राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

गंडई की सुरही नदी सदानीरा है। बड़ी-बड़ी नदियाँ भीषण गर्मी में सूख जाती हैं, परन्तु सुरही नदी में जल प्रवाह बारहों महीने बना रहता है। सुरही नदी अपने उद्गम बंजारी से लेकर संगम कौहागुड़ी (शिवनाथ नदी) तक अनेकों पुरातातविक स्थलों को अपने आँचल में सेमेटी हुई है। गंडई अंचल अपनी पुरातात्विक संपदा के लिए पूरे छत्तीसगढ़ में पहचाना जाता है।
भंवरदाह, भड़भडी, दुरपता मंदिर, घटियारी, बिरखा, कटंगी, कृतबाँस, पंडरिया, गंडई, टिकरीपारा, बागुर, तुमड़ीपार, देऊर भाना, सहसपुर, देवकर, देवरबीजा, जैसे प्रमुख पुरातात्विक स्थान सुरही नदी के किनारे या करीब बसे हुए हैं। कल्चुरी काल में निर्मित यहाँ के मंदिर गंडई, सहसपुर, देवरबीजा में पुरी तरह सुरक्षित और संरक्षित हैं। शेष स्थानों पर केवल मंदिर के शिला खंड व पुरातात्विक अवशेष ही मिलते है। बड़ी संख्या में उपलब्ध ये पुरावशेष इन स्थानों की गौरव गरिमा को प्रमाणित करते है।

सुरही नदी के किनारे स्थित टिकरीपारा गाँव मेरी जन्म भूमि है। यही मेरी कर्म भूमि भी है। बचपन से लेकर अब तक का जीवन सुरही नदी के नीर से ही अभिसिंचित रहा है। सुरही नदी मेरे रचना कर्म की प्रेरणा भूमि रही है। भँवरदाह का जंगल हो या घटियारी, भड़भड़ी, टिकरीपारा के प्राचीन मंदिर हों, या सुरही नदी के रपटा घाट का गुलाम बगीचा या फिर छोटे घाट का आम बगीचा। ये सब लोक और लेखन से जुड़ने के लिए मुझे प्रेरित करते रहे। सभी स्थलों के बारे में लिखा लेकिन ‘‘देऊर भाना‘‘ छूट गया था। ऐसा कोई संयोग नहीं बना, वहाँ तक जाने का। एक दिन मन में ठाना, कि आज मुझे है जाना ‘‘देऊर भाना‘‘। आया तो मन की साध पूरी हो गई।
देऊर भाना का शिव मंदिर बेमेतरा जिले के परपोड़ी नगर से दक्षिण दिशा में लगभग सात किलो मीटर की दूरी पर उत्तर-पूर्व दिशा में है। परपोड़ी पहुंच कर मैंने अपने परिचित सुदामा वर्मा कुरलू वाले को फोन किया और देऊर भाना जाने की इच्छा व्यक्त की। वे सहर्ष तैयार हो गए।
सुदामा वर्मा देऊर भाना से परिचित थे। इसलिए जाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। परपोड़ी से बोरतरा मार्ग पर दो किलो मीटर पक्की सड़क से होकर हम दाँई ओर बगडाँवर गाँव के लिए मुड़े। मुरूम की सड़क है। गर्मी के दिनों में तो कोई असुविधा नहीं होगी। लेकिन बरसात के दिनों में तकलीफ होगी। ऐसी सड़क की स्थिति बता रही थी।
घर परिवार की बातें करते हम वर्मा जी के साथ बगडाँवर पहुँचे तो सुरही नदी को देख कर मन अति आनंदित हुआ। एनीकट बंधान के कारण दूर तक जल का भराव, दक्षिणी किनारे पर विशाल अमराई, कूकती कोयल, दोनों किनारों के ऊँचे-ऊँचे पेड़ जैसे अपनी बाँहे फैलाकर हमारा स्वागत कर रहे थे। सुरही नदी के उत्तरी किनारे से चलते चलते हमने अनुभव किया कि खेतों में मुरझाए चना और गेहूँ की फसलें बेमौसम बारिस और ओला वृष्टि के कारण किसानों की करूण स्थिति को व्यक्त कर रही थी। दूर से ही मंदिर का लहराता हुआ ध्वज और चूने से पूता मंदिर दिखाई देने लगा।

मंदिर पहुँचे तो सेवादार सीताराम आदिवासी से भेंट हुई, जिनकी उम्र लगभग 85 वर्ष है और विगत 50 वर्षो से मंदिर की सेवा में लगे हैं। पूछने पर उन्होने बताया की 50साल पहले यहाँ सीताफल की घनी झाड़ी थी। उसी झाड़ी में नंदी बैल, जलहरी और कुछ खंड़ित प्रतिमाएं मौजूद थीं। उसे देखकर प्रभुराम आदिवासी जो निसंतान थे, उन्होंने उस स्थान पर मंदिर बनाने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन जमीन पर नंदेल आदिवासी का मालिकाना हक था।
गाँव वालों की प्रेरणा से प्रभुराम के मंदिर निर्माण की इच्छा का सम्मान करते हुए नंदेल ने अपनी जमीन पर मंदिर निर्माण की स्वीकृति दे दी। इस तरह मंदिर का निर्माण हुआ। नींव खुदाई के समय अनेक प्राचीन मूर्तियाँ निकलीं, जिसे कारीगर ने अपनी सूझबूझ से मंदिर की दीवारों पर चारों ओर लगा दिया है। मंदिर से लगा हुआ छोटा सा मैदान है, जहाँ पर महाशिवरात्री के दिन मेला लगता है। दूर-दूर से लोग शिवजी के दर्शन के लिए आते हैं।
मैंने सीताराम जी से पूछा कि इसे ‘देऊर भाना‘ क्यों कहते है ? उन्होने इस संबंध में अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। पर मेरा मन बार-बार ‘देऊर भाना‘ पर ही जोर दे रहा था। गंडई के प्राचीन शिव मंदिर को ‘देऊर भाँड़‘ कहते हैं। आरंग के जैन मंदिर को ‘देवल भाँड़‘ कहते हैं। देवरबीजा जहाँ सीता मंदिर है। ये तीनों मंदिर पहले भग्न थे, जिन्हे संरक्षित किया गया है।
देऊर का अर्थ है देवालय, मंदिर और भाँड़ का अर्थ है भग्न। हो सकता है देऊर भाना में भाना शब्द भी भाँड़ अर्थात भग्नता की ओर इंगित करता हो। क्योंकि देऊर भाना का शिव मंदिर भी भग्न अवस्था में ही मिला। जिसका नव निर्माण कराया गया है। देऊर भाना के पुरावशेष और खंड़ि़त प्रतिमाएं इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करती हैं।

एक छोटे से मंदिर में मूल जलहरी जो काले पत्थर से निर्मित है स्थापित है। उस पर संगमरमर का शिवलिंग ग्रामीणों द्वारा स्थापित किया गया है। मूल नंदी की प्रतिमा जो खंड़ित स्थिति में है, जलहरी के समानांतर विराजित है। जबकि शास्त्रानुसार नंदी को शिवलिंग के सम्मुख पश्चिमाभिमुख होना चाहिए था। चूंकि मंदिर पूर्वाभिमुखी है। इसी परिसर में अनेक खंड़ित मूर्तियाँ हैं, जो स्थानीय स्तर पर प्राप्त पत्थरों से बनी हुई हैं। लगा हुआ नंदेश्वर की आधुनिक प्रतिमा है।
जिस मंदिर में प्राचीन मूर्तियाँ दीवरों पर लगी हैं, वहाँ गर्भ गृह में संगमरमर का शिवलिंग स्थापित है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियों के अलावा, योद्धा गजसमूह, नवयौवना, व अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लगी हुई हैं। चूंकि इन मूतियों पर चूने की कई परतें चढ़ी हुई हैं। इसलिए इनकी कलात्मकता की प्रमाणिक पहचान नहीं हो पाती।
अच्छा होगा कि चूने की परतों को साफ कर दिया जाय, तो इसका पुरातात्विक महत्व सिद्ध होगा। निसंदेह देऊर भाना एक महत्व पूर्ण पुरातात्विक स्थल है। देऊर भाना जाकर वर्षो की साध पूरी हुई। सुरही नदी के तीरे-तीरे, चल रे मन धीरे-धीरे।
आलेख
डाॅ. पीसी लाल यादव
‘‘साहित्य कुटीर‘‘
गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव (छ.ग.)
मो. नं. 9424113122
राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
फाग का लोकरंग
February 27, 2026
हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ी संस्कृति में खेलों की जीवंत परंपरा
July 24, 2025
लोक परंपरा में नारी शक्ति का उत्सव : तीजा-तिहार
July 22, 2025
आस्था और विश्वास का केन्द्र : नर्मदा
July 02, 2025
जनजातीय अनुष्ठान : गौरी-गौरा पूजा
April 30, 2025
छत्तीसगढ़ी फाग का लोकरंग
March 25, 2024
कुदरत का नजारा, धाँस की जलधारा
December 05, 2023
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में नदियों का महत्व
October 13, 2023
नरोधी नर्मदा जहाँ झिरिया से बुलबुलों में निकलता है जल
August 05, 2023
रमणीय बुजबुजी एवं नथेला दाई
July 15, 2023
प्रदक्षिणा की संस्कृति : राजिम की पंचकोशी यात्रा
June 15, 2023
लोक संस्कृति का जीवन सरिताएं
June 05, 2023
परम्परा के संवाहक भ्रमणशील कथा गायक : बसदेवा
May 15, 2023
बकरकट्टा के बैगा और उनका देवलोक
May 08, 2023
कोल जनजाति का देवलोक
May 01, 2023
छत्तीसगढ़ का लोक पर्व : तीजा तिहार
August 30, 2022
मोटियारी घाट की बंजारी माता : नवरात्रि विशेष
October 09, 2021
छत्तीसगढ़ का पर्यटन स्थल : बैताल रानी घाट
September 01, 2021
चोड़रापाट के डोंगेश्वर महादेव : सावन विशेष
August 11, 2021
छत्तीसगढ़ का हरेली त्यौहार एवं लोक प्रचलित खेलों की परम्परा
August 08, 2021
जानो गाँव के प्रस्तर शिल्पकार
July 14, 2021
छत्तीसगढ़ी लोक में रचा बसा रथदूज का त्यौहार
July 12, 2021
लोक जीवन की शक्ति, लोक पर्व अक्ति
May 14, 2021
पंडवानी के सूत्रधार श्रीकृष्ण
April 26, 2021
कुँवर अछरिया की लोक गाथा एवं पुरातात्विक महत्व
April 09, 2021
छत्तीसगढ़ी बालमन की मनोरंजक तुकबंदियाँ
April 05, 2021
छत्तीसगढ़ के लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ
April 01, 2021
दे दे बुलौआ राधे को नगर में : होली फाग गीतों के संग
March 27, 2021
लोक का सांस्कृतिक उत्सव: मड़ई
February 10, 2021
छत्तीसगढ़ी लोक शिल्प : कारीगरी
February 03, 2021
छेरिक छेरा छेर बरकतीन छेरछेरा : लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी
January 28, 2021
प्राचीन इतिहास की साक्षी घटियारी
January 16, 2021
प्राकृतिक हरितिमा और भौगोलिक सौंदर्य का अतुलनीय संगम : कुआँ धाँस
December 08, 2020
अन्न बहन-बेटी तथा मां के प्रति सम्मान का लोकपर्व पोला
August 18, 2020
लोक आस्था का दर्पण : आठे कन्हैया
August 11, 2020
प्रकृति-प्रेम का प्रतीक : भोजली
August 04, 2020
छत्तीसगढ़ का हरेली तिहार और खेल की लोक परम्परा
July 20, 2020
प्रकृति का अजूबा मंडीप खोल : छत्तीसगढ़
June 03, 2020
सुरही नदी के तीर देऊर भाना के पुरातात्विक अवशेष
March 23, 2020
छत्तीसगढ़ का लोक साहित्य एवं वाचिक परम्परा
March 19, 2020
गंडई का शिवालय जहाँ पाषाण बोलते हैं
March 12, 2020
राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो
September 06, 2026
शिक्षक दिवस विशेष: संविधान सभा में डॉ. राधाकृष्णन के विचार
September 05, 2026
रायपुर : विशेष लेख : नक्सलमुक्त क्षेत्रों में शिक्षा की नई भोर
September 05, 2026
डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा
September 04, 2026
छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला
September 04, 2026
“कोटा (नंदगाँव) की कृष्ण जन्माष्टमी की अनूठी परम्परा”
September 04, 2026
देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य
September 04, 2026
श्री कृष्ण का वैदिक स्वरूप
September 03, 2026
संतान सुख और रक्षा, मातृत्व का पर्व: हलषष्ठी (खमरछठ)
September 02, 2026
बघेरा(केकड़ी) के मूर्ति शिल्प में विष्णु अवतार बलराम
September 02, 2026
लोक-अनुभव का भंडार: हमारी वाचिक परंपरा
September 01, 2026
प्रकृति और नारी के उल्लास का पर्व- कजली तीज
August 31, 2026
सांस्कृतिक व शैक्षिक तत्वों से भरपूर है:छतीसगढ़ी लोक खेल
August 30, 2026
संस्कृत ध्वनियों का उच्चारण एक सहज योग
August 29, 2026
लोकपर्व भोजली
August 29, 2026
रक्षाबन्धन : भारतीय मानस में रक्षासूत्र का दर्शन
August 28, 2026
संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद समय की मांग है!
August 27, 2026
ओणम पर्व की मान्यता और परम्पराएँ
August 26, 2026
आखेटक: भारतीय सभ्यता के प्रहरी
August 25, 2026
आधुनिक AI के युग में संस्कृत भाषा का महत्व
August 24, 2026
राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो
September 06, 2026
शिक्षक दिवस विशेष: संविधान सभा में डॉ. राधाकृष्णन के विचार
September 05, 2026
रायपुर : विशेष लेख : नक्सलमुक्त क्षेत्रों में शिक्षा की नई भोर
September 05, 2026
डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा
September 04, 2026
छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला
September 04, 2026
“कोटा (नंदगाँव) की कृष्ण जन्माष्टमी की अनूठी परम्परा”
September 04, 2026
देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य
September 04, 2026
श्री कृष्ण का वैदिक स्वरूप
September 03, 2026
संतान सुख और रक्षा, मातृत्व का पर्व: हलषष्ठी (खमरछठ)
September 02, 2026
बघेरा(केकड़ी) के मूर्ति शिल्प में विष्णु अवतार बलराम
September 02, 2026
लोक-अनुभव का भंडार: हमारी वाचिक परंपरा
September 01, 2026
प्रकृति और नारी के उल्लास का पर्व- कजली तीज
August 31, 2026
सांस्कृतिक व शैक्षिक तत्वों से भरपूर है:छतीसगढ़ी लोक खेल
August 30, 2026
संस्कृत ध्वनियों का उच्चारण एक सहज योग
August 29, 2026
लोकपर्व भोजली
August 29, 2026
रक्षाबन्धन : भारतीय मानस में रक्षासूत्र का दर्शन
August 28, 2026
संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद समय की मांग है!
August 27, 2026
ओणम पर्व की मान्यता और परम्पराएँ
August 26, 2026
आखेटक: भारतीय सभ्यता के प्रहरी
August 25, 2026
आधुनिक AI के युग में संस्कृत भाषा का महत्व
August 24, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
छत्तीसगढ़ का पारम्परिक लोकनाट्य: रहस
July 22, 2026