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कृषि, अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा- ग्रामोद्योग भाग 3

कृषि, अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा- ग्रामोद्योग भाग 3

कृषि आधारित ग्रामोद्योग भारत की अर्थव्यवस्था की वह सुदृढ़ नींव हैं, जो कम पूंजी में रोजगार, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती हैं। ये उद्योग विकास, संवेदनाओं और स्वदेशी शक्ति का संतुलित मॉडल प्रस्तुत करते हैं।

सोने की चिड़िया कहलाने वाले हमारे देश की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान सदैव अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। मानव के उद्विकास के क्रम में कृषि ही वह मूल घटक रही है जिसने मनुष्य की घुमंतू जीवन शैली को स्थायित्व प्रदान किया और विकास की गति को दिशा दी।

जब अंग्रेजों ने भारत में प्रवेश किया, तब यहाँ की समृद्धि देखकर वे चकित रह गए। इस समृद्धि का मूल कारण भारत की उन्नत कृषि व्यवस्था और सशक्त ग्रामोद्योग थे। किंतु जब उन्हें यह भान हुआ कि ऐसे उन्नत और आत्मनिर्भर समाज पर आधिपत्य करना सरल नहीं, तब उन्होंने अपनी कुटिल नीतियों के अंतर्गत भारत की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की योजनाएँ बनाईं।

ग्रामोद्योग एवं कुटीर उद्योगों पर प्रतिबंध लगाकर उन्होंने देश को गरीबी के दुष्चक्र में धकेल दिया। परंतु यह भी सत्य है कि यदि किसी वृक्ष की जड़ें मजबूत हों, तो चाहे उसकी टहनियों और तनों पर कितने ही प्रहार क्यों न किए जाएँ, वे जड़ें समय लेकर ही सही, उसे पुनः हराभरा कर देती हैं । यह उपमा हमारी वर्तमान अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह सटीक बैठती है।

अर्थव्यवस्था की नींव - कृषि
अर्थव्यवस्था की नींव - कृषि 

आज भारत जब विकसित से विकासशील और फिर विकसित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है, तब ग्रामोद्योग की भूमिका पुनः केंद्र में आ रही है। हस्तशिल्प के अंतर्गत खादी, वन आधारित उद्योगों में बांस शिल्प के बाद इसी क्रम में कृषि आधारित उद्योगों का महत्त्व विशेष रूप से उभरता है।

कृषि आधारित उद्योगों के अंतर्गत पशुपालन, औषधीय फसलों का उत्पादन, मसाले, पापड़, जैम, जेली, घानी तेल, मत्स्य पालन आदि सम्मिलित हैं। कृषि से जुड़े कुटीर एवं लघु उद्योग जैसे डेयरी एवं पशुपालन, औषधीय फसलों की खेती, मसाला प्रसंस्करण, पापड़ एवं अचार निर्माण, फल संरक्षण (जैम, जेली), घानी या कोल्ड-प्रेस्ड तेल, मत्स्य पालन तथा बांस शिल्प केवल घर-गृहस्थी के छोटे काम नहीं हैं।

वास्तव में, ये न्यूनतम लागत पर संचालित होने वाला एक समानांतर औद्योगिक ढांचा हैं, जो न केवल बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करते हैं, बल्कि गांव से शहर की ओर पलायन को कम करते हैं और किसानों की उपज में मूल्य संवर्धन कर उनकी आय बढ़ाते हैं।

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) के अनुसार:

  • भारत में गांव एवं कुटीर उद्योग क्षेत्र में लगभग 6.3 करोड़ से अधिक लोग रोजगार से जुड़े हैं, जो कृषि के बाद ग्रामीण रोजगार का सबसे बड़ा साधन है।
  • जुलाई 2025 तक, वित्त वर्ष 2024-25 में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात लगभग 49.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात का लगभग 20.4 प्रतिशत हिस्सा था। इसी अवधि में पंजीकृत खाद्य व्यवसाय संचालकों की संख्या 25 लाख से बढ़कर 64 लाख हो गई।
  • वित्त वर्ष 2024-25 में हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्र में हस्तशिल्प निर्यात ₹33,122.79 करोड़ तक पहुंच गया।
  • खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग ₹1.70 लाख करोड़ का ऐतिहासिक कारोबार दर्ज किया, जिससे ग्रामीण भारत में 1.55 करोड़ से अधिक लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित हुए।

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग अर्थव्यवस्था में हैं महत्वपूर्ण
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग अर्थव्यवस्था में हैं महत्वपूर्ण

ये आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि उन लाखों घरों की कहानी हैं जो छोटे-छोटे उत्पादक केंद्रों में परिवर्तित हो चुके हैं। ये उन स्व-सहायता समूहों की गाथा हैं, जिन्हें महिलाएँ संचालित कर रही हैं, और उन युवाओं के सपनों का प्रतिबिंब हैं जो शहरों से लौटकर अपने गांव में उद्यमिता की नई राह बना रहे हैं।

मत्स्य पालन के क्षेत्र में भारत वैश्विक स्तर पर चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। प्रायद्वीपीय भारत का क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिससे मत्स्य पालन उद्योग का देश की अर्थव्यवस्था में महत्त्व स्वतः स्पष्ट हो जाता है। जलीय कृषि एक तीव्र गति से उभरता हुआ क्षेत्र है, जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा और पोषण स्तर को बढ़ाने की असीम संभावनाएँ निहित हैं।

मत्स्य उद्योग में भारत वैश्विक स्तर पर रखता है दूसरा स्थान
मत्स्य उद्योग में भारत वैश्विक स्तर पर रखता है दूसरा स्थान

जब भी हम पापड़ खाने का मन बनाते हैं, चाहे किसी भी ब्रांड का चयन करें, लिज़्ज़त पापड़ का वह विज्ञापन अवश्य स्मरण हो आता है जिसे हम बचपन में देखा करते थे। इस उद्योग की शुरुआत वर्ष 1959 में गुजरात में मात्र सात महिलाओं द्वारा 80 रुपये की लागत से की गई थी।

घरेलु उद्योग- स्वालंबन का प्रतीक 
 
घरेलु उद्योग- स्वालंबन का प्रतीक 

आगे चलकर इसने करोड़ों का लाभ अर्जित किया और घरेलू उद्योगों के लिए एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। विशेष रूप से महिलाओं के लिए यह स्वावलंबन का एक सुरक्षित और सहज विकल्प बनकर उभरा।

आज भारत में मसाले, अचार और पापड़ के असंख्य क्षेत्रीय उत्पाद उपलब्ध हैं, जिन्हें लोग बड़े चाव से उपभोग करते हैं। इतना ही नहीं, अब कई भारतीय ब्रांड विदेशों में इडली-डोसा के घोल जैसी खाद्य सामग्रियों की आपूर्ति कर रहे हैं और अच्छा लाभ अर्जित कर रहे हैं।

वर्तमान की भागदौड़ भरी जीवनशैली में ये छोटी-छोटी सुविधाएँ हमारी खुशियों में एक अतिरिक्त मुस्कान जोड़ती हैं। भारत जैसे विविधता से परिपूर्ण देश में, लोग घर से दूर रहकर भी इन खाद्य उत्पादों के माध्यम से घर का अपनापन महसूस करते हैं, क्योंकि भोजन केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं से गहराई से जुड़ा विषय है।

खाना एक शारीरक क्रिया मात्र नहीं संवेदना भी 
खाना एक शारीरक क्रिया मात्र नहीं संवेदना भी 

ऐसे घरेलू एवं कुटीर उद्योगों की सूची अत्यंत लंबी है, जिनकी समग्र चर्चा संभव नहीं । किंतु सार यही है कि जब भारत 2030 तक ‘विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था’ बनने और 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, तब यह अत्यंत आवश्यक है कि स्वदेशी उत्पादों और तकनीकों की उपेक्षा न हो।

देश का लक्ष्य 2047 तक विकसित भारत बनना है 
देश का लक्ष्य 2047 तक विकसित भारत बनना है 

ये सदैव से हमारी अर्थव्यवस्था की नींव रहे हैं । यदि यह नींव कमजोर पड़ गई, तो पुनः सुदृढ़ निर्माण एक कठिन और श्रमसाध्य कार्य होगा। कम पूँजी निवेश और बुनियादी कौशल के माध्यम से रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने, देश की क्रय शक्ति बढ़ाने और क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने में ग्रामोद्योग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इसलिए यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि ग्रामोद्योग हमारी अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन के समान हैं।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

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