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स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी: हुतात्मा समशेर सिंह पारधी

स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी: हुतात्मा समशेर सिंह पारधी


1857 का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम केवल रियासतों और राजा महाराजाओं तक सीमित नहीं था, इसमें भारत के वनवासी और जनजातीय समुदायों ने भी अपने प्राणों की आहुति दी थी। औपनिवेशिक ऐतिहासिक आख्यानों में अक्सर इन जननायकों को विस्मृत कर दिया गया। दक्षिण कोसल टुडे के इस विशेषांक में हम महान सेनानी समशेर सिंह पारधी के अद्वितीय योगदान को रेखांकित कर रहे हैं। पारधी समुदाय ने अपने अस्त्र कौशल और छापामार युद्ध नीति से अंग्रेजी सत्ता का कड़ा प्रतिरोध किया था। यह लेख उसी शौर्य और स्वाभिमान की गौरवशाली गाथा को हमारे पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है, ताकि इतिहास के इन अनछुए पन्नों को पुनर्स्थापित किया जा सके।


भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857 में हुआ था। मेरठ की सैनिक टुकड़ी से उठी क्रान्ति की ज्वाला ने सम्पूर्ण देश में स्वाधीनता की अलख जगा दी थी। यह आन्दोलन लगभग एक शताब्दी के अनवरत संघर्ष के पश्चात 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतन्त्रता के रूप में फलीभूत हुआ। इस संग्राम में सम्पूर्ण भारत के राजा महाराजाओं, शासकों और जमीन्दारों के साथ वनांचलों में निवास करने वाले अमर सेनानियों ने भी अपने प्राणों का बलिदान दिया।

राजघराने और शासक अपने साम्राज्य को किसी भी स्थिति में अंग्रेजों को नहीं सौंपना चाहते थे। अंग्रेजों ने साम्राज्य विस्तार के लिए अनेक कूटनीतियां अपनायीं और दमन चक्र चलाए। उन्होंने पद प्रतिष्ठा और परगना सौंपने जैसे प्रलोभन भी दिए। कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश शासकों और राजवंशों ने भारत माता की रक्षा करने का संकल्प लिया। उन्होंने अपने पूर्वजों की वीरता, प्रशासनिक सीमाओं और महलों को फिरंगियों से बचाने के लिए कठोर संघर्ष किया। रानी महारानियों और दरबारी नारियों ने भी मातृभूमि की रक्षा करते हुए बलिदान देना उचित समझा।


 समशेर सिंह पारधी भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी व पारधी गणनायक

इस महासमर में वनवासियों और जनजातियों का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में निवास करने वाले जनजातियों व पारधियों ने प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में स्मरणीय योगदान दिया। पारधी जनजाति की उत्पत्ति कथाओं में कई वीर महापुरुषों और सेनापतियों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने राजदरबारों में उच्च पदों पर कार्य करते हुए साम्राज्य की सुरक्षा में सहयोग किया। पारधी मूलतः वीर, अस्त्र शस्त्र संचालन और शिकार करने में कुशल जनजाति है। राजा महाराजा इन्हें अपने सहयोगी के रूप में रखते थे। राजघरानों के सदस्यों की भांति इनमें भी वीरता और स्वाभिमान की भावना कूट कूट कर भरी होती है। आज भी वे अपने पूर्वजों के संघर्ष और बहादुरी को अत्यन्त उत्साह के साथ लोकगाथा के रूप में गाकर सुनाते हैं, जिससे नई पीढ़ी स्वाभिमान और गौरव का अनुभव कर सके।
समशेर सिंह पारधी मूलतः भोंसले बेड़ा के पारधी थे। वे सोमनाथ गुजरात के निकट मीठापुर गांव के निवासी थे। उनके पिता बागरी और पारधी समाज के सहयोग से वहां रहते थे तथा उनके पिता व दादी पेशवाई दरबार में अपनी सेवाएं दे चुके थे। समशेर सिंह पारधी की जन्म तिथि की सुनिश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। उन्हें मुखबिरों की सूचना पर बन्दी बनाया गया तथा 1 अप्रैल 1858 को उनके सेनापति गंगू बापू मकवाना और वाघेरा माणेक सहित सात अन्य क्रान्तिकारियों के साथ फांसी दे दी गई। यही उनकी सर्वमान्य शहादत तिथि है।

उनके परिवार के कई सदस्य इस संघर्ष में बलिदान हुए। 1818 के युद्ध के उपरान्त जब सरदारों ने अपने संस्थान बनाए, तब समशेर सिंह पारधी ने भी पश्चिमी गिर प्रदेश में बागरी व पारधी परिवारों का नेतृत्व सम्भाला। मात्र 20 वर्ष की आयु से ही वे एक स्वतन्त्र प्रदेश के लिए प्रयासरत थे। वे एक युवा गणनायक घोषित किए गए, जो हजारों पारधी परिवारों के रक्षक थे। उन्होंने महिलाओं, युवाओं और वृद्धों को संगठित कर अंग्रेजों के विरुद्ध सशक्त मोर्चा खोला। वे अपने क्षेत्र के प्रथम जनजातीय सेनानी थे, जिन्होंने 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम की नींव रखी। सौराष्ट्र के समस्त वाघरी और काठियावाड़ी पारधियों ने उन्हें अपना मुखिया स्वीकार किया।


युवा समाजसेवी श्री सुरेश कुमार पारधी, ग्राम करंजा भिलाई से जनजाति शोधार्थी राम कुमार वर्मा का संवाद।

देश की तात्कालिक स्थिति
भारत में व्यापार के उद्देश्य से आई ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने शासक बनने की महत्वकांक्षा में दमनकारी नीतियां प्रारम्भ कर दीं। इसके परिणामस्वरूप भारतीयों में आक्रोश उत्पन्न हुआ। मंगल पाण्डे के विद्रोह के पश्चात सम्पूर्ण देश में स्वतन्त्रता की आकांक्षा तीव्र हो गई। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में सैनिकों ने ब्रिटिश अधिकारियों पर गोलियां चलाईं, क्योंकि सैनिकों को एनफील्ड राइफल में गाय और सूअर की चर्बी युक्त कारतूसों के उपयोग के लिए बाध्य किया जाता था। इस सैनिक विद्रोह ने शीघ्र ही एक व्यापक आन्दोलन का रूप ले लिया।

अंग्रेजों ने अपनी दमनकारी नीतियों को तेज करते हुए कहीं प्रलोभन तो कहीं हड़प नीति का सहारा लिया। समशेर सिंह पारधी ने अपने हजारों अमर सेनानियों के साथ क्रान्ति के समर में प्रवेश किया। पारधी समुदाय के युवा समाजसेवी सुरेश कुमार पारधी बताते हैं कि अमर क्रान्तिकारी समशेर सिंह पारधी ने झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर भी कार्य किया था। उन्होंने गुप्त रूप से अंग्रेजों के हथियारों और गोला बारूद के भण्डारों का पता लगाकर उन्हें नष्ट करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। गुरिल्ला युद्ध और पहाड़ी चोटियों से अचानक आक्रमण करने में पारधी सैनिक अत्यन्त कुशल थे। ऐसे में किलों की रक्षा का दायित्व उन्हें सौंपा गया, जिसमें वे पूर्णतः सफल रहे।
समशेर सिंह पारधी में उत्कृष्ट सैन्य संगठन क्षमता थी। उन्होंने 350 सैनिकों की सहायता से वाघरी नेताओं के साथ बैठक कर स्वराज की रूपरेखा तैयार की। ओखा बेट के निवासियों ने छापामार युद्ध शैली अपनाकर अंग्रेजों के जहाजों पर आक्रमण किया। उन्होंने द्वारिका पर भी हमला किया। समशेर सिंह ने यह भलीभांति समझ लिया था कि संगठित हुए बिना अंग्रेजों का सामना करना असम्भव है। उन्होंने अपने समुदाय के वीर सैनिकों को संगठित कर अंग्रेजी अस्त्र शस्त्रों को नष्ट करने की सफल रणनीति बनाई, ताकि निर्दोष भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों को रोका जा सके। उनकी इस दूरदर्शिता के कारण पारधी बेड़ा के लोग उन्हें अपना गणनायक मानते थे।


जनजाति शोधार्थी राम कुमार वर्मा का पारधी वरिष्ठ जनों से संवाद।

क्रान्तिवीर समशेर पारधी के योगदान ने न केवल पारधी समुदाय के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठ जोड़ा है, अपितु सम्पूर्ण जनजाति समुदाय को गौरवान्वित किया है। छत्तीसगढ़ में पारधी समुदाय द्वारा 1 अप्रैल को उनकी पुण्यतिथि पर विशाल रैली निकालकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। जिला राजनान्दगांव के पारधी जनजाति प्रमुख कमलेश पारधी ने बताया कि कोलिहापुरी, टोलागांव और राजनान्दगांव सहित सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के पारधी जन 1 अप्रैल को एकत्र होते हैं, क्योंकि 1 अप्रैल 1858 को ही उन्हें कलकत्ता की केन्द्रीय जेल में फांसी दी गई थी। इस अवसर पर वे अपने पारम्परिक अस्त्र शस्त्रों और ध्वज के साथ शान्तिपूर्ण रैली निकालते हैं। इससे सामाजिक समरसता के साथ साथ प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के नायकों की देशभक्ति को स्मरण किया जाता है।
मातृभूमि को स्वतन्त्र कराने के इस महायज्ञ में सुदूर वनांचलों और पहाड़ियों में रहने वाले जनजातीय समुदायों का योगदान अविस्मरणीय है। पारधी समुदाय ने अपने अद्वितीय रणकौशल से शासकों की सहायता की। समशेर सिंह पारधी जैसे नायकों के योगदान को व्यापक जनसमुदाय, विशेषकर युवाओं और शोधार्थियों के मध्य प्रचारित करने की महती आवश्यकता है। देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन में जनजातियों के योगदान को रेखांकित करने हेतु स्कूली व महाविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में इन्हें सम्मिलित किया जाना चाहिए। साथ ही इन विषयों पर समय समय पर विचार गोष्ठियों का आयोजन होना भी आवश्यक है।

राम कुमार वर्मा,
संस्कृतिकर्मी व जनजाति शोधार्थी,
जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़)

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