आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

क्या हम सच में आजाद हुए हैं?

क्या हम सच में आजाद हुए हैं?

हमें अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिले हुए 79 वर्ष हो गए हैं। प्रतिवर्ष हम सब जैसे ही पन्द्रह अगस्त आता है तो इस दिन आजादी का पर्व स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। इस दिन हम हमारे देश की आजादी में अपने प्राणोत्सर्ग  करने वाले, महात्मा गाँधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई,  झलकारी बाई, सरोजिनी नायडू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मंगल पांडे, चन्द्रशेखर आजाद, लाला लाजपत राय, बेगम हजरत महल जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों और  वीरांगनाओं को स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि भाव समर्पित करते हैं।

इन सभी के अथक प्रयासों से ही हम भारतवासियों को 15 अगस्त 1947 को  भौगोलिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति हुई। हम सबको भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से स्वतंत्रता की प्राप्ति तो हो गई, किंतु क्या हम मानसिक रूप से स्वतंत्र हो पाए हैं? यह एक प्रश्न सोचने के लिए मजबूर कर देता है, जो बहुत ही गंभीर चिंतन का विषय है। 

कलयुग अर्थात मशीनी युग के विकास के इस दौर में लोग स्वतंत्रता का अर्थ कुछ अलग ही ले लेते हैं। घर से बाहर निकलने की आजादी, खाने-पीने की आजादी, अपने मनमर्जी तरीके से जीने के तौर-तरीके लोग इन्हीं को आजादी समझने लगे हैं। यही भाव हमारे सोच को संकीर्ण बना रहा है। जिसके कारण लोग आज मानसिक परतंत्रता की गुलामी में जकड़े हुए हैं। "मानसिक स्वतंत्रता" पाना अब भी एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यदि हम अपने भीतर झाँककर देखें, तो कई ऐसे पहलू हैं जहाँ हम आज भी किसी न किस रूप में परतंत्रता महसूस करते हैं। 

 विचार और सोच की गुलामी
हम एक ऐसे भारत में रहते हैं जहाँ लोग कहते हैं हमें विचार और सोच की स्वतंत्रता है, किंतु आज भी लोग भाषा, पहनावा, रहन-सहन के आधार पर मनुष्य को नापते हैं। जब कहीं किसी कार्यक्रम में, सफर के दौरान बस, ट्रेन आदि में, चौंक-चौराहे में, किसी संस्थानों में  यदि कोई व्यक्ति अंग्रेजी में बात करता है तो लोग उन्हें ही श्रेष्ठ और सम्मान के नजरिए से ज्यादा देखते हैं। वहीं, अगर एक व्यक्ति अपने सामान्य परिवेश की बोलचाल की भाषा को प्रयुक्त करता है, तो उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है। आज भी लोग अपनी प्राचीन संस्कृति, साहित्य और परंपरा को अंगीकार नहीं कर पा रहे हैं। इसी कारण लोग आपस में एक दूसरे को निम्नतर आँकने लगते हैं जो कि मानसिक गुलामी है, भीतर की गुलामी है इसे हम आजादी नहीं कह सकते।

जाति और संप्रदाय की परतंत्रता
जाति, संप्रदाय की दृष्टिकोण से देखें तो आज भी लोग गुलाम हैं। समाज में, चाहे उच्च वर्ग हो या निम्न आज भी जात-पात के बंधन में लोग ऊँच-नीच के आधार पर लोगों का आकलन करते हैं। इंसान आज कितने भी पढ़-लिख कर बड़े ओहदे पर पहुँच गए हैं, किंतु सोच में बदलाव अभी भी शेष है। 


जाति, पंथ और सामाजिक पहचान की विविधता

आज देश श-समाज में साम्प्रदायिक दंगे फसाद इतने ज्यादा हो रहे हैं कि लोगों का घर से निकलना मुश्किल होता जा रहा है। आपसी मनभेद और मार-काट इतने बढ़ते जा रहे हैं कि लोगों में दहशत फैलते जा रहा है। यहाँ पर विवश होकर कहना पड़ता है कि हम सच्चे मायने में स्वतंत्र नहीं हुए हैं। जब तक सोच में बदलाव नहीं होगा देश-समाज में हम नहीं कह सकते कि हमें पूर्णतः आजादी प्राप्त हो चुकी है। लव जिहाद, हिंदु-मुस्लिम, सनातन धर्म आदि के नाम पर न जाने देश में कितनी अराजकताएँ फैल रही हैं। 

जाति और संप्रदाय की परतंत्रता एक ऐसा मानसिक और सामाजिक जकड़न की रोग है जहाँ व्यक्ति अपनी स्वतंत्र सोच, योग्यता या इच्छा के बजाय अपनी जाति या धार्मिक संप्रदाय के बंधनों से नियंत्रित होता है। यह व्यक्ति की आजादी को सीमित करती है। इस प्रकार के विचार समाज को बाँट कर मानवीय विकास में रुकावट पैदा करने का कार्य करती है।

लोग क्या कहेंगे?
आज भी मानव मस्तिष्क में ऐसे पूर्वाग्रह हैं जो उन्हें भीतर से जीने नहीं देती। हमारे रहन-सहन, आचार-विचार, कार्यशैली, व्यवसाय आदि के बारे में लोग क्या कहेंगे? यह विचार कर ही लोग आगे बढ़ने में अपनी सोच को विकसित करने में असफल हो जाते हैं। इसी कारण जब तक हम ‘लोग क्या कहेंगे?’ इस भावना को अपने भीतर से नहीं मिटाएँगे तब तक हम अपने किसी भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएँगे। इन्हीं सब पूर्वाग्रहों से मानव अपने भीतरी  जेल में कैद रहते हैं और खुलकर जीने की आज़ादी को खो देते हैं, तब कहना पड़ता है, क्या हम वास्तविक में स्वतंत्र हुए हैं? हम अब भी दूसरों की परतंत्रता में जकड़े हुए हैं।


सामाजिक अपेक्षाओं और ‘लोग क्या कहेंगे’ के भय में व्यक्ति

अपनी श्रेष्ठता को दूसरों से कमतर आँकना
भौतिकवाद के इस युग में आज अधिकांश लोग तकनीकी, सोशल मीडिया, व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम ट्विटर के माध्यम से लाइक-कमेंट्स और एक दूसरे की रील्स आदि की प्रतिस्पर्धा में व्यक्तिगत रूप से गुलाम बनते जा रहे हैं। एक व्यक्ति दूसरे का स्टेटस, वीडियो, इंस्टाग्राम आदि में अच्छी चीजों को देखकर अपनी चीजों को कम आँकने लगते हैं। स्वयं की रील्स, वीडियो आदि पर कमेंट्स, लाइक्स न मिलने पर हताश होते हैं और झूठी चमक-धमक में फंसकर अपना समय बर्बाद करते हैं। अपनी स्वतंत्रता को खोकर मानसिक गुलाम बनते जाते हैं। इन्हीं सब कारणों से आज कई लोग अपने भीतर की हुनर को पहचानने में असफल हो रहे हैं और कुंठाग्रस्त होकर गुलामी का शिकार हो रहे हैं।


सोशल मीडिया और तुलना

लोग अपनी इच्छाओं को मार कर दूसरे की देखा-देखी में बाहर से प्रसन्नचित्त रहने का खोखला दिखावा करते हैं और भीतर से स्वयं अंतर्द्वंद्व की परतंत्रता में फंसे रहते हैं। ऐसे विचार वाले लोगों को देखकर कहना पड़ता है कि हम पूर्णतः आजाद नहीं हुए हैं।

जब तब हम सभी अपने भीतर नैतिकता और मानवता, परोपकार की भावना और दूसरों को सम्मान देने की भावना नहीं अपनाएँगे तब तक भीतर की परतंत्रता से जकड़े रहेंगे। जब तक हम अपना आकलन दूसरों से निम्नतर करते रहेंगे और अपने आत्मविश्वास को ऊपर नहीं उठाएँगे, दूसरों को सम्मान नहीं देंगे तब तक हम सही मायने में आजाद नहीं हो सकते। भीतर की आजादी ही सच्चे मायने में हमारी पूर्णतः आजादी है।

डॉ पद्‌मा साहू पर्वणी
खैरागढ़ छत्तीसगढ़

Follow us on social media and share!