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गुजरात के वनांचलों में मनाए जाने वाला लोक पर्व: बन्दी त्योहार

गुजरात के वनांचलों में मनाए जाने वाला लोक पर्व: बन्दी त्योहार


भारत का वनवासी समाज प्रकृति और विज्ञान के साथ बहुत गहराई से जुड़ा है। गुजरात के छोटाउदयपुर जिले का राठ क्षेत्र अपनी विशेष लोक परम्पराओं के लिए जाना जाता है। इसी क्षेत्र में वनवासी समाज वर्षा ऋतु के समय बन्दी का त्योहार मनाता है। यह त्योहार केवल पूजा पाठ तक सीमित नहीं है। इसके नियम सीधे तौर पर समाज के स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा करते हैं। डॉक्टर सुमित्राबेन कुलतसिंहभाई राठवा ने इस लेख में बन्दी त्योहार की मान्यताओं और उसके वैज्ञानिक पक्ष को बहुत सरल शब्दों में समझाया है। यह लेख पाठकों को वनवासी समाज की गहरी समझ से परिचय कराता है।


छोटाउदयपुर जिले के पूरे वनांचल क्षेत्र को राठ के नाम से जानते हैं। प्राचीन समय में लोग अपने निवास स्थान और भौगोलिक स्थिति के आधार पर क्षेत्रों का नाम रखते थे। वे इसी आधार पर दिशाओं की पहचान भी करते थे। उदाहरण के लिए पूर्व दिशा के क्षेत्र को उगमणुं राठ कहते थे। पश्चिम दिशा के क्षेत्र को बुडमणुं कहते थे। दक्षिण दिशा के क्षेत्र को रेवाकांठीयुं कहते थे। उत्तर दिशा के क्षेत्र को गोधरियुं कहते थे।

संखेड़ा से जेतपुर पावी तक के प्रदेश को नानीपाल और मेवास कहते थे। जेतपुर पावी से छोटाउदयपुर तक के क्षेत्र को मोटीपाल कहते थे। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से राठवा, नायका, धानका, भील, तडवी और डुंगरी भील समाज के लोग रहते हैं। वनवासी समाज के उत्सवों, त्योहारों और सामाजिक रीति रिवाजों में बड़ी विविधता है। बन्दी का त्योहार भी इसी समाज की एक बड़ी लोक परम्परा है।


राठ क्षेत्र के वनवासी समुदाय

बन्दी का अर्थ और परिभाषा
बन्दी शब्द का अर्थ किसी काम, गतिविधि या वस्तु पर रोक लगाना है। बन्दी के समय समाज के लोग कुछ विशेष नियमों का पालन करते हैं। वे तेल में तली हुई चीजें नहीं बनाते हैं। वे खेत में निराई और गुड़ाई नहीं करते हैं। लोग खाखरा और साग के पत्ते नहीं तोड़ते हैं। वे इनका घर में उपयोग भी नहीं करते हैं। वे नया अनाज भी नहीं खाते हैं। बन्दी को लेकर हर गांव में अलग अलग मान्यताएं और परम्पराएं हैं।

बन्दी के त्योहार से जुड़ी लोकमान्यताएं
छोटाउदयपुर जिले के राठ क्षेत्र के लोग मानते हैं कि गांव में जानलेवा महामारी फैलने पर बन्दी लागू होती है। लोगों की बहुत अधिक मृत्यु होने पर गांव को इस संकट से बचाने के लिए भी लोग बन्दी करते हैं। पशुओं में रेबीज, खुरपका, मुंहपका या अन्य संक्रामक रोग फैलने पर भी लोग बन्दी रखते हैं।

वनवासी समाज के लोग मानते हैं कि देवी देवताओं की पूजा और मनौती से गांव को महामारी, आपदाओं और बुरी घटनाओं से बचा सकते हैं। इसलिए लोग गांव के विभिन्न देवी देवताओं के नाम पर परम्पराओं का पालन करते हैं। वे पूरे गांव की सुख और भलाई के लिए प्रार्थना करते हैं।


बन्दी के दौरान भोजन, खेती और वन संसाधनों से जुड़े विशेष नियमों का पालन

खेती और बन्दी: पारम्परिक मान्यताएं
लोग बुवाई पूरी होने के बाद बन्दी का त्योहार मनाते हैं। बन्दी शुरू होने पर पटेल, पुजारा और गांव के अन्य लोग खेत में निराई और गुड़ाई का काम रोक देते हैं। लोग मानते हैं कि बन्दी के समय निराई और गुड़ाई करने से फसल को नुकसान पहुंचता है। इससे खेतों में कीड़े भी बढ़ते हैं।

बन्दी पूरी होने के बाद लोग उजाणी या नोदरिया त्योहार मनाते हैं। इसके बाद वे खेत में निराई और गुड़ाई शुरू करते हैं। लोग आमतौर पर मानसून की शुरुआत में जून महीने में बन्दी का त्योहार मनाते हैं।

बन्दी के त्योहार से जुड़े रीति रिवाज
बन्दी के दिन सुबह गांव के लोग एक जगह इकट्ठा होते हैं। वे गांव की बाहरी सीमा पर जाते हैं। वहां परम्परा के अनुसार लोग बकरे के पैर, नींबू, बाल और नारियल से तोरण बनाते हैं। लोग यह तोरण गांव की सीमा या चार रास्तों के संगम पर स्थित भागोल देव के स्थान पर बांधते हैं।


परम्परा के अनुसार लोग बकरे के पैर, नींबू, बाल और नारियल से तोरण बनाते हैं

इसके बाद गांव का मुखिया पुकार लगाकर पूरे गांव में बन्दी की घोषणा करता है। इस दौरान गांव के लोग इन नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं:

  • बचा हुआ भोजन नहीं खाना।

  • खेत में निराई और गुड़ाई नहीं करना।

  • खाखरा के पत्ते घर में नहीं लाना।

  • नया अनाज नहीं खाना।

गांव के बलवा और पुजारा विभिन्न देवी देवताओं का नाम लेते हैं। वे गांव की रक्षा और सुख के लिए प्रार्थना करते हैं। वे मन्त्रोच्चार के साथ देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि गांव में महामारी न फैले। वे पशुओं की सुरक्षा की भी मांग करते हैं।

लोग लगभग सवा महीने तक इन नियमों का पालन करते हैं। इसके बाद लोग उजाणी त्योहार मनाकर बन्दी का समापन करते हैं। इस अवसर पर गांव के लोग ढोल और नगाड़े बजाते हुए नाचते हैं। वे देवस्थान पर जाकर सामूहिक खुशी मनाते हैं।


उजाणी त्योहार

बन्दी के त्योहार के पीछे का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वनवासी समाज प्रकृति से बहुत गहराई से जुड़ा है। प्राचीन समय में स्वास्थ्य सुविधाओं और आधुनिक अस्पतालों की कमी थी। इसलिए लोग अपने पारम्परिक ज्ञान और अनुभव पर भरोसा करते थे।

मानसून के दौरान वातावरण में नमी रहती है। इससे पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। इस मौसम में संक्रामक रोग फैलने का खतरा बढ़ता है। ऐसे समय में हल्का और बिना तेल का भोजन करना स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहता है। पूर्वजों ने बन्दी के नियमों के माध्यम से इसी सात्विक भोजन प्रणाली को लागू किया था।

खेत और जंगल से जुड़ी कृषि गतिविधियों पर प्रतिबन्ध लगाने से शरीर को आराम मिलता है। इससे पर्यावरण का सन्तुलन भी बना रहता है। इस प्रकार बन्दी केवल एक सामाजिक परम्परा नहीं है। यह स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी एक उपयोगी लोक परम्परा है।


हल्का भोजन, शारीरिक विश्राम और सीमित कृषि गतिविधियां

बन्दी का त्योहार वनवासी समाज की सामूहिक जीवनशैली और धार्मिक आस्था को दिखाता है। यह उनकी पारम्परिक वैज्ञानिक समझ का भी एक बड़ा उदाहरण है। पूर्वजों ने मानसून के मौसम को ध्यान में रखकर ये नियम बनाए थे। ये नियम स्वास्थ्य और समाज दोनों के लिए बहुत उपयोगी हैं।

सवा महीने तक हल्का और उबला हुआ भोजन करने की परम्परा शरीर के लिए बहुत लाभदायक है। बन्दी का त्योहार केवल एक धार्मिक विधि नहीं है। यह स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने वाली परम्परा है। यह समाज में सामूहिक एकता भी बढ़ाती है।

लेख:
डॉ. सुमित्राबेन कुलतसिंहभाई राठवा
छोटा उदयपुर, राजस्थान

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