अगहन मास और छत्तीसगढ़ का लोक जीवन
November 13, 2025
संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार
नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

अगहन मास को सनातन संस्कृति में पवित्र मास के रूप में जाना जाता है।यह भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।इस माह के शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि को भगवान श्रीराम चंद्र के विवाहोत्सव के रुप में मनाया जाता है और एकादशी के दिन मोक्षदायिनी गीता जयंती मनाई जाती है।देवगुरु बृहस्पति और मां लक्ष्मी की आराधना इस माह में की जाती है।

माँ लक्ष्मी की उपासना
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है-मासानां मार्गशीर्षोअह्म।अर्थात सभी मासों में श्रेष्ठ मास मार्गशीर्ष की तरह हूं मैं।इसका एक अर्थ मार्ग+शीर्ष अर्थात मार्गों में जो श्रेष्ठ हो भी है।कुल मिलाकर अघहन मास धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत श्रेष्ठ है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम चंद्र के विवाह के अवसर पर चौपाई में लिखा है-
मंगल मूल लगन दिन आवा।हिम रितु अगहनु मासु सुहावा।।

अगहन गुरुवार के दिन बनी रंगोली
अगहन मास और अन्न का आगमन
छत्तीसगढ़ में दीपावली मनाने के पश्चात कृषि कार्य में तेजी आती है। छत्तीसगढ़ की पहचान धान की ऊपज खेतों से खलिहान तक तत्पश्चात घर में आती है। भांति भांति की सब्जियों की भरमार होती है। सर्वत्र खुशहाली का वातावरण दिखाई देता है। प्रकृति भी आनंदित जान पड़ता है। आजकल की यांत्रिक कृषि के कारण छत्तीसगढ़ की परंपरागत रीति-रिवाज भी अब शनै:शनै: लुप्तप्राय होने लगे हैं। पहले धान की फसल को मिंजाई के बाद ससम्मान घर की कोठी तक लाया जाता था।अन्न लक्ष्मी का ही एक स्वरुप है।अन्न लक्ष्मी के रुप में छत्तीसगढ़ के किसान धान की सदैव पूजा करते रहे हैं।
अघहन बृहस्पति पूजन
अगहन मास में छत्तीसगढ़ के गांव गांव में अघहन बृहस्पति की पूजा होती है। अगहन मास के प्रथम गुरुवार से लेकर अंतिम गुरुवार तक उत्सव का माहौल रहता है। महिलाएं गुरुवार के एक दिन पूर्व ही व्रत की तैयारी कर लेती है।घर की साफ सफाई कर घर के मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर आंगन होते हुए पूजा घर तक लक्ष्मी पांव से अलंकृत अल्पना बनाती है।इसे नये चांवल को रातभर भिगोने के बाद पीसकर बनाई जाती है। चांदनी रात में इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है। परंपरागत आकृतियां मन मोह लेती है।
पूजा स्थल पर बांस की टोकरी में धान भरकर उसमें मां लक्ष्मी की प्रतिमा या छायाचित्र स्थापित करती है।गौरी गणेश और कलश की स्थापना भी होती है। नारियल,केला,चना दाल और मौसमी फल का भोग लगाया जाता है।धान की बाली, आंवला की डंगाल और आम की पत्तियों से सजावट की जाती है।आसपास की महिलाएं आपस में घर घर जाकर दोपहर को माता लक्ष्मी की कथा सुनती और सुनानी हैं।पहले लोककथा ही बांची जाती थी लेकिन आजकल विभिन्न प्रकाशकों के द्वारा मुद्रित व्रत कथाओं का वाचन किया जाता है।

दान, सत्संग और पुण्य कमाने का माह
छत्तीसगढ़ में अगहन मास अन्न संग्रहण के साथ ही दान और सत्संग का महीना भी होता है।इस महीने में अन्य प्रांतों के याचक भी आते हैं और यथोचित दान सम्मान प्राप्त करते हैं।पहले हरबोलवा,बसदेवा गायक,गोरख महराज और उत्तराखंड के पंडों का आगमन छत्तीसगढ़ में होता था।ठंड भरी रात में अलाव जलाकर गांवों में पंडवानी, हरि कीर्तन और श्रीरामचरितमानस पाठ जैसे आयोजन होते थे।आज भी यदा-कदा ऐसे आयोजन होते रहते हैं। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में दान रचा बसा है।
धान की फसल की लुआई की शुरुआत में ही सर्वप्रथम चिरईचुगनी बनाते थे।लुवाई के अंत में बढोना़ छोड़ते थे जो चूहे जैसे जीव जंतु का भरण पोषण करते थे। खलिहान में आने के बाद कृषि कार्य में सहयोग करने वाले चाकरों और बच्चों को कोठार देने की परंपरा थी।कोठी में अन्न डालने से पहले घुमंतू साधु संतों को दान किया जाता था और कोठी में अन्न डालने के बाद फिर से छेरछेरा में वापस धान को निकालकर दान किया जाता था। छत्तीसगढ़ समृद्ध रहा है और यहां की संस्कृति भी समृद्ध रही है। मां लक्ष्मी की कृपा इस भू-भाग पर सदैव रहा है।
लेख
रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)
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