श्रीरामकथा की विश्वव्यापी लोकप्रियता
April 02, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

यूनेस्को की विश्व धरोहर जल दुर्ग गागरोन के ठीक पीछे बहती नदी के आगे अरावली की मुकन्दरा पर्वतमाला स्थित है। यह पर्वतमाला एक लम्बी श्रृंखला के रूप में है, परन्तु यह दो भागों में बंटी हुई है जिसके मध्य गागरोन दुर्ग मंे आती नदी इसी भाग से होकर उत्तर की ओर प्रवाहित हो जाती है। दो भागों में बंटी इस पर्वतमाला को बलिण्डा पर्वत कहा जाता है। इतिहासकार ललित शर्मा के अनुसार दरअसल किसी समय यह पर्वतमाला नदी के जलप्रवाह में अत्यन्त बाधक थी और जलप्रवाह अवरूद्ध हो जाता था। लगभग 200 से अधिक फीट ऊँची इसकी पाषाणी चोटियों के मध्य 20 फुट का फासला था, जिस पर मेहनतकश मजदूर लकड़ी का मजबूत गठ्ठर (अर्थात बलिण्डा बनाकर) पहाड़ों की दोनों सर्वोच्च चोटियों पर एक दूसरे को मजबूती से बांधकर आवागमन पथ के रूप में अपने सिर पर बोझ ढोते हुए निकल जाया करते थे। ऐसी आश्चर्यचकित करने वाली ऊँचाई के कारण ही इसे बलिण्डा घाट कहा जाता है।
इस प्रकार बलिण्डा घाट दो पहाड़ों की पाषाणी चोटी में विभक्त हो गया, जिसके पश्चिमी सिरे के मध्य उत्तरामुखी विशाल पाषाणी पर्वतमाला प्राकृतिक रूप से बने है अद्भुत गणेशजी। इन्हें दूर-दूर तक बलिण्डा घाट के गणेशजी नाम से जाना जाता है। प्रकृति की इस अद्भुत कृति को देखते ही व्यक्ति स्तब्ध रह जाता है। वेगवती नदी के जलप्रवाह व भूतल से लगभग 25 फीट की ऊँची काली व भूरी चट्टानों के मध्य प्राकृतिक रूप से बने इन गणेशजी को देखते ही प्रतीत होता है मानों स्वयं पर्वतराज ने इन्हंे अपने हाथों से बनाया है।

इस पाषाणी पर्वतमाला के विशाल व भारी भरकम अनगढ़ पत्थर शिलारूपी है, परन्तु आश्चर्य है कि इस मूर्ति के 5 विशाल पाषाण खण्ड ऐसे है जो गणेशजी को यहांँ विशाल शीश, भाल, मुख, कर्ण और लम्बी सूण्ड प्रदान करते हैं। इसे देखते ही लगता है कि यह प्रकृति की अलौकिक कृति है अथवा प्राचीन मानव की युगयुगीन श्रद्धा?
इतिहासकार ललित शर्मा के अनुसार सम्पूर्ण मूर्ति केसरिया कामी, लाल मंगल तिलक, चमक तथा पुष्प व सुगन्ध से सजी संवरी ऐसे प्रतीत होती है मानो सारी प्रकृति की छटा यहाँ आकर एकत्रित हो गई हो। मुख्य बात यहाँ रणथम्भौर के गणेशजी की भाँति जो दिखाई देती है वह है - हाड़ौती तथा मालवांचल के श्रद्धालु लोगों द्वारा शादी-विवाह में इनकी सेवा में समर्पित आमंत्रण, जो प्रथम न्यौते के रूप में यहाँ रखे हुए देखे जा सकते है। इस अंचलों में गणेश-वन्दना से ही प्रत्येक कार्य का शुभारम्भ किया जाता है। बीच पहाड़ में स्थित बलिण्डा घाट के इन गणेशजी को पैदल जाकर सूर्योदय के पूर्व ही न्यौतना (आमंत्रित करना) होता है।यह विनायक-स्थापना, विवाहोत्सव से पूर्व घर में श्री और समृद्धि के लिये की जाती है,जिनके प्रतिनिधि को बन्दयाक कहते है। तब महिलाएँ यहाँ मंगलकामनाएँ व अनुरोध कर यहाँ से पांच छोटे-छोटे शगुन (गणेशजी के स्वरूप पत्थर) को घर लाती है व गीतों सहित उन्हंे गणेश के स्वरूप में स्थापित कर श्रृद्धा व्यक्त करती है -
म्हारे आओ जी गणपत पाऊणा।
गागरोनी गढ़ पाछे आप बिराजो।।
चन्दन चौक पुरावणा।
लाडली को चीर बंधाज्यो
रायबर की चीरडी।
झालावाड़ की एक बुजुर्ग महिला (स्व.)श्रीमती ख्वाजी हुसैन तो बरसों से बलिण्डा घाट के इन गणेशजी को आमंत्रण के ये गीत गाने में माहिर रही है। उन्हीं के शब्दों में -
आज गजाननजी के नौतिया
आज गजानन्दजी दादा बाबाजी के नौतिया।
तो दादी-अम्मा के नोत झिमाया जी गजानन्द।
आज गजानन्द काका-बोराजी के नौतिया।।
तो काकियां-भोज्यायां के नोत झिमाया जी गजानन।
वहीं झालावाड़ के माँ भवानी सेवादल द्वारा संगीतकार नरेन्द्र दूबे पुष्पलता दूबे के संयोजन में बनाया यह सुन्दर बलिण्डा घाट के गणेश का गीत भी सांस्कृतिक समारोहों में बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रस्तुत किया जाता है। इसकी कुछ पंक्तियां -
थाने मनाबा आया रे गजानन, थाने ढोकबा आया रे।
बलिण्डा घाट का गणपति, म्हां थाने मनाबा आया रे।।
घाट बलिण्डा आप विराजों, आहू-सिन्ध चरण धुलाया रे।
अचलदास थ्हारी करे आरती, पाल्हण चंवर ढुलाया रे।
सारतः इस अंचल के अनेक लोग विवाहोत्सव के अतिरिक्त गणेश-चतुर्थी पर काफी संख्या में यहाँ आते हैं। वे यहां गोठ भी आयोजित करते है और इन प्राकृतिक गणेशजी को भोग लगाकर तथा इनकी पूजा करके मन में मनौतियाँ मांगते है।
‘‘है विघ्न विनाशक! बलिण्डा के गणपति, आप विघ्नों का निवारण कीजिए, जिससे वे लोग, जो सबसे अभ्युदय के लिये प्रत्यनशील है, सफल हों। क्योंकि आप सारे जगत के सिद्धिदाता के रूप में प्रसिद्ध हैं।
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