बैगा समुदाय का "बिदरी पूजा"
January 10, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल अष्टमी | रविवार
नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा | योग: सुकर्मा | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 अक्टूबर 2026

बैगा जनजातीय समुदाय में जंवारा नवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान है, जो गांव की सुरक्षा, समृद्धि और देवी आराधना से जुड़ा है। इसमें जवारा बोने, जोत जलाने, जसगीत गाने और सामूहिक अनुष्ठानों के माध्यम से देवी शक्ति की उपासना की जाती है। अंत में जवारा विसर्जन के साथ पूरे गांव के कल्याण की कामना की जाती है।
बैगा समुदाय में जंवारा एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है, जो गांव के पशु-पक्षियों और लोगों की सुरक्षा तथा समृद्धि के लिए की जाती है। यह परंपरा विशेष रूप से चैत्र माह की नवरात्रि के दौरान मनाई जाती है। नवरात्रि के आरंभ में गांव के मेड़ों (सीमा क्षेत्र) पर स्थित महामाई के स्थान में एक अस्थायी कुटिया (घर) बनाई जाती है। पुराने समय में इस कुटिया के लिए कुम्हार के घर से जली हुई मिट्टी लाई जाती थी, लेकिन वर्तमान में यह परंपरा सीमित रूप में निभाई जा रही है।

जवारा बोने की प्रक्रिया में गेहूं के बीज को बांस की दो टोकरियों में मिट्टी भरकर बोया जाता है। इन बीजों को नियमित रूप से पानी दिया जाता है, जिससे उनमें अंकुर निकलते हैं। कुटिया के अंदर एक मिट्टी का दीपक जलाया जाता है, जिसे "जोत जलाना" कहा जाता है। पूजा-अर्चना का कार्य बैगा समाज के सदस्य द्वारा किया जाता है, जिसे बैगा भाषा में "पंडा" कहा जाता है। पंडा प्रतिदिन सुबह और शाम दीप जलाकर नारियल अर्पित करता है और पूरे नौ दिनों तक नियमित पूजा करता है। इस दौरान जोत को लगातार जलाए रखना अनिवार्य होता है।
नवरात्रि के पांचवें दिन (पंचमी) और आठवें दिन (अठवाही) विशेष पूजा का आयोजन होता है। कुछ वर्षों के अंतराल (तीन या पांच वर्ष) में महामाई को बकरे की बलि भी दी जाती है।
इस पर्व के दौरान बैगा समाज के युवक और बुजुर्ग प्रतिदिन रात में मांदर बजाकर जसगीत गाते हैं। जसगीत की धुन सुनकर गांव के महिला-पुरुषों में देवी का प्रभाव (आवेश) आ जाता है और वे मांदर, तबला और पेटी की धुन पर झूमने लगते हैं। इस अवस्था को "झूपना" कहा जाता है।

पंडा द्वारा धूप, नारियल और अगरबत्ती के माध्यम से झूमते हुए व्यक्तियों को शांत किया जाता है। नौवें दिन जवारा ठंडा करने की परंपरा होती है, जिसमें पूरे गांव के लोग सामूहिक रूप से शामिल होते हैं। इस अवसर पर घर के आंगन में आटे से चौक (चौक-फूल) बनाया जाता है। जसगीत के दौरान जो लोग झूमते नहीं हैं, उन्हें भी अन्य झूमते हुए लोग प्रेरित करते हैं। कुछ लोग अपनी आस्था के रूप में जीभ छेद लेते हैं, झूले पर चढ़ते हैं या अपने शरीर पर कष्ट सहन करते हैं।

अंतिम दिन जवारा विसर्जन किया जाता है। इसमें तीन कुँवारी कन्याएं सफेद वस्त्र धारण कर बांस की टोकरियों में उगे हुए गेहूं (जवारा) और जोत को सिर पर रखती हैं। पंडा और गांव के अन्य लोग मांदर, तबला और टीमकी बजाते हुए नदी की ओर जाते हैं।

नदी किनारे पुनः चौक बनाकर पूजा की जाती है। इसके बाद जवारा (अंकुरित गेहूं) को एक-दूसरे के कान में लगाया जाता है, जो शुभता और आशीर्वाद का प्रतीक है। अंत में जवारा को जल में विसर्जित कर पूरे गांव की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
लेख -
श्री गोपी कृष्ण सोनी
कबीरधाम (छग)
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