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बारसूर नगर का नामकरण

बारसूर नगर का नामकरण

किसी भी प्राचीन नगर का नाम कैसे पड़ा? यह एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा होती है। इतिहास के क्षेत्र में यह जानना और भी जरूरी हो जाता है। प्राचीन दण्डकारण वर्तमान बस्तर क्षेत्र में कई प्राचीन नगरों के नाम तत्कालीन राज व्यवस्था से जुड़े हैं। बस्तर के इतिहास में नगरों के नाम किसी विशेष व्यक्ति से सम्बद्ध मिलते हैं। कहीं कहीं सटीक जानकारी के अभाव में अनुमान लगाए जाते हैं। ये अनुमान भी रुचिकर होते हैं।

"बारसूर नगर" छिन्दक वंश के राजाओं की राजधानी थी। यह नगर चक्रकोट राज्य की आस्था और राजनीतिक घटनाओं का केन्द्र भी था। इस समृद्ध नगर का नाम बारसूर कैसे पड़ा और यह नाम कब अस्तित्व में आया? आम लोगों की इन रोचक तथ्यों को जानने में विशेष रुचि रही है।


बारसूर बत्तीसा मंदिर का दृश्य

वर्तमान समय में बारसूर के निवासियों में एक धारणा प्रचलित है। वे मानते हैं कि बाणासुर नामक शिव भक्त के नाम पर इस नगर का नाम बारसूर पड़ा। उनका मानना है कि यह नगर बाणासुर की राजधानी थी।

शिव भक्त बाणासुर
शिव भक्त बाणासुर

एक अन्य अनुमान के अनुसार बाणासुर नाम के किसी राजा के नाम पर इस नगर का नाम बारसूर पड़ा। बाणासुर नाम का राजा कौन था और उसका शासन कब था, इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती है।

बारसूर का नामकरण कैसे हुआ और यह नाम कब सामने आया? इस जानकारी के लिए बारसूर के तत्कालीन शिलालेखों का अध्ययन आवश्यक है। छिन्दक राजाओं ने बारसूर में कई सदियों तक शासन किया। उनके काल के कई शिलालेख बारसूर और बस्तर के अन्य स्थानों से प्राप्त होते हैं। ये अभिलेख इन जानकारियों के प्रामाणिक स्रोत हैं।

बारसूर में छिन्दक महाराजा जगदेक भूषण प्रथम के सामन्त महामण्डलेश्वर चन्द्रादित्य देव का एक अभिलेख मिलता है। यह अभिलेख सन् 1060 ईस्वी का है। इसमें चन्द्रादित्य ने अपनी राजधानी बारसूर में शिव मन्दिर बनवाने का उल्लेख किया है। इस शिलालेख में नगर का नाम "बारसूरू" लिखा गया है। यह सिद्ध करता है कि 11वीं सदी के मध्य में आज का बारसूर "बारसूरू" नाम से जाना जाता था।


प्रसिद्ध मामा-भांचा मंदिर बारसूर 

यह नामकरण तत्कालीन चक्रकोट राज्य के अन्य नगरों के नामकरण की तरह ही था। उस समय चक्रकोट राज्य में नगरों के नाम प्रायः राजा या रानियों के नाम पर रखे जाते थे। उदाहरण के लिए बस्तर जिले के धाराउर गाँव का नाम महाराज धारावर्ष के नाम पर पड़ा। 'उर' शब्द का अर्थ बड़ा नगर होता है

महाराज धारावर्ष की महारानी गुण्ड महादेवी के नाम पर गुनपुर का नाम पड़ा। सोमेश्वर देव प्रथम की रानी सोमलदेवी के नाम पर दन्तेवाड़ा के समलूर गाँव का नाम पड़ा। सोमेश्वर देव द्वितीय की महारानी गंगा देवी के नाम पर बीजापुर जिले का गंगालूर गाँव बसा।


समलूर गाँव का शिव मंदिर

बारसूरू नामकरण भी इसी परम्परा के अन्तर्गत आता है। यह नाम चक्रकोट के किसी प्रतिष्ठित राजा के नाम से जुड़ा लगता है। प्राचीन काल में कोई ऐसा राजा या विशेष व्यक्ति रहा होगा जिसके नाम पर 11वीं सदी में यह नगर बारसूरू नाम से प्रसिद्ध हुआ।

सन् 1060 ईस्वी का बारसूर अभिलेख स्पष्ट करता है कि इस नगर का बाणासुर नामक दैत्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। बाणासुर नाम का कोई राजा भी यहाँ शासन नहीं करता था। भारतीय परम्परा में राज परिवारों या सामान्य परिवारों में सन्तानों का नाम कभी भी दैत्य या दानवों के नाम पर नहीं रखा जाता है। शिलालेख से यह पुष्ट होता है कि इस नगर का मूल नाम बारसूरू ही था।

लेख - 
श्री ओम प्रकाश सोनी, सुकमा, छत्तीसगढ़
"बस्तर विरासत-बारसूर" किताब के लेखक

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