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अशारीकांडी टेराकोटा: मिट्टी की कला और संघर्ष की अनूठी दास्तान

अशारीकांडी टेराकोटा: मिट्टी की कला और संघर्ष की अनूठी दास्तान

77वें गणतंत्र दिवस की परेड और नई दिल्ली का 'कर्तव्य पथ'! गत 26 जनवरी को कर्त्तव्य पथ पर  असम की झांकी देखकर हम सभी को गर्व और प्रसन्नता हुई होगी । इस झांकी में धुबरी जिले के अशारीकांडी गांव के टेराकोटा शिल्प की एक झलक दिखाई गई थी। निश्चित रूप से इस वैश्विक मंच ने इस गांव और इसकी कला को पूरी दुनिया के सामने ला खड़ा किया है। लेकिन हम में से कितने लोग इस गांव की कला के मूल स्वरुप को जानते हैं? आज मैं इसी विषय को छूने का प्रयास कर रहा हूँ।

टेराकोटा में मिटटी से बने खिलौने

टेराकोटा क्या है? सबसे पहले यह जान लेते हैं कि टेराकोटा आखिर है क्या? सरल शब्दों में कहें तो टेराकोटा मिट्टी से बनी आकृतियों का ही एक रूप है। इसे देखते ही आंखों के सामने कुम्हार के चाक का वह दृश्य घूम जाता है, जहां कलाकार मिट्टी के एक लोंदे को अपने सधे हुए हाथों से घड़े, बर्तन, प्लेट, सजावटी सामान और बच्चों के लिए प्यारी सी गुड़िया का आकार देता है । हम सभी को यह तो अछे से ज्ञात होगा की सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों में प्राप्त अधिकांश पुरातात्विक स्त्रोत इसी टेराकोटा के हैं।

हीरामती की खासियत: अशारीकांडी टेराकोटा में ऐसा क्या खास है? दरअसल, इस गांव के आसपास 'हीरामती' नामक एक विशेष प्रकार की मिट्टी पाई जाती है। इस मिट्टी से बनी वस्तुएं अन्य मिट्टी के बर्तनों की तुलना में कम भंगुर (जल्दी टूटने वाली) होती हैं और देखने में अधिक आकर्षक लगती हैं। अक्सर प्राचीन सभ्यताओं की खुदाई में टेराकोटा की वस्तुएं सदियों बाद भी सुरक्षित मिलती हैं। यही कारण है कि हीरामती और टेराकोटा इन शिल्पकारों के लिए बहुत विशेष हैं।

अब सवाल उठता है कि क्या 'हीरामती' सामान्य मिट्टी से अलग है? हीरामती एक बेहद चिपचिपी मिट्टी होती है, जिसमें थोड़ी मात्रा में रेत मिलाई जाती है। सामान्य कुम्हार जो मिट्टी इस्तेमाल करते हैं, वह भी चिपचिपी होती है, लेकिन उसमें रेत का मिश्रण नहीं होता । रेत मिलाने से मिट्टी के गुण बदल जाते हैं और वह टेराकोटा के लिए उपयुक्त हो जाती है ।

अशारीकांडी की भौगोलिक स्थिति: अशारीकांडी असम के धुबरी जिले के डेबिटोला विकास खंड का एक गांव है। यह ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी 'गदाधर' के तट पर स्थित है। नदियों के पास होने के कारण कारीगरों को अपना सामान बेचने के लिए जलमार्ग का लाभ मिलता है। इसके अलावा, गौरीपुर और धुबरी से सड़क मार्ग भी उपलब्ध है। धुबरी यहां से 14 किमी और निकटतम रेलवे स्टेशन गौरीपुर 8 किमी दूर है। गांव की अधिकांश आबादी पीढ़ियों से इसी कला से जुड़ी है।

नाम की उत्पत्ति - अशारीकांडी: स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, यह नाम दो शब्दों के मेल से बना है— 'असार' (असमिया कैलेंडर का तीसरा महीना) और 'कांडी' (रोना)। इस महीने में असम में मूसलाधार बारिश होती है, मानो आसमान रो रहा हो। वहीं एक अन्य मान्यता यह है कि अत्यधिक बारिश और बाढ़ के कारण यहां के कारीगर अपनी बनाई वस्तुओं को न तो सुखा पाते थे और न ही सुरक्षित रख पाते थे। तैयार माल बर्बाद होने पर कारीगरों के पास रोने के अलावा कोई चारा नहीं बचता था, शायद इसीलिए इसका नाम 'अशारीकांडी' पड़ा।

कला का इतिहास: 19वीं शताब्दी की शुरुआत में, पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) से 'पाल' समुदाय के कुछ परिवार यहां आकर बस गए। हीरामती की उपलब्धता और जल परिवहन की सुविधा को देखते हुए उन्होंने इसे अपना घर बना लिया। उन्होंने अपनी पारंपरिक कला में नए नवाचार (innovations) किए, जिससे असम की इस विशिष्ट टेराकोटा शैली का जन्म हुआ। आज अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग बढ़ने से इन कारीगरों की आजीविका में सुधार हुआ है।

मशहूर कलाकार: यहां के कलाकारों में स्वर्गीय सरला बाला देवी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। उन्हें 1982 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनके द्वारा बनाई गई 'गोद में बच्चा लिए मां' की प्रतिमा, जिसे 'हाथीमा डोल' (Hatima Doll) कहा जाता है, ने इस कला को वैश्विक पहचान दिलाई। उनके पुत्र धीरेंद्र नाथ पाल भी एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार हैं। साथ ही महादेव पाल को उनकी 'भगवान गणेश' की प्रतिमा के लिए राजकीय पुरस्कार मिला है।

विकास के कदम: 'नेकार्डो' (NECARDO) नामक एक एनजीओ 2006 से यहां यूएनडीपी (UNDP) के तहत इस कला के संरक्षण और कारीगरों के उत्थान के लिए काम कर रहा है। असम सरकार ने इसे 'मॉडल विलेज' घोषित कर ग्रामीण पर्यटन से जोड़ा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी 'मन की बात' में अशारीकांडी टेराकोटा का जिक्र करते हुए 'वोकल फॉर लोकल' का संदेश दिया था। सिडबी (SIDBI) और नाबार्ड जैसे संस्थानों ने भी यहां वेयरहाउस और बुनियादी सुविधाओं के निर्माण में मदद की है।

विकास परियोजनाओं के सही कार्यान्वयन से अशारीकांडी की इस कला का भविष्य उज्ज्वल है। यदि सरकार द्वारा आवंटित धन का सही उपयोग होता रहा, तो कठिन महीनों में कारीगरों की आंखों में आंसू के बजाय उनके चेहरों पर मुस्कान नजर आएगी।

लेख- प्रणब फुकन
साभार- हेरिटेज फाउंडेशन.

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