस्तर दशहरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का दर्पण है, जो शक्ति-उपासना, प्रकृति के प्रति श्रद्धा, सामुदायिक सहयोग की महत्ता को समेटे हुए है।  यहाँ शक्ति-पूजा, विशाल रथ-निर्माण, ग्राम-देवताओं के प्रति आघात श्रद्धा और आस्था का संगम इस बात की पुष्टि करता है कि भारत की मूल प्रवृत्ति समन्वय और सहअस्तित्व की है। पूरे विश्व को बस्तर दशहरा इसलिए देखना चाहिए क्योंकि यह आयोजन पर्यटक को साधक बनाकर अद्वितीय अनुभव प्रदान करता है।  वनांचलों में हमारी संस्कृति इसलिए जीवंत है क्योंकि वहां अभी भी जीवन और आस्था, प्रकृति एक-दूसरे में गहराई से समाहित हैं। लोक गीत-नृत्य, वाचिक परम्परा और अन्य अनुष्ठान संस्कृति को केवल उत्सव तक ही सिमित नही रखते, बल्कि व्यवहार में जीवित रखे हुए हैं।

अंततः बस्तर दशहरा दुनिया को यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र की आत्मा केवल महानगरों में नहीं, बल्कि गांवों, वनांचलों और वहाँ छिपी हुई जीवंत संस्कृतियों में बसती है। यह पर्व हमें हमारे पूर्वजों द्वारा प्रदत्त जीवन-मूल्यों और परंपराओं की ओर पुनः लौटने की प्रेरणा देता है। यही जीवंत परंपरा भारत को एक ऐसा मार्ग दिखाती है, जिसमें आधुनिकता और परंपरा, विविधता और एकता साथ-साथ चलें।   एक ऐसी राह जो उत्सव के माध्यम से संस्कृति को जीवंत रखती है और संस्कृति के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में प्रेरणा का कार्य करती है।

लेख
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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