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पर्वतराज अमरकंटक

पर्वतराज अमरकंटक

अमरकंटक, मैकल पर्वत पर स्थित माँ नर्मदा का पवित्र उद्गम स्थल है। जानिए अमरकंटक की पौराणिक कथाएँ, शिवलिंग, मंदिर और ऐतिहासिक महत्व ।

पर्वतराज अमरकंटक, समुद्र तल से लगभग 3500 फुट की ऊँचाई पर स्थित होने के कारण, शीतल जलवायु एवं सघन वन-कानन से शोभायमान रहता है। रामायण काल में इस पर्वत का नाम ऋषभ था। महाभारत काल में यह वंशगुल्म के नाम से विख्यात हुआ। कालिदास ने मेघदूत काव्य में इसे आम्रकूट कहा है। बाद में यह मैकल तथा अमरकंटक के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

मैकल पर्वत का ऊपरी भाग एक समतल पठार है। इसकी चारों दिशाओं से चार नदियाँ निकलती हैं, जिनमें शोणभद्र, नर्मदा तथा ज्वालावती (जुहिला) प्रमुख हैं। इन नदियों के उद्गम स्थल एवं जलप्रपात अत्यंत रमणीय हैं। मैकल पर्वत के समूचे ऊपरी भाग, अर्थात् नदियों, जलप्रपातों एवं असंख्य देव मंदिरों के समुच्चय को अमरकंटक कहा जाता है।

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पौराणिक कथा के अनुसार ‘अमरकंटक’ शब्द की मौलिक रचना ‘अमर + अंकट’ से मानी जाती है।

  • अमर = देवता,

  • अंकट = शरीर

अर्थात् इस पर्वत की रमणीयता देव शरीर के समान परम शोभनीय है।

अमरकंटक पर्वत सदा से संपूर्ण सिद्धियों का प्रदाता रहा है। इसके नैसर्गिक सौंदर्य से आकर्षित होकर अनेक मुनि, महर्षि, देव, गंधर्व, सुर-असुरों ने यहाँ निवास बनाकर कठोर तप किया है।

amarkantak temples

भारतवर्ष की समस्त नदियों में माँ नर्मदा को सबसे प्राचीन माना जाता है। पुराणों के अनुसार, जहाँ गंगा, यमुना, सरस्वती, सरयू आदि पुण्य नदियों में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह श्री नर्मदा के दर्शन मात्र से मिल जाता है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शंकर ने अपने तीसरे नेत्र से संपूर्ण संसार को जलाकर भस्म कर दिया और उस भयंकर ज्वाला से स्वयं को बचाने के लिए यहाँ पहुँचे, तो मैकल पर्वत के रमणीय वन-प्रदेश में पहुँचते ही उनके कंठ से पसीने की पतली धार पृथ्वी पर बहने लगी।

वही निर्मल जलधारा अनेक वनों और पर्वतों के मध्य कल-कल नाद करती हुई पश्चिम दिशा के समुद्र में जाकर समा गई। युगदृष्टा महर्षि मार्कंडेय इस प्रभाव से चकित होकर इस पुण्य सलिला को नर्मदा नाम से पुकारने लगे। तभी से नर्मदा संपूर्ण संसार में विख्यात है।

‘नर्मदा’ संस्कृत शब्द है –

  • नर्म = सुख,

  • दा = देने वाली,

अर्थात् सबको सुख देने वाली नदी।

एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर ध्यानमग्न थे, तभी उनका तीसरा नेत्र खुला और उससे अति भयंकर ज्वाला निकली। उस ज्वाला से संपूर्ण सृष्टि भस्म हो गई। फिर आकाश में बादल मँडराने लगे और मूसलाधार वर्षा के कारण सारी पृथ्वी जलमग्न हो गई।

प्रलय के इस महासमुद्र में तांडव करते हुए भगवान शंकर ने देवी उमा का आलिंगन किया। उस समय देवी उमा के वक्षस्थल से प्रसन्नता के कारण जल-बिंदु प्रकट हुए। वही श्वेत बिंदु, उमा-शंकर के हृदय से निकलकर एक परम सुंदरी कन्या के रूप में प्रकट हुआ। उमा-शंकर की आज्ञा से वह कन्या देवी नर्मदा के रूप में स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरी।

भीषण गर्जना के साथ वह आकाश से गिरी और पर्वतराज मैकल ने उसे धारण किया। अमरकंटक के पहाड़ों से निकलकर वह पथरीले मार्गों में नृत्य करती हुई, झंकार नाद में बहती हुई पश्चिम दिशा की ओर समुद्र में समा गई।

पत्थरों की चट्टानों के बीच बहती देवी नर्मदा की धारा को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वह अट्टहास करती हुई चिरकुंवारी कन्या, अपने पिता समुद्र देव से मिलने जा रही है।

एक कल्प में भगवान शंकर अमरकंटक पर्वत पर दिगंबर रूप में तांडव कर रहे थे। देवी पार्वती ने उन्हें पाषाण रूप (लिंग) हो जाने का शाप दे दिया। तभी से वे नर्मदा तट पर शिवलिंग रूप में प्रतिष्ठित हैं। प्राणी मात्र के कल्याण हेतु भगवान शंकर ने शिवलिंग का रूप धारण कर नर्मदा तट पर निवास किया।

 

जो भक्त श्रद्धा-भक्ति से नर्मदा तट पर शिवलिंग की पूजा करता है, उसे संसार की समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। शिवलिंग की पूजा से बढ़कर कोई दूसरी पूजा नहीं है, और न ही महादेव से बढ़कर कोई दूसरा सिद्धि-समृद्धि का प्रदाता देवता है।

जैसा कि आध्यात्मिक दृष्टि से अमरकंटक का महत्व अत्यधिक है, वैसा ही इसका ऐतिहासिक महत्व भी है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में यहाँ अयोध्या के राजाओं का शासन था। बाद में यह क्षेत्र विराट नगर राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

जनश्रुति के अनुसार, अज्ञातवास के समय पांडव यहाँ आए थे। कुछ समय तक चेदि वंशीय राजाओं ने भी यहाँ राज्य किया।10वीं और 11वीं शताब्दी के बाद कलचुरी, भोसले एवं गोंड वंश के राजाओं ने अमरकंटक पर शासन किया।

इन राजाओं ने नर्मदा उद्गम स्थल के निकट कई मंदिरों का निर्माण कराया। कलचुरी शासकों ने सूर्यकुंड के तट पर जुहिला देवी का मंदिर बनवाया, जिसकी मूर्ति अत्यंत आकर्षक है, हालांकि उसके कमर के ऊपर का भाग नहीं है।

जुहिला देवी के समीप भगवान विष्णु की मूर्ति है, तथा सूर्य मंदिर के पास के कुछ अन्य मंदिर भारत सरकार द्वारा संरक्षित हैं। इनमें कर्ण मंदिर, पातालेश्वर, महादेव मंदिर और विष्णु मंदिर प्रमुख हैं। ये मंदिर शैव स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनमें चेदि एवं विदर्भ राज्यों की स्थापत्य कला का प्रभाव आज भी दृष्टिगोचर होता है।

आलेख
डॉ.विजय चौरसिया 
पोस्ट- गाड़ासरई, जिला -डिंड़ौरी (म.प्र.)
मो.9424386678

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