ज्ञान भारतम् अभियान: प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का संकल्प
April 26, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा 75 दिनों तक चलने वाले विश्व के सबसे लम्बे आयोजनों में से एक है, जिसे देखने लोग विश्व के कोने-कोने से आते है। बस्तर दशहरे का आकर्षण केवल रथ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आयोजन के पहले अनुष्ठान से लेकर अंत तक स्थानीय समुदायों का माता के प्रति समर्पण और आस्था देखने को मिलती है, वह विश्व में अन्यत्र कहीं देखने को शायद ही मिले। माता की विदाई के समय लोगो की आँखे नाम हो जाती है। बस्तर दशहरा का शुभारम्भ पाट जात्रा, हरियाली अमावस्या के दिन से प्रारम्भ हो कर 75 दिनों के बाद दन्तेश्वरी देवी की विदाई के साथ समाप्त होता हैं। तो आइये बारी बारी से जानते है, 75 दिनों का सफ़र कैसे पूरा होता है ।

बस्तर दशहरा हेतु तैयार होता रथ: जगदलपुर
पाट जात्रा:
पाट जात्रा बस्तर दशहरे के शुभारंभ का प्रमुख अनुष्ठान है। इसकी शुरुआत श्रावण मास की हरियाली अमावस्या को होती है, जब रथ निर्माण के लिए चुनी गई लकड़ी दंतेश्वरी माई के मंदिर प्रांगण में लाई जाती है। यह बड़ा और ठोस लकड़ी का टुकड़ा स्थानीय बोली में टुरलु या ठुरलू खोटला कहते है।

माँ दंतेश्वरी मंदिर प्रांगण में ठुरलू खोटला की पूजा: पाट जात्रा
मंदिर के सामने लकड़ी के साथ रथ निर्माण के औजार सजाकर रखे जाते हैं। मांझी, मुखिया, जनप्रतिनिधि और गांव के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहते हैं। पुजारी दंतेश्वरी देवी और स्थानीय ग्राम देवताओं का आह्वान करते हैं। ऐसी मान्यता है कि लकड़ी पर कीलें गाड़कर देवी-देवताओं से विनती की जाती है कि वे पर्व के समापन तक रहें और समूचा आयोजन बिना विघ्न के संपन्न हो। पूजा में चूड़ी, सिंदूर, लाली, फूल पत्ते, मिठाई और कपड़ा अर्पित किया जाता है।

माँ दंतेश्वरी मंदिर प्रांगण में ठुरलू खोटला की पूजा: पाट जात्रा
इस अनुष्ठान के लिए लकड़ी स्थान विशेष से ही मंगाई जाती है। परंपरा के अनुसार बिलोरी ग्राम से विशेष रूप से चिन्हित पेड़ की लकड़ी लायी जाती है। समाज के प्रमुख और रथ के कारीगर नियमपूर्वक उसका चयन करते हैं और गरिमा के साथ उसे लाते हैं। हरियाली अमावस्या के दिन इसी लकड़ी की विधिपूर्वक पूजा होती है। पाट जात्रा के साथ ही गांवों में दशहरे की तैयारियां तेज हो जाती हैं और अलग-अलग समुदायों के लोग अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने लगते हैं। इसीलिए बस्तर दशहरे में समुदायों का व्यापक प्रतिनिधित्व सहज रूप से नज़र आता है।

बिलोरी ग्राम में पूजा कर लकड़ी काटते ग्रामीण एवं शिल्पकार
बस्तर राजपरिवार के राजा कमलचंद भंजदेव बताते हैं कि पहले महाराजा स्वयं पुजारियों के साथ लकड़ी लेने जाया करते थे। आज राजमहल से थाल में सम्पूर्ण पूजा सामग्री भेजी जाती है और उसी के अनुसार पाट जात्रा का विधान संपन्न होता है। वे यह भी याद दिलाते हैं कि जब महाराजा पुरुषोत्तम देव को पुरी में रथपति की उपाधि मिली थी, उसी रथ को इसी दिन बस्तर लाकर पूजा की गई थी। हरियाली अमावस्या को स्थानीय देवी-देवताओं की सामूहिक आराधना इसलिए होती है ताकि आने वाले 75 दिन शांतिपूर्वक उत्सव के रूप में बीतें।
“टुरलु खोटला” केवल एक लकड़ी नहीं है, बल्कि वही आगे रथ निर्माण का औजार भी बनती है। दशहरा समिति के सदस्य बलराम मांझी के अनुसार इस लकड़ी का उपयोग रथ बनाने के दौरान हथौड़े की तरह किया जाता है, जिससे चक्कों और ढांचे में लगने वाले बड़े लकड़ी के हिस्सों को ठोंककर फिट किया जाता है। इस तरह अनुष्ठान और शिल्पकारी एक दूसरे में गुंथे दिखाई देते हैं। भेंट और बलि के विधान भी पाट जात्रा में शामिल हैं। बकरे की बलि दंतेश्वरी देवी के नाम पर दी जाती है, जबकि मोगरी मछली कन्या देवी को अर्पित की जाती है। कन्या देवी को धरती के जल स्रोतों की अधिष्ठात्री माना जाता है।

रथ निर्माण करते शिल्पकार: जगदलपुर
डेरी गड़ाई:
डेरी गड़ाई बस्तर दशहरा का दूसरा प्रमुख अनुष्ठान है। इसके लिए साल प्रजाति की लगभग दस फीट ऊंची शाखायुक्त लकड़ी को सिरहासार भवन में स्थापित किया जाता है। दो गड्ढों में हल्दी, कुमकुम और चंदन से पूजा कर सफेद कपड़े बांधे जाते हैं। फिर उन गड्ढों में अंडा, मोंगरी मछली और फूला लाई अर्पित कर डेरी को गाड़ा जाता है। इसे मंडपाच्छादन का प्रतीक माना जाता है, ताकि आने वाले दिनों का समूचा उत्सव शांतिपूर्वक और निर्विघ्न सम्पन्न हो।
यह लकड़ी बस्तर के बिरगपाल गांव से परंपरानुसार लाई जाती है। लाने के बाद उस पर हल्दी का लेप किया जाता है और फिर सिरहासार भवन में दो स्तंभों के बीच भूमि में गाड़कर प्रतिष्ठित किया जाता है। इसी स्थापना को डेरी गड़ाई कहा जाता है। विधान में पुजारी, मांझी, चालकी और बस्तर दशहरा समिति के सदस्य उपस्थित रहते हैं। बस्तर राजपरिवार की ओर से आज भी पूजा सामग्री भेजी जाती है।

डेरी गड़ाई अनुष्ठान : सिरहसार भवन
डेरी गड़ाई के साथ ही रथ निर्माण की प्रक्रिया औपचारिक रूप से प्रारंभ होती है। जंगल से आई हुई साल और तिनसा की लकड़ियों को परंपरागत औजारों से रथ तैयार की जाती हैं। रथ का ढांचा मुख्यतः साल की लकड़ी से बनता है, जबकि तिनसा की लकड़ी से पहियों का धुरा और अन्य महत्वपूर्ण हिस्से तैयार किए जाते हैं। परंपरा के अनुसार झारउमर और बेड़ाउमर गांव के कारीगर रथ निर्माण का दायित्व निभाते हैं।
लगभग चालीस फीट ऊंचा यह रथ भादों शुक्ल पक्ष द्वादशी या त्रयोदशी तक तैयार कर दिया जाता है। आधुनिक औजारों के बजाय स्थानीय कारीगर आज भी पारंपरिक उपकरणों से ही काम पूरा करते हैं, जिससे शिल्प और आस्था का जैविक संबंध बना रहता है।

पारंपरिक औजारों से रथ निर्माण करते स्थानीय कारीगर: जगदलपुर
लोकविश्वास में यह अनुष्ठान छह से अधिक शताब्दियों से निर्विघ्न चल रहा है। कहा जाता है कि बस्तर के तात्कालीन राजा पुरुषोत्तम देव ने लगभग 1408 के आसपास जगन्नाथपुरी की पदयात्रा की थी। वहां उन्हें भगवान जगन्नाथ की कृपा से रथपति की उपाधि मिली और सोलह पहियों वाला एक विशाल रथ भेंट हुआ। इतने बड़े रथ को जस का तस बस्तर लाना संभव नहीं था, इसलिए उसे तीन भागों में विभाजित कर परंपरा रूप में ग्रहण किया गया।
एक चार पहियों वाला रथ भगवान जगन्नाथ के लिए रहा, जबकि बस्तर दशहरा हेतु दो रथों की परंपरा बनी। इनमें फूल रथ तिथियों के अनुसार पांच से छह दिन तक चलता है और विजय रथ आठ पहियों वाला विशाल रथ है, जिसका संचालन दशहरा और उसके अगले दिन होता है। रथ यात्रा की लोकपरम्परा में भीतर रैनी और बाहर रैनी नामक रस्में भी शामिल हैं, जिनमें नगर परिक्रमा लोक परम्पराओं के आधार पर किया जाता है।
काछिन गादी: काछिन देवी से अनुमति लेने की परम्परा
काछिन गादी का शाब्दिक अर्थ काछिन देवी की गद्दी है। यह नुकीले बेल के काँटों से सजा हुआ झूला रूपी आसन होता है जिसे काछिन गुड़ी में प्रतिष्ठित किया जाता है। काछिन देवी को रण देवी भी कहा जाता है और बस्तर अंचल में मिरगान, पनका और पनिका समुदायों में उन्हें अपनी इष्टदेवी मानता है। काछिन गुड़ी जगदलपुर में पथरागुडा रोड के समीप स्थित है और यहीं से आश्विन अमावस्या को बस्तर दशहरे की शुरुआत मानी जाती है।

बेल के काटें से तैयार काछिन देवी का झुला: काछिन गुड़ी
इस अनुष्ठान के क्रम में सबसे पहले दन्तेश्वरी माता की पूजा होती है। इसके बाद राजपरिवार, पुजारी, मांझी, चालकी और जन समुदाय काछिन गुड़ी की ओर बढ़ते हैं। विधिवत एक कुमारी कन्या का चयन किया जाता है जो आठ से बारह वर्ष से कम आयु की हो। कन्या काले वस्त्र धारण करती है। पुजारीगण उस पर काछिन देवी को आरूढ़ कराते हैं। सामने सफेद कपड़ों का परदा रहता है जिसे सिरहागण और महिलाएँ हथेली पर लेकर गादी के चारों ओर घुमाती हैं। इस समय मोहरी, नगाड़ा और धनकूल बजते हैं तथा महिलाएँ रेला-रेला का सामूहिक गीत गाती हैं। जैसे ही कछन देवी आरूढ़ि की अवस्था प्रकट होती है, कन्या को काँटों से सजे झूले रूपी गादी पर लिटाकर झुलाया जाता है। शासकीय प्रतिनिधि, राजा और सिरहा देवी के समक्ष करबद्ध खड़े होकर दशहरे के निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना करते हैं। लोकमान्यता है कि देवी प्रसन्न होकर पुष्प की माला देती है, यह अनुमति का संकेत बनता हैं और उसी क्षण से उत्सव की शुरुआत हो जाती है।

काछिन देवी के स्वरुप में कुमारी कन्या: काछिन गुड़ी
काछिन गादी की से जुड़ी लोककथाएँ इस परम्परा का ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करती हैं। एक कथा के अनुसार चालुक्य नरेश दलपतदेव के समय जगतू नामक मुखिया की बस्ती जगतुगुड़ा जंगली जानवरों से परेशान थी। दलपतदेव शिकार के दौरान वहाँ पहुँचे, यह स्थल उन्हें प्रिय लगा और लगभग सन् 1725 के आसपास राजधानी को बस्तर ग्राम से यहाँ स्थानांतरित किया। सम्मान स्वरूप दशहरे की शुरुआत उस बस्ती की इष्ट काछिन देवी की अनुमति से करने का विधान बना। समय के साथ जगतुगुड़ा को जगदलपुर के नाम से जाना जाने लगा और काछिन देवी दशहरे की आराध्य बनीं। दूसरी कथा में कहा गया है कि दलपतदेव ने जगतुगुड़ा में एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा जहाँ एक मादा खरगोश जंगली कुत्ते पर प्रबल पड़ती दिखी। राजकुल ने इसे भूमि की शक्ति का संकेत माना और स्थानीय मिरगान समुदाय की इष्ट काछिन देवी को राजसम्मान दिया। इस प्रक्रिया ने समाज के सारे विभाजनों के पार सामुदायिक समावेशन का प्रतीक बना दिया।

काछिन गुड़ी जगदलपुर में राजा के साथ अन्य प्रतिनिधि
रैला पूजा काछिन गादी कार्यक्रम के उपरांत मिरगान समुदाय की महिलाओं द्वारा संपन्न की जाती है और इसमें राजपरिवार भी सम्मिलित होता है। इसके पीछे एक भावुक लोककथा है। कहा जाता है कि काकतीयवंशी अन्नमदेव की बहन रैला का शत्रु सेनापति ने अपहरण किया, बाद में उसे छोड़ दिया गया, किंतु राजपरिवार ने उसे अपवित्र मानकर अस्वीकार कर दिया। एक अनुसूचित जाति परिवार ने उसे आश्रय दिया, पर अपमान से आहत होकर रैला ने गोदावरी के निकट जलसमाधि ले ली। इससे मिरगान समुदाय को गहरा धक्का लगा और उन्होंने रैला का वार्षिक श्राद्ध अपने ढंग से करने का संकल्प लिया। आज भी संध्या समय गोलबाजार के भीतर चिन्हित स्थल पर मिरगान पुजारी और समुदाय की महिलाएँ एकत्रित होती हैं। रियासत काल से ग्राम तेलीमारेगा की एक कुमारी कन्या को परम्परा के अनुसार अवसर दिया जाता है। महिलाएँ रैला रैला के शोकगीत गाती हैं और उसी श्राद्धकर्म को रैला पूजा के रूप में बस्तर दशहरा सँजोए रखता हैं।

रैला पूजा के दौरान तश्वीर: गोलबाजार, जगदलपुर
समग्र रूप से देखें तो पाट जात्रा, डेरी गड़ाई, काछिनगादी, बस्तर दशहरे के प्रमुख अनुष्ठान हैं। इन तीनों के माध्यम से बस्तर दशहरा आस्था, शिल्पकारी और समाज को एक सूत्र में बाँधता है और यही उसे विश्व की अद्वितीय लोक परम्पराओं में स्थान दिलाता है।
शेष, भाग-०३ में ।

लेख
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे
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