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पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

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बैगा लोकगीत-बिलमा

बैगा लोकगीत-बिलमा


बैगा समुदाय की लोक-संस्कृति, परंपराओं और कला में प्रकृति और मानवीय भावनाओं का गहरा संबंध देखने को मिलता है। इन्ही समृद्ध परंपराओं में से एक अत्यंत भावपूर्ण प्रस्तुति है 'बिलमा', जो मुख्य रूप से बैगाओं का एक पारंपरिक विवाह गीत और नृत्य है। इसे स्थानीय स्तर पर 'बिरहा नृत्य' के नाम से भी जाना जाता है।


बैगा जनजाति बैगा आदिवासी विवाह
बैगा समुदाय में विवाह (चित्र: गोपी कृष्ण सोनी)

बिलमा नृत्य का आयोजन मुख्य रूप से विवाह समारोह के अंतिम चरण में, अर्थात बारात की विदाई के समय किया जाता है। यह वह संवेदनशील क्षण होता है जब एक बेटी अपना मायका छोड़कर ससुराल के लिए विदा होती है। इस अवसर पर गांव के युवक और युवतियां (विशेषकर दुल्हन की सखियां और वर पक्ष के युवक) एक साथ मिलकर इस नृत्य और गीत में भाग लेते हैं।

बिलमा गीत
ऐ भुनुक-भुनुक मोह रस मचिया,सच मचिया पंखे डोलाय....
ऐ भुनुक-भुनुक मोह रस मचिया,सच मचिया पंखे डोलाय...
जादे के आबे,सच मचिया पंखे डोलाय
ऐ जसी डोलय मोह रस मचिया,तइसे वार‌ डोलय दरबार....
सझा के बेरा,तइसे वार डोलाय दरबार।
ऐ बेटी तो बईसय,ए सोन मचिया बेटा ये चढ़य असवार...
ऐ नगारा ढोलिया बेटा ये, चढ़य असवार।
कितो जाने बहुत नई जाने,जानते थे पनच भगवान...
जईसे के छुटय मोह रस मचिया,तईसे छुटय सघवार..
हले हुई....!

शब्दार्थ:
भुनुन-भुनुन = भिन्न - भिन्न मक्खी की आवाज,
मोह रस = शहद, मचिया = मधुमक्खी, जसी = जैसे,
तईसे = उसी तरह ,सझा = शाम, बेरा = समय, बईसय = बैठना।

भावार्थ:
भिन्न-भिन्न करते हुए मधुमक्खी जैसी अपने पंख डूलाती है,उसी तरह दुल्हन भी इधर-उधर हिल रही है। जिस प्रकार मक्खी इघर-उधर हील रहीं हैं उसी प्रकार लड़की के सभी सदस्य भावुक हो गए हैं और इस कारण उनके घर को कोई सम्भाल नहीं पा रहा है। शाम को बिदाई के ‌समय सब लोग और भी ज्यादा भावुक हो गये। शादी में विदाई के समय बेटी सोने की डोली तथा दामाद हाथी पर अवसार बनकर बैठ जाते है और इस समय नगारे तथा ढोलको की आवाज और अधिक तेज़ हो जाती है।

अब दुल्हा-दुल्हन के जीवन में क्या होने वाला है इसके बारे में सिर्फ भगवान ही बता सकते है। कुछ देर रुकने के बाद जैसे मधुमक्खी चली जाती है वैसे ही दुल्हन की सभी सहेलियां का भी साथ छूट जाता है। नृत्य में दो भावनाएं एक साथ नजर आती है। इस नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसमें शामिल पुरुष और महिला की मुद्राओं और गति के बीच दो अलग अलग शैलियाँ नजर आती है:

  • पुरुषों का नृत्य (उल्लास का प्रतीक): इस नृत्य में पुरुष अपेक्षाकृत बहुत अधिक ऊर्जावान होते हैं। वे मांदर या अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर उछल-उछल कर, तेज कदमों के साथ नृत्य करते हैं और ऊंचे स्वर में गीत गाते हैं। उनकी यह शैली विवाह संपन्न होने की खुशी, नई दुल्हन को अपने साथ ले जाने के गर्व और उत्सव के उल्लास को दर्शाती है।

  • महिलाओं का नृत्य (विछोह का प्रतीक): दूसरी ओर, महिलाओं (युवतियों) की नृत्य शैली बिल्कुल विपरीत होती है। वे शांत भाव से, अत्यंत धीमी गति से और अपने पैरों को जमीन पर धीरे-धीरे सरकाकर (घिसटते हुए) कदम बढ़ाती हैं। उनके गीतों के स्वर में एक ठहराव और करुणा होती है। महिलाओं के नृत्य में विछोह का आभास होता है।  

  • बैगा जनजाति बैगा आदिवासी
    बैगा समुदाय में पारंपरिक वेशभूषा 

विश्व की बहुत कम लोक-कलाओं में ऐसा मार्मिक और गहरा विरोधाभास देखने को मिलता है, जहाँ बिना कुछ कहे केवल शारीरिक मुद्राओं और गति के माध्यम से ही पूरी मनोभाव बयां हो जाती है। एक ही प्रांगण में नृत्य करते हुए 'नए रिश्ते के जुड़ने के उल्लास' और 'अपनों से बिछड़ने के विरह' का यह सह-अस्तित्व किसी चमत्कार से कम नहीं है। एक तरफ उल्लास से झूमते और उछलते कदमों वाले पुरुष खुशी का संचार करते हैं, तो दूसरी तरफ विरह के बोझ से धीमे, सरकते कदम बढ़ाती महिलाएँ अपनी उदासी को समेटे रहती हैं। कला और मानवीय संवेदनाओं का यह अद्भुत दृश्य देखने वाले के हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ जाता है।

यह नृत्य मानव जीवन के यथार्थ और भावनाओं के द्वंद्व का अत्यंत सजीव चित्रण है, जो यह प्रमाणित करता है कि जीवन सुख और दुख का एक अनवरत संगम है। प्राकृतिक प्रतीकों (जैसे मधुमक्खी और शहद) के माध्यम से बेटी की विदाई के दर्द और नए जीवन की शुरुआत की खुशी को एक साथ प्रस्तुत करना, बैगा समुदाय की गहरी दार्शनिक परिपक्वता को दर्शाता है। वे इस शाश्वत सत्य को भली-भांति समझते हैं कि जीवन कभी भी एकतरफा नहीं होता; बल्कि खुशी और दुख हमेशा एक-दूसरे के साथ-साथ चलते हैं।

संकलन:

श्री प्रहलाद पात्रे
छात्रावास अधीक्षक, कबीरधाम

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