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भारतीय संस्कृति का स्वरूप

भारतीय संस्कृति का स्वरूप

संस्कृति का तात्पर्य जीने की कला से है। वह तौर-तरीका अथवा ढंग जो इंसान द्वारा अपनी जिंदगी जीने के लिए अपनाया जाता है अथवा व्यवहृत होता है, "संस्कृति" कहलाता है। यह वस्तुतः वह प्रवृत्ति अथवा प्रणाली होती है जो मनुष्य की वेशभूषा, पहनावा, खान-पान, आमोद-प्रमोद एवं क्रियाकलाप जैसी रुचि में सन्निहित रहता है, उसी प्रकार मनुष्य की इच्छा, आकांक्षा, कामना एवं वासना के प्रतिबिम्य की झलक हम तत्कालीन मानवीय संस्कृति में देखते हैं।

संस्कृति रुचि से अनुप्रेरित एक संस्कार है जो मनुष्य में व्याप्त रहता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" ने अपनी पुस्तक "संस्कृति के चार अध्याय" में इस तथ्य को उ‌द्घाटित करते हुए लिखा है- जिस समाज में हम पैदा हुए हैं अथवा जिस समाज के साथ हम मिलकर जी रहे हैं, उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है।

अपने जीवन में मनुष्य जिन संस्कारों को संचित करता है, वह उसके संस्कृति का अंग बन जाता है।" अतएव संस्कृति मनुष्य के जीवन में लिप्त रहने वाला एक संस्कार है, जिसकी रचना और विकास अनेक सदियों के कटु अनुभवों का परिणाम है। अन्य शब्दों में यह युगों-युगों तक संचित भावधारा के विकास का प्रतिफलन है।

जो राष्ट्र ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, कला एवं कौशल में जितना अधिक समृद्ध रहा है, उस राष्ट्र की संस्कृति उतनी ही समृद्धशाली रही है। अन्य शब्दों में जो राष्ट्र जितना ही सभ्य और सुशिक्षित होता है, उस राष्ट्र की सांस्कृतिक गरिमा उतनी ही समुन्नत और प्रभावशाली होती है। रूसो, मॉन्टेस्क्यू वॉल्टेयर एवं डिडरोट जैसे महान दार्शनिकों ने अगर अपने ज्ञान एवं दर्शन की रश्मि फ्रांस के समाज में नहीं फैलाई होती तो फ्रांस की राष्ट्र क्रांति (1789) के समय लोगों को सुसुप्त चेतना जागृत नहीं हो पाती।

अरस्तु, सुकरात एवं होमर जैसे महान दार्शनिक एवं कलाकार का प्रादुर्भाव अगर न हुआ होता तो रोम, ग्रीस, यूनान एवं इटली जैसे यूरोपीय देशों का स्वरूप कुछ भिन्न होता। यह स्वतः सिद्ध बात है कि जब भी एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से वाणिज्यः अथवा व्यापार, सहयोग अथवा असहयोग एवं मित्रता अथवा शत्रुता आदि कारणों से परस्पर एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं तो उन राष्ट्रों की संस्कृति एक-दूसरे को परस्पर प्रभावित करती है।

प्राचीन भारतीय इतिहास पर दृष्टि डालने से यह प्रतीत होता है कि भारत अतीतकाल से ज्ञान, विज्ञान, कला, कौशल एवं दर्शन का केन्द्र रहा है। यहां शक, कुषाण, हुण, यूनानी एवं पर्शियन जैसी अनेक जातियों, धर्मों एवं संप्रदायों के लोग समय-समय पर आये और उनके प्रभाष में आकर भारतीय संस्कृति का परिदृश्य भी समय-समय पर कुछ न कुछ परिवर्तित होता गया है जिसकी झलक हम भारतीय पुरातत्वविदों के अनुसंधान से नमूने के रूप में प्राप्त मूर्तियों, सिक्कों, बर्तनों, चित्रों, आभूषणों एवं पोशाकों में देखते हैं।

अवशेष के रूप में प्राप्त इन प्राचीन अभिलेखों का अवलोकन करने से तत्कालीन भारतीय समाज की जीवन्त सांस्कृतिक झलक प्राप्त होती है। समन्वय की भावना भारतीय संस्कृति का मूल वैशिष्ट्य है और अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की मौलिक विशिष्टता है। इस देश में जहां एक ओर वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत एवं गीता जैसी ज्ञान एवं दर्शन के सागर से सुसज्जित कालजयी कृतियों एवं महाकाव्यों की रचना हुई वहीं दूसरी ओर नालंदा, तक्षशिला एवं विक्रमशिला जैसे शिक्षा केन्द्रों की स्थापना ज्ञान के अर्जन हेतु की गई, जहां देशी एवं विदेशी असंख्य छात्रों ने ज्ञान का अर्जन किया तथा अपने भावों एवं विचारों के परस्पर आदान-प्रदान से देशीय संस्कृति को नवीन आयाम दिया।

चीनी यात्री ह्वेनसांग एवं फाह्यान के यात्रा वृतांत से प्राचीन भारतीय समाज का समुन्नत सांस्कृतिक परिदृश्य उजागर होता है। रामकृष्ण परमहंस, महात्मा बुद्ध, वर्धमान महावीर एवं सम्राट अशोक ने एक ओर जहां तप, अहिंसा, करुणा एवं प्रेम का संदेश दिया वहीं दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद एवं महर्षि अरविंद ने दर्शन के मूल स्वरूप से हमें अवगत कराया।

नागार्जुन, आर्यभट्ट वराहमिहिर एवं धनवन्तरी जैसे सुप्रसिद्ध गणितज्ञ, ज्योतिष एवं चिकित्सा वैज्ञानिकों ने जहां एक ओर ज्योतिष एवं चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नये-नये आविष्कार करके देश को समुन्नत बनाया वहीं दूसरी ओर गोस्वामी तुलसीदास, कबीर दास, चैतन्य महाप्रभु, संत ज्ञानेश्वर, गुरुनानक एवं दादूदयाल जैसे सदाचारी पुरुषों ने तत्कालीन समाज को नैतिकता एवं सदाचार के मार्ग को अपनाने की प्रेरणा दी।

गोस्वामी तुलसीदास ने "रामचरित मानस" महाकाव्य में दानवत्व पर देवत्व की विजय दिखाकर तथा उसमें विभिन्न चरित्रों को उ‌द्घाटित कर आदर्श पति, आदर्श पत्नी, आदर्श भाई एवं आदर्श सेवक का अनूठा उदाहरण मध्यकालीन समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया और लोगों को जीवन के नैतिक आदर्शों एवं मूल्यों को पालन करने की प्रेरणा दी। भागवत गीता में कर्म की महत्ता प्रतिपादित की गई और "कर्म ही पूजा है" का सिद्धांत निरूपण किया गया है तथा कर्म के मार्ग से विचलित न होने की प्रेरणा दी गई है।

संस्कृत साहित्य के महान कवि एवं भारत के शेक्कसपियर कहे जाने वाले कालिदास ने अपने विशद् ज्ञान की रश्मि संपूर्ण राष्ट्र में चतुर्दिक फैलाई और उसी ज्ञान रूपी आलोक से हम समस्त देशवासी आलोकित हुए। विश्व कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर, बंकिमचन्द्र एवं ईश्वर चन्द विद्यासागर जैसे मनीषी एवं युगपुरूष इसी देश में पैदा हुए जिन्होंने सेवा एवं समर्पण के भाव से राष्ट्र को महान संदेश दिया।

ज्ञान एवं विज्ञान के क्षेत्र में प्रगतिशील प्राचीन भारत की ज्ञानवर्द्धक कृतियों एवं काव्यों की ख्याति संपूर्ण विश्व में इतनी फैली कि विदेशी विद्वानों द्वारा इन ग्रंथों का अनुवाद अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन एवं पारसी भाषा में होने लगा तथा विदेशों में भारतीय साहित्य एवं दर्शन का प्रचार-प्रसार होने लगा और लोग इसे पढ़ने लगे और ग्रीक, रोम, मिश्र, चीन, जापान, कोरिया एवं तिब्बत जैसे राष्ट्र भारत के संपर्क में आने लगे। इन विदेशी राष्ट्रों से संपर्क में आने के कारण हमारी संस्कृति भी प्रभावित हुई।

भारतीय इतिहास के विभिन्न काल खण्डों का अनुशीलन करने से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि शिक्षा, ज्ञान, कला कौशल एवं दर्शन की दृष्टि से हमारा देश विकासशील रहा है इस कारण प्राचीन एवं मध्यकालीन भारतीय समाज की संस्कृति भी प्रगतिगामी रही है। समय-समय पर विदेशी आक्रमणकारियों ने देश पर आक्रमण करके देशीय संस्कृति को नष्ट करने की कुचेष्टा की परन्तु देशवासी अपनी अटूट आस्था एवं विश्वास की बदौलत अपनी संस्कृति को जीवन्त एवं अक्षुण बनाये रखने में सफल हुए हैं।

इस कारण प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत का सांस्कृतिक स्वरूप गरिमामय एवं वैभवशाली रहा है। भारतीय संस्कृति की वास्तविक झलक यहां को मूर्तिकला, चित्रकला, शिल्पकला, वास्तुकला एवं अभिनय कला उत्सवों एवं त्यौहारों में झलकती है। अनोखी बात यह है कि यहां के कलावंतों ने कला को निखारने के लिए कोई सीमा नहीं बांधी। उन्होंने धातु, पत्थर, लकड़ी एवं हड्‌डी आदि को अपनी कला प्रदर्शित करने का आधार बनाया।

भारतीय कलावंतों ने मूर्तियों, बर्तनों, दीवारों, पोशाकों, सिक्कों एवं आभूषणों पर चित्रकारी करके भारतीय कला का बेजोड़ नमूना प्रस्तुत किया है जिसका अनुशीलन करके तत्कालीन भारतीय समाज का वास्तविक प्रतिबिंब हमारे सम्मुख उजागर होता है। इतिहास गवाह है कि भारत में मूर्तिकला का प्रारंभ सदियों पुराना है तथा यहां मूर्ति को गढ़ने या ढालने का तांता कभी न टूटा।

सिंधु की घाटी के मोहनजोदड़ों और पंजाब के हड़‌प्पा की शहरी सभ्यता के जमाने से आज तक इस देश में मूर्तियां बनाई और पूजी जाती रही हैं। इस तथ्य का प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों से प्राप्त अभिलेख के रूप में मूर्तियों से सहज ही लगाया जा सकता है। सांड, कुत्ते एवं शाल ओढ़े विभिन्न मुद्राओं में प्राप्त मूर्तियों तथा बर्तनों एवं आभूषणों पर अंकित जानवरों एवं मनुष्यों की मूर्तियों से यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन भारतीय समाज कला के क्षेत्र में निपुण था तथा उनका सांस्कृतिक जीवन भी समुन्नतशील था।

अशोक के शासनकाल में सांची एवं भरहुत के स्तूपों के चतुर्दिक रेलिंग एवं तोरण द्वारों पर बनी मूर्तियों और उस पर की गई नक्काशी भारतीय कला एवं संस्कृति का अनमोल रतन है जिसमें इंसान की रूचि को दर्शाया गया है। कालान्तर में ग्रीक और यूनानी शैली में कलावन्तों ने मूर्तियों को गढ़ने अथवा बनाने का कार्य प्रारंभ किया जो 'गांधार शैली' के नाम से चर्चित रही है।

इस शैली में बुद्ध के जीवन के अनेक दृश्य पत्थर की पाटियों पर उभार दिये गये जिसकी नकल से अनेक मूर्तियां देश के अन्य भागों में बनकर मथुरा से बामियान तक देशी एवं विदेशी आस्थावानों की पूजा पाने लगी। कुषाण राजाओं के शासनकाल में यह शैली अत्यधिक पल्लवित और पुष्पित हुई जिसका मुख्य केन्द्र मथुरा, सारनाथ, अमरावती और मथुरा था। इस काल में पत्थर और मि‌ट्टी की बनी मूर्तियों का रूप विलक्षण था।

सांची के बोधिसत्व की मूर्ति तथा संसार के डरे जीवों को निर्भय करती अभय मुद्रा में खड़ी मथुरा की प्रसिद्ध बुद्ध मूर्ति संसार के पारखियों के लिए आज भी उत्कृष्ट और दर्शनीय है। सारनाथ में बुद्ध की ध्यान मुद्रा में बैठी पत्थर की मूर्ति बेजोड़ है, जो भारतीय संस्कृति के मूल मंत्र "अहिंसा परमों धर्म" का संदेश सम्पूर्ण विश्व को आज भी दे रही है।

राष्ट्रकूट राजाओं के शासनकाल में देवगिरि और दौलताबाद के पास अजन्ता से करीब 75 मील के फासले पर औरंगाबाद जिले में अवस्थित एलोरा के गुफा मंदिर में बनी मूर्तियां अनोखी कारीगरी और विलक्षण नक्काशी के लिए विश्वविख्यात हैं। जहां बौद्ध, जैन एवं हिन्दू धर्मों के लगभग 30 से अधिक विहार, चैत्य एवं मंदिर हैं जिसमें प्रदर्शित की गई मूर्तियां असाधारण हैं। मानक कला एवं कारीगरी से सुसज्जित यह गुफा मंदिर अनन्त श्रम, अटूट आस्था एवं असीम विश्वास का प्रतीक बना हुआ है।

खजुराहो का प्राचीन मंदिर भारतीय संस्कृति की अनमोल विरासत है। हर्ष के शासन काल में 7वीं शती में भारत पधारे चीनी यात्री 'हवेनसांग' के यात्रा वृतांत से यह स्पष्ट होता है कि इस मंदिर का निर्माण कार्य गुप्त काल में प्रारंभ हुआ था जो प्रतिहारों के शासनकाल में जारी रहा। चंदेल राजाओं (9-12 शताब्दी) ने वास्तुकला की इस मिसाल को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। खजुराहो के इस भव्य मंदिर का महत्व उसकी वास्तुकला की खूबसूरती या मादक मुद्राओं में निर्मित मूर्तियों से नहीं है, अपितु इस शिल्प में संचित उस ज्ञान से है जिसने मानव को सतही भेदों को भुलाकर आलोक में लाने की राह दिखाई है।

भुवनेश्वर और कोणार्क के सूर्य मंदिर की बाहरी काया अनेक अभिराममय और सजीव मूर्तियों से सजी हैं। इन मूर्तियों में भारतीय संस्कृति की उत्कृष्टता की झांकी सहज भाव से देखी जा सकती है। काल्पनिक ख्यालों और भंगिमाओं में सुर-सुंदरियों की मूर्तियों से सुसज्जित इन मंदिरों का कलेवर अनुपम है। भुवनेश्वर के एक मंदिर पर प्रेम पत्र लिखने की मुद्रा में बनी नारी की मूर्ति उतनी ही आकर्षक है, जितनी कि उसके चेहरे की बनावट में नारी की मानवीय सुंदरता।

कोणार्क के सूर्य मंदिर की मूर्तियों की कहानी निराली बन पड़ी है। विभिन्न भाव-भंगिमाओं से सुसज्जित इन मूर्तियों का अवलोकन करने से तत्कालीन भारतीय समाज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का स्वरूप सजीव हो उठता है। दक्षिण भारत के दिलवाड़ा के मंदिर की बाहरी काया में लगी मूर्तियां हमारी संस्कृति को अनमोल विरासत प्राचीन भारतीय इतिहास का अध्ययन करने से यह प्रतीत होता है कि इंसान ने अपनी कला-कौशल की खूबियों को कहानी में परिणत कर सदियों बाद आने बाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए चट्टानों पर अपने संदेश खोदे, चिकने पत्थरों के खंभे खड़े किये और उस पर अक्षरों के मोती चिखेरकर अपने जीवन-मरण की कहानी को उतारा जो हमारी अनमोल विरासत बन गई है।

अशोक ने अपने शासनकाल में सारनाथ, दिल्ली, नंदनगढ़, लुम्बनी एवं इलाहाबाद आदि स्थानों पर अनेक स्तूपों, खम्भों का निर्माण करवाया और उस पर अहिंसा, करूणा एवं त्याग के संदेश को खुदवाकर लोगों का ध्यान आकृष्ट करवाया ताकि समाज के लोग अहिंसा, शांति, करूणा एवं भाईचारे का पालन करके सुपथ की ओर अग्रसर होकर देशीय संस्कृति को समुन्नत करने में योगदान दे सकें। कुछ खंभे 30 फीट ऊंचे हैं और एक ही पत्थर से बनाये गये हैं। सारनाथ के खंभों में चार सिंहवाली मूर्ति हमारा राष्ट्रीय प्रतीक है।

अजन्ता के गुफा मंदिर विश्व के गुफा मंदिरों की श्रृंखला में अद्वितीय है। इसकी गुफाओं पर कुदरत का नूर इस प्रकार बरस पड़ा है जिसे देखकर यह प्रतीत होता है कि प्रकृति यहां आकर थिरक उठी है। मुम्बई और हैदराबाद के बीच विन्ध्याचल के पूर्वी और पश्चिमी छोर में विशाल पर्वतमालाओं की एक श्रृंखला उत्तर से दक्षिण तक अवस्थित है। अजन्ता का गुफा मंदिर इसी पहाड़ी गुफा में अवस्थित है। इसका निर्माण ईसा से करीब दो सौ साल पहले ही प्रारंभ हुआ और यह सातवीं सदी तक बनकर तैयार हो चुका था।

करीब 250 फीट सीधा पहाड़ काटकर अर्धचन्द्राकार रूप में बनाया गया यह गुफा मंदिर देश का सबसे प्राचीन गुफा मंदिर है। बुद्ध के जीवन से  निर्वाण काल तक की घटनाओं से संबंधित असंख्य भित्ती चित्र कलावन्तों ने इस गुफा मंदिरों में बनाया है जिसे देखकर प्रेम, मैत्री, तप, करूणा एवं त्याग की अनुभूति होने लगती है और यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन समाज के लोगों की रूचि प्रेम, करूणा एवं त्याग में थी और लोग सदाचारी प्रवृति के थे।

दया और त्याग उनके जीवन का मूल आदर्श था। चित्र में अंकित जातक कथाएं दया और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करती हैं। अपनी चित्रकला की अनूठी कलाकारी के कारण इसके चित्र दुनिया के लिए नमूने बन गये और देश विदेश में सर्वत्र ही चित्रकला को प्रभावित किया। चीन के तुन-हुआंग और श्रीलंका के सिमिरिया की पहाड़ी दीवारों पर इसी के नमूने चित्रों को अंकित किया गया है। पूर्व के देशों की कला को इन चित्रों ने प्रभाषित किया साथ ही मध्य और पश्चिमी एशिया के देश भी इसके कल्याणकारी प्रभाव से अछूते नहीं रहे।

देश के अन्य नगरों एवं देहातों में भी इन चित्रों का अनुकरण किया जाने लगा और तत्कालीन ग्रामीण एवं शहरी संस्कृति का स्वरूप उन चित्रों में मुखरित होने लगा है। सच तो यह है कि अपनी सजीव, गतिमान एवं बहुसंख्य मुद्राओं में जीवन के विविधि पक्षों एवं पहलुओं को मुखरित करने के कारण अजंता का गुफा मंदिर चित्रकला के इतिहास में एक अप्रतिम स्थान रखता है।

कालान्तर में देश के विभिन्न भागों में कलावन्तों ने जीवन और जगत के विभिन्न पहलुओं के असंख्य चित्र मंदिरों, स्मारकों, प्राचीन धरोहरों एवं महलों पर अंकित किये जिसमें तत्कालीन जीवन का जीता जागता सजीव स्वरूप दिखता है। मार्कोपोलो, अलबरूनी एवं इब्नबतूता के ऐतिहासिक वृतांत से मध्यकालीन भारतीय समाज का सांस्कृतिक स्वरूप झलकता है। मध्यकालीन भारत में हिंदू और इस्लामी संस्कृतियों का सम्मिलन हुआ और दोनों संस्कृतियों ने एक दूसरे को प्रभावित किया।

मुगलकालीन चित्रकला का आधार फारसी शैली था जिसमें ईरानी और भारतीय शैलियों का सुंदर समन्वय था। अफसर के समय राष्ट्रीय शैली का प्रादुर्भाव हुआ। इन चित्रों में लैला-मजनू के अंकित चित्र अटूट प्रेम और असीम साहस का प्रतीक बना हुआ है। अभिनय मनोरंजन का साधन होता है एवं इसके माध्यम से हम सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की विविध अनुभूतियों को समाज के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं।

भारत में अभिनय की परम्परा सहस्त्राब्दियों प्राचीन है। अभिनय कला का प्रमुख अवयव (तत्व) नाटक है। कलिदास ने नाटक को "शान्त क्रतु चाक्षुष" यानी शांत चाक्षुष यज्ञ कहा है। आचार्य भरत ने अपनी पुस्तक नाट्यशास्त्र में नाटक को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ब्रहमा ने ऋग्वेद में पाठ्य, सामवेद से ज्ञान, यदुर्वेद से अभिनय एवं अथर्ववेद से रस लेकर पांचवें नाट्य वेद की रचना की। अतः नाटक में संगीत, नर्तन, गायन एवं वादन का समाहार होता है।

भारत में नाटक का प्रारंभ पुतलियों के नाच से माना जाता है। प्राचीन भारतीय नाट्य परम्परा के ख्यातिलब्ध नाट्यकार अश्वघोष, शुद्रक, कालिदास, विशाखादत्त, भवभूति, हर्ष एवं राजशेखर ने प्रेरणादायक दुखान्त एवं सुखाना नाटकों की रचना की एवं उसका समय-समय पर सफल मंचन हुआ और उसके माध्यम से हमारे तत्कालीन जीवन के सांस्कृतिक स्वरूप को दिखाया गया। कालान्तर में प्रेम प्रधान, व्यंग्य प्रधान, हास्य प्रधान एवं वीर प्रधान असंख्य नाटकों एवं एकांकियों की रचना हुई एवं उसका समय-समय पर सफल मंचन होता गया है जिसमें समाज का प्रतिबिम्ब झलकता है।

भारत में नृत्य अथवा नर्तन की परम्परा भी अति प्राचीन है। गोपियों की रासलीला एवं कठपुतली के नाच से नृत्य कला का सूत्रपात हुआ। कालान्तर में नृत्यकला का परिमार्जित रूप हमारे सम्मुख आया जो हमारी रुचि, आस्था एवं संस्कार का प्रतीक बन गया। वर्तमान समय में भरतनाट्यम, ओडिसी नृत्य, कत्थक नृत्य, राजस्थानी नृत्य एवं मणिपुरी नृत्य आदि भंगिमाओं में भारतीय नृत्यांगना नृत्य प्रस्तुत कर भारतीय संस्कृति के इन्द्रधनुषी झरोखे को मुखरित करने में तल्लीन है।

ज्ञान दर्शन एवं कलाकृतियों में निहित प्राचीन एवं मध्यकालीन भारतीय समाज के स्वरूप का निरूपण करने से यह प्रतीत होता है कि भारतीय समाज उन्नतशील था। परिवार का एक मुखिया होता था और संयुक्त परिवार का स्वरूप था। गुरूकुलों एवं शिक्षा केन्द्रों में शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे। समाज का आर्थिक आधार कृषि पर आधारित था। लोग मिलजुल कर खेती करते थे और मिलकर रहते थे। लोग द्वार पर आये अतिथि की समुचित सेवा करते थे। प्रेम, अहिंसा एवं त्याग की भावना लोगों में अंडर्निहित थी।

नैतिकता एवं सदाचार जैसे नैतिक मूल्यों का लोग पालन करते थे। आमोद-प्रमोद के रूप में लोग नाच, गान करके अपना मनोरंजन करते थे। वाणिज्य एवं व्यापार का मार्ग भी प्रशस्त था। मैत्री का भाव लोगों में था। समाज के लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में हाथ बंटाते थे एवं दूसरों के दुःखों को अपना दुःख समझकर कार्य करते थे। कटुता एवं शत्रुता का भाव नगण्य था। सुख और समृद्धि का बोलबाला था। देशी पोशाक एवं देशीय भोजन लोग ग्रहण करते थे। समाज में पर्दा प्रथा का प्रचलन था तथा स्त्रियों को घूमने-फिरने की स्वतंत्रता नहीं थी। उनका जीवन केवल घर की चारदीवारी तक सीमित हो गया था।

भारतीय संस्कृति की विकास यात्रा लंबी है और इस यात्रा में काफी उत्तार-चढ़ाव आया है। समय-समय पर परस्पर आदान-प्रदान की प्रवृत्ति को अंगीकृत किये जाने के फलस्वरूप भारतीय संस्कृति का स्वरूप निराला बन गया है। भारतीय संस्कृति अत्यधिक उदार, व्यापक एवं प्रगतिशील रही है। विभिन्न जन-धाराओं का योग इतना किसी भी देश की संस्कृति को नहीं मिला, जितना भारत को मिला। इसी कारण भारत सार्वदेशिक संस्कार से तृप्त है।

भारतीय संस्कृति की सांस्कृतिक विरासत अथवा धरोहर देश के एक छोर से दूसरे छोर तक अर्थात् कश्मीर से कन्याकुमारी तक छिटपुट बिखरी पड़ी है। इन धरोहरों को संरक्षित रखने की आवश्यकता है ताकि अतीत के दुर्लभ विरासत में लिप्त ज्ञान एवं संस्कार को हम आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाते रहें एवं उससे प्ररेणा ग्रहण करते रहें। वर्तमान भारतीय समाज का सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप धीरे-धीरे परिवर्तित होता गया है। वर्तमान भारतीय समाज पर पश्चिमी संस्कृति अथवा अप-संस्कृति का प्रभाव तेजी से पड़ रहा है।

संयुक्त परिवार का सिद्धान्त टूटता जा रहा है। हम पृथकता चाहते हैं और अकेला रहना पसंद करने लगे हैं। एक ओर जहां हमारे नये-नये रिश्ते जुड़ते जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर पुराने नाते टूटते जा रहे हैं। लोग खेती बाड़ी करने की प्रथा छोड़कर गांवों, कस्बों एवं दूर-दराज के देहातों से पलायन कर जीविकोपार्जन के लिए नगरों एवं महानगरों की ओर आने लगे हैं। राष्ट्र की राष्ट्रभाषा हिन्दी एवं अपनी क्षेत्रीय भाषा बोली का परित्याग कर लोग विदेशी अथवा अंग्रेजी भाषा को अपनाने एवं उस भाषा के माध्यम से अपने बच्चों को शिक्षा देने में गर्व अनुभव करने लगे हैं। विदेशी भाषा या अंग्रेजी में अपने विचारों को व्यक्त करने वाले लोगों का, व्यक्ति का समादर होने लगा है।

हरिशचन्द्र का सूक्ति वचन "निज भाषा उन्नति अहे, सम उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिठहीं न संचय सूल" की अवहेलना कर हम देशीय भाषा को तुच्छ, हीन एवं नगण्य समझने लगे हैं। भारतीय साज-पोशाक अथवा पहनावे को छोड़कर लोग पश्चिमी देशों के अनुकरण पर साज-पोशाक धारण करने लगे हैं और ऐसा करने में उन्हें गर्व की अनुभूति होने लगी है। सात्विक भोजन को देशीय रीति से खाना हम नहीं चाहते।

शास्त्रीय, रवीन्द्र संगीत एवं भक्तिपरक गीतों का स्थान पॉप गीत एवं संगीत लेने लगा है। ओड़िसी, कत्थक एवं भरतनाट्‌यम नृत्य में रुचि न लेकर कैबरे डांस देखना अधिक पसंद करने लगे हैं। प्रेरणाप्रद नाटक एवं अन्य मनोरंजन के उपादान का समाज से ह्रास होने लगा है। अपनी संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं और जीवन के हर क्षेत्र में हम पश्चिमी संस्कृति की नकल तेजी से करते जा रहे हैं।

 

श्री रवीन्द्र नाथ झा
भारतीय संस्कृति का स्वरूप
"संस्कृति: अंक-04"

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