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“कैथल के स्मारक: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन”

“कैथल के स्मारक: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन”

कैथल प्राचीन काल से. ही अपनी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए महत्त्वपूर्ण स्थल रहा है। यह कुरूक्षेत्र से लगभग 30 कि०मी० दक्षिण पश्चिम में हरियाणा राज्य में है। पौराणिक ग्रंथों में इस स्थल का उल्लेख "कपिस्थल" के रूप में हुआ है। यहां कई टीले अपने गर्भ में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवशेष छिपाये हुए हैं। इन टीलों के अतिरिक्त प्राचीन इमारतों के भग्नावेश इस स्थल की ऐतिहासिक महत्वता का बखान करते हैं।

कैथल नगर में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के मुख्य द्वार के समीप एक प्राचीन इमारत के भग्नाववेषों को प्रकाश में लाने का कार्य एक स्थानीय गैर-सरकारी संस्था, "कपिस्थल पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्थल जीर्णोद्वार समिति, कैथल” ने किया।

 

 

 

इन भग्नावेशों को एक उत्तर मध्यकालीन बावली के रूप में लेखक द्वारा पहचाना गया। यह बावली तीन मंजिला सीढ़ीदार कुयें के रूप में है। जो लखोरी ईट से बना है। कुयें में लगभग 30 फीट की गहराई पर पानी है। कुयें के सामने आयताकार हालनुमा कमरा है, जिसकी छत गुम्बदाकार है। छत को गुम्बद-आकार देने के लिए हॉलनुमा कमरे के चारों कोनों के ऊपरी हिस्सों को गोलाकार किया गया है।

हॉलनुमा कमरे में कई आले बने हुए हैं जिनमें से कुछ पर धुएं के निशान (Soot Marks) हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि इन आलों का प्रयोग दीपक आदि रखकर प्रकाश के लिए किया जाता था। इस हॉलनुमा कमरे से कुछ सीढ़ियों छत के लिए जाती हैं। यह बावली पूर्व-पश्चिम दिशा में बनी है जिसका मुख्य प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा में है। इस बावली का निर्माण लखौरी ईंटों से हुआ है जिनकी चुनाई में चूने का प्रयोग किया गया है। बावली में कई जगह चूना-सुर्खी के प्लास्टर के अवशेष भी दृष्टिगोचर होते हैं।

बावली के समीप ही नौ कुंड हैं जो स्थानीय मान्यता के अनुसार नवग्रहों को समर्पित हैं। इन कुंडों की भौगोलिक स्थिति प्राचीन ज्योतिष के सिद्धांतों पर आधारित है। इन कुंडों का निर्माण भाई उदय सिंह के शासन काल में उनके मुख्य पुरोहित की सलाह पर किया गया था। इन नौ कुंडों में से एक छज्जू/शुक्र कुंड, बावली के उत्तर दिशा में स्थित है। यह कुंड आयताकार है व इसका निर्माण भी लखौरी ईंटों से हुआ है।

इस कुंड की दीवारों पर अन्दर की ओर आर्ल्ड डिजायनों (Arched designs) से सुसज्जा की गई है। इस कुंड में दस बुर्ज है, जिनमें से छह बुर्ज लम्बाई में (पूर्व-पश्चिम दिशा में) व चार बुर्ज चौड़ाई में (उत्तर-दक्षिण दिशा में) है। इस कुंड में उत्तर-पश्चिम दिशा में सीढ़ियां हैं, जो कि कुंड को एक मंदिर (पातालेश्वर मंदिर) से जोड़ती है। यह मंदिर भी निर्माण शैली से उसी काल का प्रतीत होता है। इस मंदिर के निर्माण में भी लखौरी ईटों व चूने की चिनाई का प्रयोग किया गया है।

 

 

 

पातालेश्वर मंदिर का निर्माण आयताकार में किया गया है। इस मंदिर में गर्भगृह पूर्व दिशा में है जो वर्गाकार है। इसके पश्चिम की ओर वर्गाकार मंडप है। सम्पूर्ण संरचना एक ऊँचे चबूतरे पर है, जिसके दक्षिण-पश्चिम कोने पर सीढ़ियों हैं। इस मंदिर का निर्माण शिखर शैली में किया गया था। इस मंदिर का शिखर पिरामिडाकार है जिसके चारों ओर आले बने हैं जो पौराणिक देवी-देवताओं की मूर्तियों से सुसज्जित हैं।

इस मंदिर में मुख्य शिखर के अतिरिक्त कई छोटे शिखर भी उपस्थित है जो आमलक, कलश व फीनियल (Finial) से सुसज्जित है। मुख्य मंदिर की सज्जा के लिए जालियां (Latticed Window in Stucco) भी लगाई गई है जो मुख्य मंदिर में वायु व प्रकाश के आवागमन को भी सुनिश्चित करती हैं। मुख्य मंदिर के दक्षिण की ओर कई अन्य मंदिर भी है परन्तु समय के साथ उनमें कई पुनर्निर्माण कार्य जैसे दीवारों पर मारबल लगाना, कंकीट फर्श का निर्माण हो चुके है जिनसे उनकी प्राचीनता का आकलन करना कठिन कार्य है।

मुख्य मंदिर के गर्भगृह में चूना पत्थर का एक अष्ट कोणीय शिवलिंग है। मुख्य मंदिर का मंडप दो मंजिला है, उपरी मंजिल पर पहुंचने के लिए गर्भगृह के दोनों ओर (बाहरी की ओर से) दो सीढ़ियों हैं। गर्भगृह की छत गुम्बदाकार है जिसके निर्माण में स्क्विंच आर्थ (Squinch Arch) का प्रयोग किया है।

 


 

कैथल के ये स्मारक उत्तर मध्यकालीन भारतीय संस्कृति के परिचायक है परन्तु आज कई प्रकार की संरक्षणात्मक समस्याओं के कारण खत्म होने के कगार पर पहुंच गये हैं। इन स्मारकों की प्रमुख संरक्षणात्मक समस्यायें निम्नवत है-

1. इन स्मारकों में कई स्थानों पर चिनाई के नष्ट होने (तथा ढीला होने) से ईंटें निकल गयी है जिसके कारण ये भग्नावेशों में परिवर्तित हो गये है।

2. ईंटों के निकलने से इन स्मारकों में उपस्थित आले (Niches), आर्च (Arch) और एल्लनेव (Alcoves) अपना मूल आकार खो चुके हैं।

3. इन स्मारकों, मुख्य रूप से बावली का प्रयोग उपयुक्त देख-रेख के अभाव में कूड़ा-करकट डालने के लिए लम्बे समय से किया जाता रहा है फलस्वरूप भूमिगत जल में उपस्थित लवणों की प्रचुरता से बावली की दीवारों पर रसायनों की एक सफेद परत जमा हो गई है जो स्मारक को विभिन्न रासायनिक क्रियाओं व उसके फलस्वरूप होने वाली संरचनात्मक विसंगतियों द्वारा क्षति पहुंचा रही है।

4. स्मारकों की दीवारों पर अत्याधिक पेड़-पौधे उगने से स्मारक को भारी क्षति हो रही है।

5. कूड़ा करकट व अन्य अवशिष्ट डालने से कुयें व कुडों का जल प्रदूषित हो गया है (स्थानीय मान्यतानुसार कुओं का जल कई प्रकार की व्याधियों को दूर करने में सक्षम है, अतः लोगों द्वारा प्रयोग किया जा रहा है, जिससे विभिन्न संक्रमित रोग फैलने का खतरा बना हुआ है।)

6. मंदिर व कुंड के समीप की भूमि पर स्थानीय लोगों ने अतिक्रमण कर स्मारकों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया गया है।

7. मंदिर आदि में किये गये पुनर्निर्माण कार्यों ने उनके प्राचीन स्वरूप को नष्ट कर दिया है।

उपर्युक्त संरक्षात्मक समस्याओं के कारण हमारे यह प्राचीन स्मारक विनष्टि के कगार पर पहुंच गये है। अतः जरूरी है कि कुछ व संरक्षणात्मक सुझावों को प्रयोग में लाया जाये, जो कि निम्न हैं-

(1) चिनाई आदि के क्षरण के कारण होने वाली संरचनात्मक विसंगतियों को दूर करने के लिए आवश्यक है कि क्षय हो चुकी चिनाई को बदला जाये। जहां आवश्यक हो वहां चिनाई को पाइन्टिंग (Pointing) आदि से व क्षय हो रहे प्लास्टर को एजिंग (Edging) आदि कियाओं द्वारा संरक्षित किया जाये।

(2) अपना मूल आकार खो चुके आलों (Niches), आर्च (Arch), एल्कोव (Alcoves) आदि को उनके मूल आकार में लाया जाये।

(3) विभिन्न रासायनिक संरक्षणात्मक कियाओं द्वारा स्मारक पर जमा सफेद रासायनिक परत को हटाया जाये व विभिन्न रसायनों व भौतिक उपायों से स्मारकों में होने वाली दनस्पति वृद्धि को रोका जाये।

(4) स्मारकों में अवशिष्ट फेंकने के कार्य को बन्द कराया जाये जिससे कुंड व कुरों के पानी में होने वाले प्रदूषण को रोका जा सके।

(5) उपयुक्त देखरेख के अभाव में मंदिरों में उपस्थित प्राचीन चित्रकारी व स्टको कार्य (Stucco work & Frescos) तेजी से नष्ट हो रहा है जिसे संरक्षण की अति आवश्यकता है।

(6) मानवीय अतिक्रमण को रोकने के लिए स्मारकों के चारों ओर बाड़ आदि लगाई जानी चाहिए।

(7) स्मारकों के अन्दर व बाहर की भूमि से अतिक्रमण हटाकर लैन्ड स्केपिंग स्मारकों के खोये हुए प्राचीन गौरव को पुनस्र्थापित किया जाये।
 

लेख-

गरिमा, अक्षत कौशिक
नई दिल्ली 

 

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