आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

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पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय

बलिहारी गुरु आपने  गोविंद दियो बताय


भारतीय संस्कृति में गुरु को ज्ञान, सदाचार और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाला माना गया है। गुरु शिष्य के अज्ञान को दूर करके उसे जीवन का उद्देश्य समझने में सहायता करते हैं। वे शिष्य को सत्य को पहचानने की दृष्टि देते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा पूरे देश में मनाई जाती है। यह गुरु और शिष्य के सम्बन्ध के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है।


संस्कृत वाङमय में, हमारी लोक परम्परा में गुरु वह है जो अज्ञान का अन्धकार दूर करता है। गुरु शब्द का अर्थ भारी, गम्भीर और बड़ा होता है। यहाँ भारी होने का तात्पर्य गुरु के ज्ञान, अनुभव और चरित्र से है।

गुरु: जो अज्ञान का अंधकार दूर करे
गुरु: जो अज्ञान का अंधकार दूर करे

अपने वास्तविक स्वरूप को न जानना, असत्य को सत्य समझना और क्षणिक सुख को जीवन का सत्य मान लेना भी अज्ञान है। गुरु, शिष्य को इस भ्रम से बाहर निकालते हैं। वे कर्म, भक्ति और ज्ञान के मार्ग से परिचित कराते हैं। शिष्य की प्रवृत्ति के अनुसार इन मार्गों में चलने का मार्ग दिखाना भी गुरु का कार्य है। गुरु स्तोत्र में कहा गया है:

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुरेव परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

गुरु को परब्रह्म कहने का आशय यह है कि वे शिष्य को परम सत्य की पहचान कराते हैं। सच पहले से ही हमारे अंदर होता है। गुरु बस हमारे दृष्टि पर पड़े अज्ञान के आवरण हटाते हैं। अज्ञान के कारण शिष्य उसे पहचान नहीं पाता है। गुरु उसे पहचानने योग्य बनाते हैं।

भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा
भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा

कबीर का प्रसिद्ध दोहा गुरु के इसी महत्त्व को सामने रखता है:

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाय।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय॥

कबीर गुरु और ईश्वर के बीच किसी प्रकार की प्रतियोगिता को अंकित नहीं कर रहे हैं। वे गुरु को उस माध्यम के रूप में देखते हैं जो मनुष्य को ईश्वर की पहचान कराता है। ईश्वर का अस्तित्व व्यापक हो सकता है। मनुष्य अपने भ्रम और सीमित दृष्टि के कारण उसे समझ नहीं पाता है। गुरु इस दूरी को ज्ञान से समाप्त करते हैं। गुरु का कार्य शिष्य को अपने प्रति निर्भर बनाए रखना नहीं है। इसलिए गुरु के प्रति सम्मान वास्तव में उस ज्ञान के प्रति सम्मान है जो मनुष्य को मोह, भ्रम और अज्ञान से मुक्त करता है।

गुरु पूर्णिमा की परम्परा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वेदव्यास का जन्म द्वापर युग में आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को हुआ था। उनके जन्मोत्सव को गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) के रूप में मनाया जाता है। इन्होंने वेदों के विभाजन, पुराणों के संकलन और महाभारत की रचना की थी।

महर्षि वेदव्यास: ज्ञान और प्रज्ञा के सागर
महर्षि वेदव्यास: ज्ञान और प्रज्ञा के सागर

योग और शैव परम्पराएँ भगवान शिव को आदिगुरु मानती हैं। इन परम्पराओं के अनुसार शिव ने 7 साधकों को योग और आत्मज्ञान की शिक्षा दी थी। इन साधकों को आगे चलकर सप्तर्षि के रूप में जाना गया। यह कथा ज्ञान के निरन्तर प्रवाह का संकेत देती है। गुरु से प्राप्त ज्ञान शिष्य के माध्यम से समाज तक पहुँचता है।

आदिगुरु शिव और सप्तर्षि
आदिगुरु शिव और सप्तर्षि

बौद्ध मत में भी आषाढ़ पूर्णिमा का विशेष महत्त्व है। भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ में अपने 5 पूर्व साथियों को इसी अवसर पर पहला उपदेश दिया था। उन्होंने चार आर्य सत्यों और अष्टांगिक मार्ग की शिक्षा दी। बौद्ध मत इसे धर्मचक्र प्रवर्तन के रूप में स्मरण करती है।

बुद्ध और उनके शिष्य
बुद्ध और उनके शिष्य

आषाढ़ पूर्णिमा के आसपास वर्षा ऋतु आरम्भ होती है। प्राचीन समय में साधु, सन्त और भिक्षु वर्षा के महीनों में अपनी यात्राएँ बन्द कर देते थे। वे एक स्थान पर रहकर अध्ययन, साधना और ज्ञान प्रदान करते थे। इससे गुरु और शिष्य को संवाद तथा चिन्तन का समय मिलता था।

चातुर्मास में अध्ययन और साधना का महत्व
चातुर्मास में अध्ययन और साधना का महत्व

गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति आभार प्रकट करने का अवसर है। यह दिन माता एवं पिता, शिक्षकों, हमारे मार्गदर्शकों और उन सभी व्यक्तियों का स्मरण करने की प्रेरणा देता है जिन्होंने हमारे विचार और चरित्र को सही दिशा दी है। गुरु के प्रति सम्मान और पूजनीय भाव के साथ-साथ उनके ज्ञान को जीवन में उतारना ही वास्तविक गुरु दक्षिणा है। शिष्य जब सत्य, करुणा, अनुशासन और विवेक के अनुसार आचरण करता है, तब गुरु की शिक्षा सार्थक होती है।

आज के परिदृश्य मे ंजहाँ गुरु-शिष्य सम्बन्ध केवल व्यावसायिक और आर्थिक रूप से संकुचित होकर रह गए हैं, तब गुरु पूर्णिमा का यह पर्व एक समाज के रूप में हमें यह विचार करने की प्रेरणा देता है कि आखिर कैसे हम गुरु-शिष्य सम्बन्धों को जड़-इहवादी, भौतिक स्वार्थों से ऊपर उठाकर आत्मीय बनाएं, ताकि हमारे भारत में ज्ञान की गंगा कभी मद्धिम न हो! 

लेख:
डॉ. प्रीति शर्मा
सहायक प्राध्यापक, राजस्थान

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