राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

ग्राम्य जीवन जीने वाला लोक मानस बड़ा सीधा, सरल, सहज, भोला भाला, उदार और आस्थावान होता है। प्रकृति का हर उपदान उसके लिए देवता है। प्रकृति के कण-कण में देवत्व की अनुभूति करता है। इसलिए लोक समाज के इर्द-गिर्द देवी-देवताओं के स्थल बहुतायत रूप से मिलते है। यह भी देखा गया है कि जितने भी ग्राम्य देवी-देवता हैं, गॉंव की सीमा के आस-पास या सुदुर जंगलों व पहाड़ों में बसे हैं, या बसाए गए है। शायद इसीलिए लोग आहम ज्ञान की प्राप्ति के लिए जंगल की गुफाओं में जाकर समाधिस्थ हो जाते हैं। यहॉं आकर मन को शांति मिलती है, ज्ञान का प्रकाश मिलता हैं।
छत्तीसगढ़ का अधिकांश क्षेत्र बनाच्छादित है। इन्ही वनों में ग्राम्य देवी देवताओं की मढ़िया दिखाई पड़ती है। ये मढ़िया (छोटे मंदिर) आस्था के केन्द्र होते हैं, जहॉं पर ग्रामीणजन उपस्थित होकर अपनी भक्ति भावना प्रकट करते हैं। ऐसा ही एक स्थान है बंजारी माता का मंदिर यहॉं हर समय श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।
बंजारी माता का मंदिर घने जंगलों के बीच गंडई-बालाघाट अंतर्राज्यीय मार्ग पर स्थित है। राजनांदगांव जिले में स्थित गंडई नर्मदा से इसकी दूरी लगभग 35 कि.मी. है। यहॉं चैत्र नवरात्र व क्वांर नवरात्र में श्रद्धालु जनों द्वारा सैकड़ों की संख्या में जॅंवारे की मनोकामना ज्योति जलाई जाती है। वन में होने या उत्पन्न होने के कारण वनज, वनजा से बंजारी हुआ जिसे स्थानीय भाषा में बंजारी कहा जाता है। यह भी उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में बंजारी देवी की बहुलता है और ये वनों में ही स्थित हैं।

बहुत पुरानी बात है यह सड़क नहीं थी, तब जंगलों को पार करते हुए पैदल या बमुश्किल बैलगाड़ी के द्वारा लोगों का आना-जाना होता था। अकेले आना-जाना तो संभव नही था। क्योंकि यहॉं वन्य पशुओं की अधिकता थी। बाघ-भालू तो यूँ ही मिल जाते थे। इसलिए लोग समूह में चलते थे। समूह में चलने से लोगों को बल मिलता है। भय खत्म हो जाता है। तब गंडई इस क्षेत्र का बड़ा बाजार और मुख्य व्यापारिक केंद्र था आज भी है। उस समय साल्हेवारा क्षेत्र के वनवासी अपनी बैलगाड़ी या भैंसा गाड़ा में बॉंस व सरई- बीजा की इमारती लकड़ी लाकर गंडई में बेचते थे और सप्ताह भर के लिए जरूरत की चीजें खरीद कर ले जाते थे। तब सड़क तो थी ही नहीं केवल पग डंडी या धरसा था।
ऊॅंचे पहाड़ों के किनारे-किनारे नीचे उतरना बड़ी जोखिम भरी यात्रा होती थी। घने जंगल, ऊॅंचे पहाड़ दुर्गम घाटियॉं, बेडौल रास्ते ये सब भय पैदा करते हैं, असुरक्षा की भावना जगाते हैं। और जब मन में भय पैदा होता है, असुरक्षा घर कर जाती है, तब मनुष्य को भगवान याद आते हैं। लोक प्रकृति को ही अपना रक्षक मानकर उसकी पूजा प्रारंभ कर देता है। प्रकृति तो देवता ही है। जो सबकी मूल भूत आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। यही भावना अनगढ़ वस्तु को देवता की श्रेणी में ला खड़ा करती है। आस्था और विश्वास से सुरक्षा का संतोष भी मिलता हैं। इसी विश्वास ने बंजारी माता को यहां स्थापित कर दिया तब से बंजारी माता इस अंचल की लोक देवी हैं।
बाँस और इमारती लकड़ी लेकर गंडई आने वाले गाड़ी वानों ने ग्राम रेंगाखार के नीचे नाले के पास जहां से लगभग 10 किलो मीटर की पहाड़ी ढाल प्रारंभ होती है, उस स्थान पर अपनी सकुशल यात्रा के लिए अनगढ़ शिला को देवी के रूप में स्थापित कर बंजारी माँ का नाम दिया। फूल-पान और नारियल चढ़ाकर सुखद मात्रा की कामना की। यहाँ भी उल्लेखनीय है कि नर्मदा से साल्हेवारा जाते समय ग्राम मोहगांव के बाद पहाड़ का चढ़ाव (घाट) प्रारंभ होता है। तब तो यह अधिक दुर्गम था। चढ़ाव के प्रारंभिक स्थल पर कोई देवी-देवता का मंदिर नहीं हैं।

घाट चढ़ने वाले सकुशल चढ़ाई के पश्चात बंजारी मंदिर में फूल-पान नारियल चढ़ाकर माँ बंजारी के सम्मुख नतमस्तक होते है। यह क्रम वर्षो से जारी है। घाट उतरने वाले भी और घाट चढ़ने वाले भी मॉं की पूजा-प्रार्थना कर कुछ समय के लिए विश्राम करते हैं। सागोन, साजा, बीजा के ऊॅंचे-ऊॅंचे पेड़ों से छनकर आती शीतल हवाएं मन को शांति प्रदान करती हैं। नाले का शीतल जल पहले राहगीरों की प्यास बुझाता था, पर अब नहीं। अब वहां पर शासन द्वारा हैंड पम्प की सुविधा उपलब्ध करा दी गई है।
हमारे काका जी स्व. चतुरराम यादव मोहगांव (बालाघाट जिला) बाजार से बैल लाकर गंडई बाजार में बेचते थे। उनका अक्सर इस रास्ते से पैदल आना-जाना होता था तब वह माँ बंजारी की महिमा का बखान करते थे। वे बताते थे कि यहां यदा-कदा बाघ-भालू मिल जाते थे। बंजारी माँ में नारियल नहीं चढ़ाने पर अप्रिय घटना भी हो जाती थी। कभी बैलगाड़ी का नुकसान हो जाता था। मेरा किशोर मन काकाजी की बातों से प्रभा वित होकर बंजारी मंदिर जाने को उत्सुक हो जाता, किन्तु उतनी दूर कैसे जाया जाय? यह चिंता थी।
संयोग से एक दिन अवसर भी निकल आया। यह बात सन् 1972 के अप्रेल माह की है जब मैं दसवीं पढ़ता था। बालाघाट जिले के कचनारी गाँव में हमारे पिताजी बुआ रहती थी। जिन्हें हम लोग ‘डोंगरहिन दीदी’ कहते थे। उनके घर शादी का कार्यक्रम था। मेरी दादी ने कहा- ‘‘बेटा तुम भी चलो, तुमको जंगल-झाड़ी देखने का बहुत शौक है। वहाँ बंजारी माँ के दर्शन कर लेना।’’ मैं तैयार हो गया। तब राजनांदगांव से साल्हेवारा के लिए एक ही बस चलती थी। वही बस साल्हेवारा से वापस आती थी।
बस गंडई से साढ़े दस बजे छुटी, तब मन गदगद था। नर्मदा से बस पश्चिम दिशा की ओर चली तो दो किलो मीटर बाद जंगल शुरू हो गया। पत्ते विहिन पेड़, तपती चट्टानें फिर भी दिल को सुकुन मिल रहा था चारों तरफ जंगल ही जंगल। जंगल की शोभा देखने में ड्राईवर के केबिन के पास अगली सीट पर बैठ गया। उबड़-खाबड़ कच्ची सड़क से होती बस मोहगांव के बाद घाट चढ़ने लगी। लोग उत्सुकता से घाट की चढ़ाई देखने लगें। बस धीरे-धीरे चढ़ाने लगी। दाई ओर ऊॅंचे पहाड़ और बाई ओर गहरी खाई। भय लगना सहज था।
किसी ने कहा कि यह मोटियारी घाट हैं। मैंने उत्सुकता वश पूछा। इसे मोटियारी घाट क्यों कहते हैं? तब उन्होंने बताया कि इस घाट में एक मोटियारी, जवान महिला की गिरने से मृत्यु हो गई थी। इसलिए इसे मोटियारी घाट कहते हैं। काफी कठिन चढ़ाई लगभग 10 कि.मी. की। कभी-कभी तो बस का इंजन गरम हो जाता। कंडक्टर पानी डालता। टेड़ी-मेड़ी उबड़-खाबड़ सड़क से ऊपर घाट पहुँचे तो बॉंई ओर नीचे गहरी घाटी दिखाई दे रही थी। और सॉंप की तरह लग रहे थे। इतने घनघोर जंगल, ऊॅंचे-ऊॅंचे पहाड़ और गहरी घाटियॉं देखने का यह पहला अवसर था।
बस, बंजारी में रूकी तब दादी ने बताया कि ड्राईव्हर-कडंक्टर बंजारी मंदिर में नारियल फोंड़ेगे। चलो हम भी माता के दर्शन कर लें। सभी यात्री उतरे सबने मॉं के दर्शन किए। मैंने भी शीश नवाया। देखा एक छोटा सा चबूतरा नुमा मढ़िया है जिसमें अनगढ़ शिला है। फूल चढ़े हुए है, नारियल फूटे हुए है। बिलकुल निर्जन स्थान किन्तु आस्था और विश्वास से भरा-पूरा पूजा का केन्द्र कंडक्टर ने नारियल फोड़ कर प्रसाद बांटा मेरी उत्सुकता पूरी हुई और परिचित हुआ माँ बंजारी के पावन धाम से हमारी यात्रा भी सकुशल पूरी हुई चार दिनो के बाद वापसी में भी बस के ड्राईव्हर-कंडक्टर ने बंजारी माता में नारियल फोड़कर यात्रियों को प्रसाद बाँटा। आस्था का क्रम आज भी जारी है। तब भी सुविधाएँ नहीं थी, असुविधाएं ही असुविधाएं थी। आना-जाना सब दुर्गम था, आज सब कुछ सुगम है।

अब यहां बंजारी मां का बड़ा मंदिर बन चुका है। माँ बंजारी की भव्य मूर्ति स्थापित की गई है। पूजन सामग्री की दुकाने खुल गई है। यह मार्ग अब आन्तर्राज्यीय मार्ग है। रात-दिन आवागमन की सुविधाएं उपलब्ध है। इस लिए बंजारी मंदिर में हमेशा चहल पहल रहती है। श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती हैं। रायपुर से कान्हा किसली, राष्ट्रीय उद्यान के लिए आने-जाने वाले यात्रियों की संख्या बढ़ी है। विदेशी पर्यटक जो कान्हा किसली आते हैं वे रायपुर एयरपोर्ट से ही अपनी हवाई यात्रा करते हैं। रायपुर दुर्ग, राजनांदगांव से बालाघाट सिवनी मंडला जबलपुर के लिए बसें इसी मार्ग से आती-जाती हैं। यातायात की दृष्टि से यह अब सुविधा सम्पन्न मार्ग है। इस मार्ग से गुजरने वाले सभी यात्री मॉं का दर्शन कर पुण्य का भागी बनते हैं। विगत कुछ वर्षों से यहॉं काले मुँह वाले बंदरों का झुंड देखा जा रहा है। दर्शनार्थी यात्री कुछ तो दयाभाव से और कुछ तो मनोरंजन के लिए बंदरो को मूंगफली, चना, मुर्रा, बिस्कुट आदि खिलाते हैं।
बंजारी मंदिर का काया कल्प करने में अंचल वासियों का बड़ा योगदान है। साल्हेवारा क्षेत्र में आने वाले शासकीय अधिकारियों व कर्मचारियों तथा यहाँ की श्रद्धालु जनता ने हृदय से तन-मन-धन से सहयोग कर मंदिर को सुंदर बनाया है। इस कार्य के प्रेरणा स्त्रोत कमकावाड़ा (परपोड़ी) के पूज्य पंडित अंबिका प्रसाद जी है। जिनमें मार्ग दर्शन व अथक परिश्रम से बंजारी माँ का मंदिर अब नए रूप में दिखाई पड़ता है। पंडित जी सह परिवार यहीं पर रहते है और माँ बंजारी की सेवा साधना करते हैं। आस-पास के गाँवों में कथा पूजा और भागवत प्रवचन भी करते हैं। मंदिर के पीछे बंजारी नाला है। जिसमें वर्ष भर पानी बहते रहता है। इस माले का उद्गम मंदिर से लगभग डेढ़ कि.मी. दूर पश्चिमोत्तर दिशा में हैं। जहाँ पवित्र जल की निकर्झरणी कुछ लोग इसे सूरही नदी का उद्गम मानते है। मंदिर के पास पूजन सामग्री के दुकान दार अब यहीं निवास करने लगें है। वे बताते हैं कभी-कभी रात्रि में विचरण करते यहाँ बाघ आ जाता है और माँ के चरणों में नतमस्तक होकर चला जाता है। अभी तक इस क्षेत्र में वन्य पशुओं द्वारा कोई जन हानि नहीं हुई है।
माँ बंजारी का मंदिर जन आस्था का केन्द्र है। लोग आते है, मनौती मनाते हैं। मन्नत पूरी होने पर ज्योति कलश प्रज्वलित करते है। तब चैत्र बासंती नवरात्रि के नव दिन और कुवांर शारदीय नवरात्रि के नौ दिन श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। माँ की सेवा के लिए रेंगाखार, देवपुरा, साल्हेवारा, सहसपुर, नवांगांव, गोपाल टोला आदि के सेउकजन प्रति दिन आते है और ढोलक मांदर, झाझ-मंजीरा के साथ जस गीतों का गायन कर माँ दुर्गा, माँ बंजारी की महिमा का बखान करते है। तब यहॉं का दृश्य और भी भक्ति मय व दर्शनीय होता है। लोक कंठो से झरने वाले ये सेवा गीत हमारी आस्था और भक्ति की झंकार हैं। जिसमें श्रद्धा भक्ति के साथ-साथ माँ के श्रृंगार का वर्णन होता है-
तुम आए बंजारी, बघवा हो रे हो...
जब माथे मुकुट काने में झुमका, पहिरे हो लाल के साड़ी
जब महिसासुर को मार गिराए, बघवा सवारी हो रे हो
आठ भुजा अतिशोभित माता, गल-फुलन के हा रे
जब तीन लोक में बजे नंगारा, होवत हे जय-जय कारें
माँ बंजारी का यह पावन धाम हरे-भरे जंगलों के बीच प्राकृतिक सुषमा के साथ ही साथ माँ की ममता और मया दुलार की इस वर्ष घर जन जीवन को ज्योति करता रहे। यही कामना है।
आलेख
डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.) मो. नं. 9424113122
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