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बस्तर दशहरा: शक्ति उपासना और महिषासुर पर विजय की यात्रा (भाग 01)

बस्तर दशहरा: शक्ति उपासना और महिषासुर पर विजय की यात्रा (भाग 01)

बस्तर दशहरे का इतिहास
भाग - 01

छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग वनाच्छादित क्षेत्र है। जहाँ मुरिया, माड़िया, धुरवा, भतरा, दोरला, गदबा, हल्बा, दण्डामी माडिया, अबुझमाड़िया एवं गोंड़, धाकड़, ढीमर, भोई, कहार, धीवर, मल्लाह, केवट आदि समुदाय निवास करती है। 

बस्तर दशहरा इस क्षेत्र में निवासरत समुदायों के मध्य सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का भाव प्रस्तुत करता है। यह पर्व बस्तर अंचल का सबसे बड़ा उत्सव है। दशहरा पर्व भारत में विविध प्रकारों से मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल संबंध अश्विन नवरात्र में शक्ति-उपासना से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था।

बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में यह पर्व कहीं रावण-दहन के रूप में, तो कहीं शस्त्र-पूजन और छत्तीसगढ़ के कई स्थानों में “गढ़-जीतने” जैसी परम्परा के रूप में मनाया जाता है।  भारत के कई स्थानों पर, विशेषकर मैसूर रियासत में, इस अवसर पर शाही सवारी निकाली जाती है, जबकि कई अन्य रियासतों में  विजय यात्रा इसी प्रकार की सवारी निकाली जाती है।  इसी क्रम में बस्तर का दशहरा देवी दंतेश्वरी को समर्पित एक विशेष पर्व है। इसका मुख्य आकर्षण नवरात्र के दौरान देवी दंतेश्वरी की रथयात्रा और विविध अनुष्ठान हैं। इन अनुष्ठानों की लंबी श्रृंखला के कारण यह उत्सव लगातार 75 दिनों तक चलता है और विश्व का सबसे लंबा उत्सव माना जाता है।

इस उत्सव में सम्मिलित होने के लिए बस्तर संभाग के लगभग सभी ग्रामों से अपने-अपने देवी- देवताओं को साथ लेकर जात्रा का आरंभ करते है तथा उत्सव में सम्मिलित होते है। यह पर्व श्रावण अमावस्या से शुरू होकर आश्विन शुक्ल त्रयोदशी को समाप्त होता है। इस तरह यह पर्व 75 दिनों तक मनाया जाता है और यह ’बस्तर दशहरा’ के नाम से प्रचलित है। इस पर्व में भाग लेने वाले प्रत्येक जाति समूह का कार्य पूर्व से निर्धारित होता है। इसी आधार पर अपने-अपने कर्तव्यों का निःस्वार्थ भाव से निर्वहन करते है। इस दशहरे की ख्याति इतनी अधिक है कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों के साथ-साथ विदेशों से भी सैलानी इसे देखने आते है। यह बस्तर क्षेत्र में निवास करने वाली सभी जनजातियों की संस्कृति का मुख्य अंग है। जिसमें वर्तमान बस्तर संभाग के सातों जिलों जैसे- बस्तर, उत्तर बस्तर कांकेर, दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर, कोंडागांव, सुकमा जिले की सक्रिय सहभागिता होती है। 

चक्रकोट राज्य से लेकर बस्तर राज्य तक के काकतीय (चालुक्य) राज परिवार की इष्ट देवी तथा बस्तर अंचल के समस्त लोक-जीवन की अधिष्ठात्री देवी दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा-भक्ति की सामूहिक अभिव्यक्ति का पर्व है। उल्लेखनीय है कि इस पर्व में बस्तर के प्रत्येक समुदाय की भागेदारी होती है, जो कि आज भी चले आ रही है।

अश्विन नवरात्र का पर्व तो सदियों से मनाया जाता रहा है। बस्तर में माँ दन्तेश्वरी की रथ यात्रा की परम्परा का प्रचलन 1408 से 1439 ई. में काकतीय वंश के चौथे राजा पुरूषोत्तम देव के द्वारा किया गया था। और आज के बदलते परिवेश में भी इस पर्व ने अपनी अनूठी परम्परा को संजोये रखा है। विभिन्नताओं में एकता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बस्तर दशहरा में देखने को मिलता है, जिसमें समस्त बस्तर वासी चाहे वे किसी भी समुदाय से हो इस पर्व में शामिल होते हैं। 

राजा पुरुषोत्तम देव की जगन्नाथपुरी की तीर्थयात्रा के उपरांत पुरी के राजा ने उन्हें रथपति की उपाधि से अलंकृत किया था। ऐसा माना जाता है कि इस तीर्थयात्रा की वापसी के दौरान राजा पुरुषोत्तम देव रथयात्रा पर्व (गोंचा पर्व) के अतिरिक्त दशहरा पर्व में भी रथों का प्रयोग प्रारम्भ किया जो कि ऐतिहासिक परम्परा का प्रतीक बन गया। एक बार राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथपुरी यात्रा के लिए गये हुऐ थे, और राजा के साथ प्रजा भी मौजूद । राजा ने मंदिर के कुछ दूर पहले से अपने पेट के बल  मंदिर तक पहुँचे। इसके पूर्व रात में यहाँ के पुजारी को स्वप्न में राजा पुरुषोत्तम देव को भगवान के द्वारा रथपति घोषणा करने की अनुमति मिली थी। तत्पश्चात ऐसा माना जाता है कि रथपति की घोषणा उस पुजारी के द्वारा ही घोषित किया गया। 

इतिहास 
बस्तर के इतिहास को लेकर कहा जाता है कि 400 ई. से लेकर भारत के स्वतंत्र होने तक की समयावधि में नल, गंग, नाग तथा चालुक्य शासकों ने अपने राज्य स्थापित किये थे। बस्तरांचल में दन्तेश्वरी का विजयोत्सव मनाया जाता हैं। 

रियासती शासन काल में बाहिर-रैनी के दिन जब बड़ा रथ ‘कुमढ़ाकोट’ से लौटता था, तब वापसी में महिषासुर का प्रतीक मान कर एक भैंसे की बलि दी जाती थी, और प्रतिष्ठित नागरिकों को भेंट में रूमाल और बीडी दिये जाते थे। 

दुर्गाष्टमी (निशा-जात्रा) की रात्रि में भी नगर के इतवारी बाजार स्थित ‘पूजा-मंडप’ के सामने एक भैंसे की बलि दी जाती थी। पर्व के अर्न्तगत ऐसे कई भैंसे काटे जाते थे। परन्तु वर्तमान समय में भैंस नहीं काटे जाते, बल्कि सभी प्रमुख रस्मो को मिलाकार 200 के लगभग बकरों की बलि दी जाती है, साथ ही महुआ दारू का दपर्ण किया जाता है। 

भूतपूर्व चक्रकोट राज्य में वर्तमान बस्तर दशहरे का प्रारंभ किया था। इसे काकतीय नरेश पुरूषोत्तम देव ने प्रारंभ किया था। वे श्री जगन्नाथ जी के उपासक थे। उन्होंने अपने चक्रकोट राज्य से जगन्नाथ पुरी तक वनवासियों के साथ पद-यात्रा की थी। पुरी धाम तक सुनिश्चित डांगों के क्रम से दण्डवत् पड़ते गये थे। वहां पहुंच कर उन्होंने रत्न-राशि अर्पित की थी। तीर्थ-यात्रा से ‘रथ-पति’ पद से विभूषित होकर लौटे थे। इसके पश्चात उन्होंने अपने राज्य में ‘गोंचा’ और ‘दशहरा’ पर्वो में रथ चलाने की परम्परा का शुरूआत किया था। उन दिनों राजा पुरूषोत्तम देव की राजधानी बड़ेडोंगर में थी। ऐसा लगता है कि सुदूर मुकाम बडेडोंगर स्थित मार्गो पर चलाये जा सकने योग्य छोटे-छोटे रथों का संचालन होता था। राजधानी जगदलपुर स्थानांतरित होने के बाद ही विशाल रथों का निर्माण शुरू हुआ। 

चक्रकोट और बस्तर राज्य को लेकर वर्तमान लोकतंत्रीय वातावरण तक, इस अनोखे विजयोत्सव की धूम-धाम में बहुत परिर्वतन आया है। राजतंत्र से लेकर प्रजातंत्र तक इस पर्वयात्रा के लगभग 600 वर्ष से अधिक हो चुके हैं और आज भी यह पर्व निर्विघ्न संचालित होता आ रहा है। 

भाग - 02 .....अगले अंक में।


लेख
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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