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अहोई अष्टमी : मातृत्व और संतान सुख का पर्व

अहोई अष्टमी : मातृत्व और संतान सुख का पर्व

भारतीय संस्कृति में व्रत और उपवास का विशेष महत्व है। हर व्रत का एक उद्देश्य होता है और उसके पीछे कोई न कोई आध्यात्मिक तथा सामाजिक संदेश छिपा रहता है। इन्हीं व्रतों में से एक है अहोई अष्टमी, जिसे कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व तेरह अक्टूबर को मनाया जाएगा। संतान सुख की प्राप्ति और उसकी दीर्घायु की कामना से सुहागिन महिलाएं यह व्रत रखती हैं। नारद पुराण में इसे “कर्काष्टमी” कहा गया है ।


अहोई आठे/ कर्काष्टमी

व्रत की महत्ता और विधि

अहोई अष्टमी का व्रत अत्यंत कठोर माना गया है क्योंकि इसे प्रायः निर्जला उपवास के रूप में किया जाता है। महिलाएं सुबह स्नान करके संकल्प लेती हैं और दिनभर जल या भोजन का सेवन नहीं करतीं। केवल वे महिलाएं जो निर्जला रहने में असमर्थ होती हैं, वे जल अथवा सात्विक आहार का सीमित सेवन कर सकती हैं। दिनभर की तपस्या के बाद रात्रि में चन्द्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है।

इस दिन कुछ विशेष नियम भी होते हैं। जैसे –

  • जमीन की खुदाई करना निषिद्ध है।
  • दूध का सेवन नहीं किया जाता।
  • फल और सब्जियां काटना वर्जित माना जाता है।

अहोई अष्टमी के दिन महिलाएं चित्रकारी या पेंटिंग के माध्यम से अहोई माता का चित्र बनाती हैं, जिसमें आठ कोष्ठक अवश्य होते हैं। यही कारण है कि इस पर्व को अहोई आठें भी कहा जाता है।


अहोई अष्टमी की पारंपरिक थाप 

अहोई माता का स्वरूप और मान्यता

अहोई माता को देवी पार्वती और कहीं-कहीं माता लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। इन्हें “अनहोनी से बचाने वाली” देवी के रूप में पूजा जाता है। उनकी छवि में बने आठ कोने अष्टमी तिथि का प्रतीक हैं। साथ ही ये आठ सिद्धियों और आठ प्रकार के ऐश्वर्य का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि माता अहोई के आशीर्वाद से संतान सुख की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही संतान का जीवन समृद्ध और सुरक्षित भी बनता है।


माता पार्वती का स्वरुप- अहोई माता

अहोई अष्टमी की कथा

भारतीय व्रत-उत्सव केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनके पीछे कोई प्रेरणादायी कथा भी होती है। अहोई अष्टमी के पीछे एक मार्मिक कथा प्रचलित है।

एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी जो दिपावलीके उपलक्ष्य में मायके आई हुई थी । दिपावली में घर को लीपने के लिए मिटटी लाने हेतु सभी भाभियाँ और उनकी ननंद मिटटी लाने जंगल गयीं । अनजाने में मिट्टी खोदते हुए साहूकार की बेटी की खुरपी सेही (साही) के बच्चे को लग गई और उसकी मृत्यु हो गयी। इस पर क्रोधित होकर सेही ने उसे संतानहीन होने का श्राप दे दिया, इस पर साहूकार की बेटी एक-एक कर अपनी भाभियों से विनती करने लगी कि वह उसका श्राप अपने सर ले लें।

 उस साहूकार की छोटी बहू ने ननंद के स्थान पर वह श्राप स्वयं स्वीकार कर लिया। परिणामस्वरूप, उसकी हर संतान जन्म के सातवें दिन ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती थी। दुखी होकर उसने एक पंडित से उपाय पूछा। पंडित ने उसे सुरही गाय की सेवा करने और सेही माता से क्षमा याचना करने की सलाह दी।


सुरही गाय

छोटी बहू ने पूरे मन से प्रायश्चित किया। उसकी निष्ठा और पश्चाताप से प्रसन्न होकर सेही माता ने उसे सात पुत्रों और सात बहुओं का आशीर्वाद दिया। साथ ही आदेश दिया कि हर वर्ष कार्तिक कृष्ण अष्टमी को उनकी पूजा करनी होगी। तभी से इस  व्रत को करने की परंपरा बन गयी।

यह कथा हमें यह संदेश देती है कि पश्चाताप और भक्ति से जीवन की सबसे बड़ी भूलों को भी सुधारा जा सकता है।

मातृत्व और समर्पण का प्रतीक

अहोई अष्टमी केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह मातृत्व के उस गहरे भाव का प्रतीक है जिसमें एक मां अपने बच्चों की दीर्घायु और सुखी जीवन के लिए हर कठिनाई को सहने के लिए तैयार रहती है। यह व्रत हमें यह भी सिखाता है कि श्रद्धा, धैर्य और पश्चाताप से जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों को भी बदला जा सकता है।

अहोई अष्टमी का पर्व भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का द्योतक है जिसमें व्रत, कथा और पूजा केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का पाठ भी पढ़ाते हैं। यह पर्व हमें मातृत्व की शक्ति, संतान के प्रति असीम प्रेम और क्षमा की महत्ता का बोध कराता है। साहूकार की बेटी और छोटी बहू की कथा हमें बताती है कि सच्चे मन से किया गया पश्चाताप हर कठिनाई को दूर कर सकता है।

अतः अहोई अष्टमी का व्रत केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह मां के असीम त्याग और प्रेम का उत्सव है। जब एक मां पूरे दिन निर्जला रहकर केवल अपनी संतान की लंबी आयु और सुखद भविष्य के लिए प्रार्थना करती है, तो यह मानवता के सबसे पवित्र भावों में से एक बन जाता है।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

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