आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल तृतीया | सोमवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: सौभाग्य | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 20 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल तृतीया | सोमवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: सौभाग्य | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 20 अप्रैल 2026

बाबा कार्तिक उराँव : समाज और संस्कृति के लिए संघर्ष करने वाले योद्धा

बाबा कार्तिक उराँव : समाज और संस्कृति के लिए संघर्ष करने वाले योद्धा

पंखराज साहेब जनजाति समाज के द्वारा यह उपाधि एक ऐसे युगपुरुष को दिया गया, जिन्होंने, अपने जीवन की समस्त कठिनाइयों से जूझते हुए, कड़े संघर्ष के बावजूद "ऊँची उड़ाने" भरीं।
बाबा कार्तिक उरांव का जन्म 29 अक्टूबर 1924 को वर्त्तमान झारखण्ड राज्य के गुमला जिला में पिता जौरा उरांव और माता बिरसो उरांव के एक मात्र पुत्र के रूप् में हुआ। मध्यवर्गीय किसान परिवार के कार्तिक, बचपन में काफी चंचल एवं कुशाग्र बुद्धि के धनी थे।

प्रारम्भिक शिक्षा खोरा जाम टोली के बाद एस.एस. हाई स्कूल गुमला में हुई। वर्ष 1941 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद, आगे की पढ़ाई पटना जाकर करने के लिए पर्याप्त धन के अभाव में उसी विद्यालय के कार्यालय में लगभग 1 साल तक काम करके धनराशि इकट्टा की। 1942-44 में पटना साइंस कॉलेज से इण्टरमीडिएट करने के दौरान राष्ट्रीय छात्रवृति मिलने से उनकी मुश्किलें कुछ कम हुई। वर्ष 1948 में पटना इंजीनियरिंग कॉलेज से उत्तीर्ण होने के दो वर्ष बाद 1950 में बिहार सरकार के सिंचाई विभाग में सहायक अभियंता के पद पर नौकरी करने लगे। उसी वर्ष गुमला जिला निवासी डिप्टी कलेक्टर तेजू भगत की द्वितीय सुपुत्री सुमति उरांव से उनका विवाह हुआ। 1952 में उच्च शिक्षा हेतु लंदन प्रस्थान कर गए। लगभग 10 वर्ष के लंदन प्रवास के दौरान उन्होंने सिविल स्ट्रकचरल इंजीनियरिंग की कई बड़ी डिग्रियाँ हासिल की। ब्रिटिश सरकार ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए, विश्व के प्रथम एवं विशाल न्यूक्लियर ऐटोमिक पावर स्टेशन के डिजाईनिंग टीम में शामिल किया। आज भी यह न्यूक्लियर प्लांट हिंक्ले प्वाईंट में शान से खड़ा है। शिलापट पर उनका अंकित नाम इस बात का प्रमाण है।

लंदन/ब्रिटेन दौरे के दौरान, एक भारतीय जनजाति युवक की ऐसे प्रतिष्ठित प्रोजेक्ट में शामिल होने की बात जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक पहुँची तो उन्होंने कार्तिक उरांव को साउथ हॉल, लंदन में बातचीत के लिए बुलवाया और देश के नवनिर्माण में अपना योगदान देने के लिए प्रेरित किया। 1961 में स्वदेश लौटने पर H.E.C. को धुर्वा में खड़ा करने की जिम्मेदारी मिली, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।

जनजाति समाज में व्याप्त कुरीतियों को देखते हुए निर्णय लिया कि समाज के शैक्षणिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक चेतना और उत्थान के लिए एक अलग व्यवस्था बनानी होगी। वे 1967, एवं 1980 ई. में तीन बार लोकसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए साथ ही 1977 ई. में बिहार विधान-सभा सदस्य के रूप में विधायक बने।

वे जबरन धर्मान्तरण के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि अंग्रेजों ने 150 वर्षों के अपने शासन काल में भोले-भाले, जंगलों-गाँवों में रहने वाले जनजातियों का उतना धर्मान्तरण नहीं किया जितना आजादी के 25 वर्षों में प्रलोभन, लोभ लालच देकर जनजातियों को ईसाई बनाया गया। जनजाति समाज की परम्परा, रीति-रिवाज, संस्कृति की रक्षा एवं धर्मान्तरण से इनके बचाव के लिए लोकसभा में उन्होंने 10 जुलाई 1967 को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक 1967 में प्रविष्ट किया। विचार विमर्श के लिए के लिए संयुक्त समिति को सुपर्द किया गया। संयुक्त समिति ने बहुत छानबीन के बाद 17 नवम्बर 1969 को लोकसभा में अपनी संयुक्त समिति की सिफारिशों में एक सिफारिश यह भी थी।

"कंडिका 2 में निहित किसी बात के होते हुए कोई भी व्यक्ति जिसने जनजातीय तथा विश्वासों का परित्याग कर दिया हो और ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया हो, वह अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं समझा जायेगा।" लेकिन कुछ विदेशी शक्तियों के दबाव में काफी समय तक यह ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। फिर उनके भागीरथ प्रयास से दो साल के बाद दिनांक 10 नवम्बर 1970 तक उन्होंने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक 1967 के समर्थन में 348 संसद सदस्यों का हस्ताक्षर युक्त स्मरण पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी को दिया।

16 नवम्बर 1970 को लोक सभा में बहस शुरू हो गई लेकिन ऐसी मान्यता है कि विदेशी सरकारों के दबाव में जनजाति समाज के अस्तित्व की रक्षा के लिए लोकसभा में प्रस्तुत किया गया अति महत्वपूर्ण अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक 1967 बगैर बहस के सदन के पटल से हटा दिया गया। न्याय की उम्मीद लगाये बैठे जनजाति समाज के लिए यह एक त्रासदी से कम नहीं था। अपनी ही राजनैतिक दल के द्वारा मिले इस धोखे से उन्हें गहरा आघात लगा। अपनी चर्चित पुस्तक "बीस वर्ष की काली रात" में उन्होंने पूरे लोकसभा के इस प्रकरण का बड़ा मार्मिक वर्णन किया है।

स्व. कार्तिक उराँव, एक दूरदर्शी, कुशल राजनेता और उच्च कोटि के प्रशासक थे। उन्होंने अपने जीवन काल में कई उल्लेखनीय और प्रशंसनीय कार्य किए। 60 के दशक में जब संत विनोबा भावे के आव्हान पर पूरे देश में भू-दान आंदोलन चलाया जा रहा था, तो कार्तिक बाबू ने इसका विरोध यह कहकर किया कि "एक जनजाति व्यक्ति के जीवन का अस्तित्व का आधार उसकी जमीन है, जमीन नहीं रहेगी तो जनजाति भी नहीं बचेगी।" परिणाम स्वरूप भूमि वापसी अधिनियम 1969 में बनाया गया और जनजातियों की जमीन दान में जाने से बची और वापस भी हुई। उनके कार्य के चलते समाज उन्हें मसीहा मानने लगा।

जब एकीकृत बिहार से अलग, झारखण्ड राज्य की मांग को लेकर कई आंदोलन चल रहे थे। तब 70 के दशक में कार्तिक बाबू ने ठोस रूप से बिहार राज्य में रहते हुए ही अलग व्यवस्था का प्रारूप बनाया। छोटानागपुर : संथाल परगना स्वाशासी विकास प्राधिकार (Chotanagpur Santhal Pargana Autonomous Devepolment Authority) और उसके लिए कभी न Lapse होने वाला बजट का प्रावधान लाया। साथ ही विकास प्राधिकार के सुचारू ढंग से संचालन के लिए देश का प्रथम मिनी सचिवालय की स्थापना भी करवाई। 70 के दशक में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृतज्ञता स्वरूप विश्वविद्यालय परिसर में उनकी आदमकद प्रतिमा लगी हुई है। साथ ही उद्वाहक सिंचाई योजना (Lift Irrigation) की रूपरेखा भी

उन्हीं की देन है। उनका सपना था बिहार, उड़ीसा और मध्यप्रदेश राज्यों की जुड़ती हुई सीमा पर जनजाति भक्ति निकेतन विश्वविद्यालय स्थापति हो, जिसमें हर तरह के प्रोफेशनल कोर्सेस की पढ़ाई हो, जहाँ जनजाति के अलावा कुछ प्रतिशत सीट गैर-जनजाति बच्चों के लिए भी रहें। इस विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करके निकलने वाले सिर्फ भारतीय कहलाएँ। 1981 में दिल्ली स्थित तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित अखिल भारतीय जनजाति विकास परिसद के राष्ट्रीय अधिवेशन में बतौर मुख्य अतिथि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जी के सामने जब यह प्रस्ताव कार्तिक बाबू ने रखा तो इंदिरा जी ने सहर्ष स्वीकृति दे दी और उसी मंच पर मौजूद मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने फौरन 2 लाख रकम दी लेकिन कार्तिक उराँव के असामयिक निधन के कारण यह सपना अधूरा रह गया।

उन्होंने अपनी मेधा, निष्ठा, परिश्रम एवं दृढ़ इच्छा शक्ति के आधार पर जीवन पर्यन्त स्वयं मार्ग प्रशस्त किया तथा निस्वार्थ भाव से समाज और देश की सेवा की। समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक शक्ति का संचार किया। बिहार के मुख्यमंत्री पद को ठुकराने वाले कार्तिक उराँव ने पूरे देश की जनजातियों को एक सूत्र में बाँधकर उन्हें संगठित कर उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक उत्थान के लिए पूरे देश में घूमकर एक जनजातीय संगठन का गठन वर्ष 1967-68 में किया जो कि आज देश के 29 राज्यों में सुचारू ढंग से संचालित है। राष्ट्रीय स्तर का एकमात्र गैर-सरकारी, गैर-राजनीतिक जनजाति संगठन होने की विशिष्टता रखता है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अभियंता "काला हीरा" कहलाने वाले विद्वान कार्तिक उराँव ने भारत सरकार एवं राज्य सरकार के विभिन्न उपक्रमों में सेवाएं दी। तीन बार सांसद, एक बार विधायक एवं अपने जीवन के अंतिम कालखंड में उड्‌डयन एवं दूरसंचार मंत्रालय के केन्द्रीय मंत्री के रूप में देश और समाज की सेवा करने वाले, सच्चे समाजसेवी एवं देशभक्त थे, विद्वान, प्रखर वक्ता जब सदन (पार्लियामेंट हाउस विधानसभा) में अपनी बातों को रखते, तो सभी ध्यानपूर्वक उनकी बातों को सुनते थे। देश और समाज के प्रति गहरी चिंता रखने वाले कार्तिक उराँव निरंतर जनजाति समाज की बेहतरी के लिए सदैव चिन्तनशील रहे। वे दिनांक 8 दिसंबर 1981 को पार्लियामेंट हाउस के शीतकालीन सत्र में भाग लेने पहुँचे और हाउस में ही अचानक अस्वस्थ हो गये और हृदय गति रूकने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी आकस्मिक मृत्यु से भले ही एक युग का अन्त हुआ हो, मगर उनका चिंतन, विचारधारा और अधूरे सपनों को लेकर अखिल भारतीय जनजाति विकास परिषद जिसकी शाखाएँ 29 राज्यों में फैली हुई है, सम्पूर्ण जनजाति समाज के शैक्षणिक, सांस्कृतिक उत्थान के साथ सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं। अपने निरंतर संघर्षपूर्ण जीवन पथ के सफर को सिर्फ 57 वें साल में पूर्णविराम लगाने वाले कार्तिक बाबू की जीवन गाथा का प्रत्येक अध्याय प्रेरणा-पुंज का काम करता है।

लेख -
पूरन लाल परते

Follow us on social media and share!