गुरु हरगोबिंद जी की दो तलवारे: "मीरी-पीरी"अध्यात्म और साहस" का संगम
June 30, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

तमिल साहित्य और दर्शन भारत की सांस्कृतिक धरोहर के महत्त्वपूर्ण स्तम्भ हैं। दक्षिण भारत में 12वीं शताब्दी की सन्त कवयित्री अव्वैयार द्वारा रचित आठिचूड़ी इसी परम्परा का एक अनमोल रत्न है। इस रचना में तमिल वर्णमाला के माध्यम से जीवन के उच्च आदर्शों और नैतिक मूल्यों को अत्यन्त सरलता से पिरोया गया है। आज के युग में जहाँ नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, अव्वैयार के ये नीति सूत्र हमें आत्म अवलोकन की प्रेरणा देते हैं। प्रस्तुत लेख में आठिचूड़ी की पृष्ठभूमि, इसके सृजन की कथा और इसके शाश्वत सन्देशों पर प्रकाश डाला गया है। यह लेख नई पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक सिद्ध होगा।
दक्षिण भारत में 12वीं शताब्दी के दौरान चोल राजवंश का काल अपने शिखर पर था। यह वह समय था जब कला, भवन निर्माण और साहित्य का चहुँमुखी विकास हो रहा था। उस दौर में तमिल भाषा का साहित्य भी निरन्तर समृद्ध हो रहा था। इसी युग में एक ज्ञान परिपूर्ण सन्त कवयित्री का आगमन हुआ।
समाज उन्हें आदर और स्नेह से अव्वैयार कहता है। तमिल भाषा में अव्वैयार शब्द का अर्थ दादी है। वह एक श्रेष्ठ कवयित्री होने के साथ साथ लोक कल्याण की पर्याय भी थीं। अव्वैयार का जीवन अत्यन्त सादगी भरा था।
साधारण सूती वस्त्र पहने और हाथ में एक पुरानी लकड़ी की छड़ी थामे वह एक गाँव से दूसरे गाँव भ्रमण करती थीं। एक चौपाल से दूसरी चौपाल तक उनकी यात्राएँ निरन्तर चलती रहती थीं। उनका मुख्य उद्देश्य समाज में नैतिकता का प्रसार करना और लोगों को सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना था।

अव्वैयार -12वीं शताब्दी की महान संत कवयित्री
उन्होंने राजसी महलों के ऐश्वर्य को अस्वीकार कर दिया और अपना सम्पूर्ण जीवन आम लोगों के बीच बिताया। अव्वैयार ने समाज के लिए कई साहित्यिक ग्रन्थ लिखे। इनमें “कोनरै वेंथन” और “विनायक अकवल” प्रमुख हैं। इन रचनाओं में दैनिक जीवन को सही ढंग से जीने के सूत्र पिरोए गए हैं।
उनकी सबसे विशिष्ट रचना आठिचूड़ी है। यह रचना पीढ़ियों से लोगों का मार्ग प्रशस्त करती आ रही है। “आठिचूड़ी” तमिल वर्णमाला के अक्षरों पर आधारित एक लघु नीति काव्य है। अव्वैयार का मानना था कि जिस प्रकार हम अक्षरों का आदर करते हैं, उसी प्रकार उन अक्षरों से शुरू होने वाले सद्गुणों को भी जीवन में उतारना चाहिए।
उन्होंने जीवन के गहरे दर्शन, अध्यात्म और व्यावहारिक ज्ञान को अत्यन्त सरल बना दिया। सत्य, विनम्रता, क्षमा, दानशीलता और इन्द्रिय निग्रह जैसे गुण उनकी शिक्षाओं के मूल तत्त्व हैं। यह रचना बच्चों की समझ में आसानी से आ जाती है और बुजुर्गों के लिए भी समान रूप से अर्थपूर्ण है।
तमिलनाडु की भूमि सदा से ही उत्सवों और संस्कारों की धरती रही है। एक समय पोंगल का पर्व था। चारों ओर धान के सुनहरे खेत लहलहा रहे थे। यह दृश्य सूर्य देव और धरती माता के प्रति कृषकों की कृतज्ञता की कहानी कह रहा था। गाँवों में उत्सव का माहौल था। बच्चे नए वस्त्र पहनकर उमंग और उत्साह में गलियों में दौड़ लगा रहे थे।
उसी सुबह वृद्ध अव्वैयार गाँव के मुहाने पर स्थित एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे विश्राम करने बैठीं। उनकी दृष्टि पास ही खेल रहे बच्चों के एक समूह पर पड़ी। त्योहार का माहौल होने के बाद भी बच्चों के उस झुंड में अजीब हलचल थी।
कोई बालक छोटी सी बात पर क्रोधित होकर अपने साथी पर चिल्ला रहा था। कोई कटु शब्द बोल रहा था, तो कुछ बच्चे खिलौनों के लिए आपस में ही झगड़ रहे थे।अव्वैयार शान्त रहकर यह सब देखती रहीं। उनके मन में विचार आया कि इस बार की अच्छी फसल ने किसानों के कोठारों को अन्न और धन से भर दिया है।
इन छोटे बच्चों के मनों को कौन सा विचार पोषित करेगा। पोंगल का त्योहार इन्हें वर्ष में एक बार कृतज्ञ होना सिखाता है। दैनिक जीवन की कठिनाइयों से लड़ने और एक अच्छा मनुष्य बने रहने के लिए इन्हें सीधे और सरल नियमों की आवश्यकता है।

पोंगल- प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व
समझदार किसान अपने अमूल्य अन्न में से उत्तम और पुष्ट बीजों को चुनकर रखता है। इससे उन्हें अगली बुवाई में मिट्टी में रोपा जा सकता है। इसी तरह अव्वैयार के मन में मानव कल्याण का एक विचार अंकुरित हुआ।
उन्होंने सोचा कि जीवन की बुद्धिमत्ता को बहुत छोटी और संगीतमय पंक्तियों के रूप में बचपन की उम्र में ही बो दिया जाए। संस्कार के ये बीज इस अवस्था में पड़ने से बड़े होकर ये बच्चे विशाल और फलदार वृक्ष बनेंगे।
इसी विचार को साकार करने के लिए अव्वैयार ने कई रातें विचार करते हुए बिताईं। कई शामें नदी के शान्त किनारों पर व्यतीत कीं। उन्होंने ऐसी अनुपम पंक्तियाँ रचीं, जिनमें से प्रत्येक पंक्ति तमिल वर्णमाला के एक क्रमिक अक्षर से आरम्भ होती थी।
अक्षर अ से शुरू होकर अन्तिम अक्षर तक जाने वाली यह विधा अत्यन्त सरल थी। बच्चे खेलते कूदते और गुनगुनाते हुए इन्हें कंठस्थ कर सकते थे। शिक्षा के साथ-साथ यह चरित्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम बन गया। उन्होंने इस नीति संग्रह का नाम आठिचूड़ी रखा।
आठी भगवान शिव को प्रिय एक श्वेत फूल होता है। चूड़ी का अर्थ माला या मुकुट है। जैसे आठी का फूल एक नई और शुद्ध शुरुआत का प्रतीक है, ठीक वैसे ही यह आठिचूड़ी भी मानव मन के परिष्कार का एक प्रयास थी।
अव्वैयार द्वारा तैयार की गई ये पंक्तियाँ कोई राजाज्ञा या कठोर शासन के नियम नहीं थे, बल्कि यह एक वात्सल्यमयी दादी की ओर से दिए गए उपदेश और प्रेम भरी थपकियाँ थीं। जिसे समाज ने इन्हें खुशी से अपना लिया।
आठिचूड़ी में 108 पंक्तियाँ हैं। इसकी एक छोटी सी पंक्ति के भीतर सम्पूर्ण जीवन का दर्शन छिपा हुआ है। अव्वैयार के इस संग्रह से लिए गए कुछ प्रसिद्ध और प्रभावशाली सूत्रों को उनके अर्थ और व्यावहारिक महत्त्व के साथ समझा जा सकता है।

बच्चों को संस्कारवान बनाने का माध्यम है आठीचूड़ी
अ- “आरम सेय विरुम्बु” का अर्थ है कि भलाई और परोपकार करने की इच्छा भीतर स्वाभाविक रूप से जाग्रत होनी चाहिए। अव्वैयार कहती हैं कि अच्छे कार्य किसी दबाव या दिखावे के लिए नहीं होने चाहिए। यह अन्तरात्मा की खुशी के लिए होना चाहिए। परोपकार ही मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है। स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई करने वाला समाज में हमेशा सम्मान पाता है।
आ-“आरुवथु सिनम” सिखाता है कि अपने उबलते हुए क्रोध को शान्त करो। उसे ठंडा होने दो। उबलता हुआ पात्र स्वयं को ही जलाता है। अनियंत्रित क्रोध मनुष्य के विवेक को नष्ट कर देता है। क्रोध पर विजय प्राप्त करना ही सच्ची वीरता है और इससे कई सम्भावित विवादों को टाला जा सकता है।
इ- “इयल्वथु करावेल” का सन्देश है कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों को दान दो। अपनी उदारता को कभी मत छुपाओ। समाज में रहते हुए त्याग की भावना ही सच्ची सम्पन्नता है। बाँटने से धन और ज्ञान दोनों में निरन्तर वृद्धि होती है।
ई- “ईवथु विलक्केल” के अनुसार यदि कोई जरूरतमन्द की मदद कर रहा हो, तो उसमें बाधा मत डालो। परोपकार के कार्य में रोड़े अटकाना मानवीय मूल्यों के विरुद्ध है। दूसरों की भलाई देखकर मन में प्रसन्नता होनी चाहिए। ईर्ष्या से मुक्त हृदय ही सच्चे आनन्द का अनुभव कर सकता है।
ए- “एन्न एझुथु इगाझेल” का अर्थ है कि विद्या, संख्याओं और अक्षरों का कभी अपमान मत करो। गणित और साहित्य दोनों ही जीवन के विकास के लिए आवश्यक हैं। शिक्षा ही अज्ञान के अन्धकार को मिटाती है। ज्ञान अर्जन एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है जिसे पूरे उत्साह से अपनाना चाहिए।
“कूत्ताड क कूडादु” का अर्थ है कि व्यर्थ के नाच कूद, प्रपंच और उछल कूद में अपने अमूल्य समय को नष्ट मत करो। यह सूत्र बच्चों को आत्म अनुशासन और एकाग्रता सिखाता है। समय का सदुपयोग जीवन को सार्थक बनाता है और सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।
“ताई तन्तै उयरवू” का तात्पर्य है कि अपने माता-पिता को संसार में सर्वोपरि मानो। उनका हृदय से सम्मान करो। उनकी सेवा और आदर ही जीवन का सबसे बड़ा व्यावहारिक धर्म है। माता पिता का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा है और उनके आशीर्वाद से जीवन की हर बाधा दूर हो जाती है।
समय के साथ अव्वैयार की यह ओजस्वी वाणी गाँव की सीमा को पार करके पूरे तमिल क्षेत्र और जन जन के मनों में व्याप्त हो गई। यह पीढ़ियों के लिए एक ऐसा प्रकाश स्तम्भ बन गई जो अज्ञान में भटके हुए लोगों को सही राह दिखाती है।
आज भी तमिलनाडु के सुदूर गाँवों से लेकर आधुनिक नगरों तक के विद्यालयों में बच्चों को सबसे पहले आठिचूड़ी के अक्षरों का पाठ कराया जाता है। घरों और देवस्थानों में भी इसका पठन पाठन होता है। पोंगल के अवसर पर घरों में नए अन्न का भोग तैयार होते समय बच्चे अपनी आवाज़ में इन सूत्रों को दोहराते हैं।
यह इस बात का प्रमाण है कि बाहरी धन धान्य की समृद्धि जितनी आवश्यक है, अन्तर्मन की नैतिक समृद्धि उससे कहीं अधिक अनिवार्य है। कक्षाओं में गुरुजन इन सूत्रों को मधुर रागों में गाकर शिष्यों को सिखाते हैं। माताएँ लोरी गाते समय बच्चों के अवचेतन मन में इन्हें उतार देती हैं।
खेतों में कड़ा परिश्रम करने वाले कृषक भी इन सूत्रों का स्मरण करके मानसिक शान्ति पाते हैं। यह काव्य हर आयु वर्ग के लिए एक सम्बल बन गया है। अव्वैयार का यह सन्देश आज के इस तनाव भरे युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है।
बचपन से ही बच्चों के मनों को इन संस्कारों से सींचने पर आने वाली पीढ़ियाँ चरित्रवान बनेंगी। वे शान्त और अन्तःकरण की उज्ज्वल रोशनी से जगमगाएंगी। हम सबको भी अपने घरों और समाज में बुद्धिमत्ता के इन बीजों को बोना चाहिए। बुद्धिमत्ता को जीवन के आरम्भ में बोने से मानव का पूरा जीवन एक उत्सव बन जाता है।
-श्रीनिवास चारी
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