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बैगा समुदाय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति

बैगा समुदाय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति

छत्तीसगढ़ के घने वनों में रहने वाले बैगा समुदाय के बारे में स्थानीय स्तर पर कई औषधीय दावों की चर्चा मिलती है। कुछ लोग कहते हैं कि वे भ्ररममार और तेलियाकंद जैसी जड़ी-बूटियों का उपयोग गंभीर रोगों में भी करते हैं। इन दावों की वैज्ञानिक पुष्टि और चिकित्सकीय सलाह अलग विषय है।

बैगा समाज में चोट, बुखार और दांत दर्द जैसी सामान्य समस्याओं के लिए घरेलू उपचारों की परंपरा भी बताई जाती है। स्थानीय वर्णनों के अनुसार, कुछ लोग कुरकुट के पत्तों का लेप घाव पर लगाते हैं। मलेरिया जैसी बीमारी में पीपल की दातून के उपयोग का भी उल्लेख किया जाता है।

दांत दर्द के लिए चितावर की पत्ती दबाने या आकवन के दूध की कुछ बूंदें लगाने जैसी बातें भी कही जाती हैं। बाल झड़ने पर शराब के मटके की कालिख लगाने का उपचार भी कुछ लोगों द्वारा बताया जाता है। ऐसे उपायों का असर व्यक्ति और परिस्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।

मूत्र संबंधी जलन में “जरिया” पौधे की पत्तियां चबाने और रस निगलने की बात कही जाती है। कुछ लोग इसकी पत्तियों का उपयोग शरीर पर लगाने के रूप में भी बताते हैं। इन दावों की पुष्टि के लिए व्यवस्थित अध्ययन की जरूरत रहती है।

जुलाब के लिए वन अंडी की जड़ का सीमित उपयोग किए जाने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। आंखों में लालिमा या जलन होने पर नमक की डली लगाने और उसे पानी के मटके के नीचे रखने जैसी मान्यताएं भी बताई जाती हैं। कुछ लोग जरिया की पत्तियां चबाकर आंखों की तरफ फूंकने का तरीका भी बताते हैं।

बच्चों की कुछ बीमारियों के लिए भी लोक-उपचारों की चर्चा होती है। “सुखा रोग” में असमिया सर्प की केंचुली या रीढ़ की हड्डी की माला पहनाने की बात कही जाती है। दस्त में अंडे से जुड़ा एक उपचार भी कुछ क्षेत्रों में बताया जाता है, लेकिन यह चिकित्सकीय दृष्टि से जोखिमभरा हो सकता है।

सर्प की केचुली
सर्प की केचुली

सर्पदंश पर इद्रावन की जड़, करौंदे की जड़ का काढ़ा और राहर की जड़ों के उपयोग जैसे उपचारों का वर्णन मिलता है। कुछ लोग काटे गए स्थान पर मुर्गे के चूजे की गुदी लगाने की प्रक्रिया भी बताते हैं। ऐसे मामलों में आधुनिक आपात उपचार समय पर मिलना सबसे जरूरी माना जाता है

करौंदे की जड़
करौंदे की जड़

पागल कुत्ते या सियार के काटने पर भी कुछ पारंपरिक मिश्रणों का उल्लेख होता है, जैसे राहर की डाली में पाए जाने वाले कीड़े, मक्का का पुष्पाग और इद्रावन की जड़। बताया जाता है कि इन्हें गुड़ या महुआ की शराब के साथ दिया जाता है। ऐसे मामलों में रेबीज का खतरा रहता है, इसलिए अस्पताल जाना प्राथमिक कदम है।

दमा और एलर्जिक अस्थमा के लिए सफेद आक की जड़ और अजवायन के पाउडर का उपयोग किए जाने की बात भी कही जाती है। इस तरह के दावों को कुछ लेखक आधुनिक चिकित्सा से तुलना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हालांकि चिकित्सा के मामले में प्रमाण, खुराक और सुरक्षा सबसे अहम होते हैं।

सफेद आक की जड़
सफेद आक की जड़

बैगा परंपरा में जड़ी-बूटियों के उपयोग से पहले पूजा-विधान की बात भी मिलती है। कुछ क्षेत्रों में माटी-पुजारी या देव-पुजारी की उपस्थिति में औषधि देने की परंपरा बताई जाती है। यह चिकित्सा के साथ संस्कृति और आस्था का मिश्रित रूप दिखाता है।

औषधि ज्ञान के संदर्भ में कबीरधाम जिले के बोड़ला विकासखंड और पंडरिया क्षेत्र के कुछ गांवों के नाम लिए जाते हैं। स्थानीय जानकारी के अनुसार, मोतीबैगा, बहनाखोदरा, चिल्पी, लमतूबगदरिया, ढिमराझुमड़िया, भुरसीपकरी, हरेसिह बैगा, बाघमाड़ा और अमनिया जैसे स्थानों में कुछ वैद्यों का विशेष ज्ञान माना जाता है। इन सूचनाओं के लिए क्षेत्रीय स्तर पर अधिक दस्तावेजीकरण की जरूरत रहती है।

बैगा छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की प्रमुख जनजातियों में माने जाते हैं। वे सतपुड़ा और मैकल श्रेणी के पूर्वी हिस्सों सहित शहडोल, डिंडौरी, मंडला, बालाघाट, बिलासपुर, राजनांदगांव और कबीरधाम क्षेत्रों में रहते हैं। कुछ स्रोत उनकी जनसंख्या लगभग चार लाख के आसपास बताते हैं और छत्तीसगढ़ में उन्हें विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा मिला है।

बैगा समुदाय में आत्मनिर्भरता की मान्यता का भी उल्लेख मिलता है। कई लोग कहते हैं कि वे बाहरी मजदूरी से बचते हैं और खुद को “वनपुत्र” मानते हैं। जीविका के लिए वे लंबे समय से आखेट और वनोपज पर निर्भर रहे हैं, बाद में खेती भी करने लगे।

खेती को लेकर उनके कुछ पारंपरिक विचार भी बताए जाते हैं। एक मान्यता के अनुसार “धरती मां” है, इसलिए एक ही जगह बार-बार जोतना उचित नहीं माना जाता। इसी संदर्भ में बेवर खेती की प्रथा का उल्लेख मिलता है, जिसमें जंगल साफ कर खेती की जाती है।

बैगा जन अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिए भी जाने जाते हैं। कुछ विवरणों के अनुसार वे बाहरी लोगों से मेल-जोल कम रखते हैं और मृत्यु होने पर घर छोड़ देने की परंपरा भी बताई जाती है। गोदना कला के प्रति विशेष लगाव का उल्लेख अक्सर स्त्रियों के संदर्भ में मिलता है।

1960 के बाद बाघ अभयारण्यों और संरक्षण क्षेत्रों के कारण विस्थापन की घटनाओं की चर्चा भी होती है। कहा जाता है कि इससे समुदाय के भीतर विखराव बढ़ा और कुछ लोग नए इलाकों में बस गए। खेती में मक्का, कोदो और कुटकी जैसी फसलों के उपयोग का भी उल्लेख मिलता है।

महिलाओं में गोदना कला की रुचि, बिंदी न लगाने, नासिका छिद्र न करवाने जैसी बातें कुछ लोक-वर्णनों में आती हैं। पुरुषों के लंबे केश और स्त्री-पुरुष के पहनावे के बारे में भी क्षेत्रवार भिन्न विवरण मिलते हैं। दशहरा, कर्मा, ददरिया, फाग और बिलमा जैसे अवसरों पर नृत्य-गान की परंपरा का भी उल्लेख किया जाता है।


गोदना

होली के आसपास महीने भर चलने वाले मड़ई पर्व को लेकर भी कबीरधाम क्षेत्र के बैगाओं के उत्साह की चर्चा होती है। बताया जाता है कि वे “देव मिलना” और “मड़ई” अपने घर से साथ लाते हैं। यह आयोजन स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा माना जाता है।

बैगा समाज पर शोध के संदर्भ में नृतत्व विज्ञानी वेरियर एल्विन का नाम आता है। विवरणों के अनुसार वे 1940 के आसपास डिंडौरी के रैतवार गांव पहुंचे और लंबे समय तक वहीं रहे। उनके निजी जीवन से जुड़ी बातें भी अलग-अलग स्रोतों में मिलती हैं, जिनमें कोशीबाई से विवाह और बाद के अलगाव का उल्लेख शामिल है।

वेरियर एल्विन
वेरियर एल्विन

कहा जाता है कि कोशीबाई के दो पुत्र हुए, और बाद में उनका जीवन कठिनाइयों में बीता। कुछ विवरण यह भी बताते हैं कि समुदाय के भीतर उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया। इन घटनाओं पर लिखित स्रोतों की भाषा और दृष्टि अलग-अलग हो सकती है।

आज भी कई बैगा परिवार वनोपज पर निर्भर बताए जाते हैं। वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत पट्टे मिलने के बाद कुछ परिवार कृषि की ओर बढ़े, ऐसा भी कहा जाता है। बोड़ला क्षेत्र में खनन गतिविधियों के कारण सांस्कृतिक बदलाव की चर्चा भी मिलती है।

जीविका के साधनों में बेवर खेती, ओझा कार्य, झाड़-फूंक, जड़ी-बूटी संग्रह और उपचार का उल्लेख मिलता है। जंगल से कंदमूल, हर्रा-बहेरा, फल एकत्र कर बेचने, मछली पकड़ने और शिकार की परंपरा भी बताई जाती है। कुछ परिवार बांस की टोकरी और चटाई बनाकर भी आय अर्जित करते हैं।

संकलनकर्ता:
श्री प्रहलाद पात्रे, कवर्धा

नोट: ऊपर लिखे कई उपचार स्थानीय परंपराओं और दावों पर आधारित हैं। किसी भी गंभीर बीमारी, सर्पदंश, रेबीज, आंख या रक्त से जुड़े लक्षणों में डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना सुरक्षित विकल्प है।

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