आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

नर और नारायण : एक अनोखी मित्रता

नर और नारायण : एक अनोखी मित्रता


इतिहास में मित्रता की अनेक मिसालें मिलती हैं। किसी ने मित्र के लिए अपना राज्य छोड़ा, किसी ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। परन्तु ऐसी मित्रता, जिसमें प्रेम हो, विश्वास हो, मार्गदर्शन हो और आवश्यकता पड़ने पर मित्र के अहंकार को भी तोड़ने का साहस हो, वह केवल श्रीकृष्ण और अर्जुन की मित्रता में दिखाई देती है। शायद इसी कारण भारतीय परम्परा उन्हें केवल दो महान व्यक्तियों के रूप में नहीं देखती। वह उन्हें नर और नारायण का अवतार मानती है।


कृष्ण और अर्जुन का सम्बन्ध केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं था। वे साथ हँसे, साथ लड़े, साथ यात्राएँ कीं और एक-दूसरे के मन को बिना कहे ही समझते थे। खाण्डव वन दहन के बाद जब देवराज इन्द्र ने प्रसन्न होकर अर्जुन से वर माँगने को कहा, तो अर्जुन ने दिव्य अस्त्र-शस्त्र माँगे। फिर इन्द्र ने श्रीकृष्ण से भी वर माँगने का आग्रह किया। सर्वसमर्थ श्रीकृष्ण ने न धन माँगा, न वैभव, न विजय। उन्होंने केवल इतना कहा - “अर्जुन के साथ मेरा प्रेम सदैव बना रहे।” यह सुनकर देवगण भी विस्मित रह गए। जो सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी हो, वह अपने मित्र के प्रेम को सबसे बड़ा वरदान माने - इससे बढ़कर मित्रता का प्रमाण और क्या हो सकता है? किन्तु सच्ची मित्रता केवल सुख के दिनों में ही साथ हो ऐसा नहीं है। उसका वास्तविक स्वरूप तब प्रकट होता है, जब मित्र भूल करने लगे।

ऐसा ही एक अवसर द्वारका में आया। नगर में एक विद्वान ब्राह्मण रहता था। उसके घर जब भी पुत्र जन्म लेता, वह जन्म लेते ही रहस्यमय ढंग से गायब हो जाता। न कोई रोग, न कोई शत्रु, न कोई कारण। केवल जन्म और फिर तत्काल वियोग। हर बार शोकाकुल ब्राह्मण अपने मृत शिशु को राजमहल के द्वार पर रख देता और विलाप करता, “यदि राज्य में धर्म की रक्षा होती, तो एक पिता को बार-बार यह दुःख न सहना पड़ता।”


कृष्ण-अर्जुन की मित्रता

राजा से लेकर यादवों के श्रेष्ठ योद्धाओं तक सबने उपाय किए, पर रहस्य अनसुलझा ही रहा। उसी समय अर्जुन द्वारका आए हुए थे। उन्होंने ब्राह्मण का करुण क्रन्दन सुना। उनके भीतर का क्षत्रिय जाग उठा। वे आगे बढ़े और दृढ़ स्वर में बोले, “इस बार तुम्हारे घर पुत्र होगा तो उसकी रक्षा मैं करूँगा। यदि अपने वचन से पीछे हट गया, तो अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दूँगा।”

ब्राह्मण ने अर्जुन को ध्यान से देखा। उसके चेहरे पर आशा से अधिक अविश्वास था। उसने कहा, “जब स्वयं श्रीकृष्ण, बलराम और द्वारका के महान वीर मेरे पुत्रों को नहीं बचा सके, तब आप कैसे बचाएँगे?” यह प्रश्न अर्जुन के हृदय में चुभ गया। उन्होंने उत्तर दिया, “मैं गांडीवधारी अर्जुन हूँ। मृत्यु से भी लड़ सकता हूँ।”

पास बैठे श्रीकृष्ण ने सब कुछ सुना। उन्होंने न अर्जुन को रोका, न समझाया। केवल मुस्करा दिए। मित्र के हृदय को वे किसी और से अधिक जानते थे। उन्हें समझ आ गया था कि अर्जुन का आत्मविश्वास धीरे-धीरे अभिमान की सीमा छूने लगा है।


 प्रतिज्ञा करते हुए गांडीवधारी अर्जुन

समय बीतता गया। जब ब्राह्मण की पत्नी के प्रसव का समय आया, अर्जुन स्वयं उसके घर पहुँचे। उन्होंने दिव्य अस्त्रों का स्मरण किया और बाणों का ऐसा अभेद्य कवच बना दिया कि मानो उस भवन में हवा भी प्रवेश न कर सके। उन्हें पूरा विश्वास था कि अब कोई शक्ति उस बालक को छू भी नहीं सकेगी। कुछ ही देर बाद शिशु के जन्म का मधुर स्वर सुनाई दिया। अर्जुन के चेहरे पर संतोष की मुस्कान उभरी। लेकिन वह मुस्कान अगले ही क्षण मिट गई। सबकी आँखों के सामने नवजात बालक अदृश्य हो गया। न द्वार खुला, न दीवार टूटी, न बाणों का कवच भेदा गया। फिर भी बालक वहाँ नहीं था।

अर्जुन अवाक् रह गए। ब्राह्मण का धैर्य टूट चुका था। वह कटु स्वर में बोला, “जिसे अपनी शक्ति पर इतना अभिमान था, वह भी कुछ न कर सका। मेरे लिए यह नया दुःख नहीं, पर तुम्हारा वचन अवश्य टूट गया।” ये शब्द किसी बाण से कम न थे।

अर्जुन ने उसी क्षण प्रतिज्ञा निभाने का निश्चय किया। पर उससे पहले वे बालक की खोज में निकल पड़े। उन्होंने योगबल से यमलोक का मार्ग लिया। इन्द्रलोक पहुँचे। वरुण, अग्नि और अन्य देवताओं के लोकों में खोज की। पाताल तक गए। जहाँ-जहाँ मनुष्य की कल्पना पहुँच सकती थी, वहाँ-वहाँ उन्होंने उस बालक को ढूँढ़ा। किन्तु सब व्यर्थ। अन्ततः वे लौट आए। उनकी प्रतिज्ञा अधूरी थी। अब उन्हें केवल अग्नि ही दिखाई दे रही थी। उन्होंने चिता सजाई और शांत मन से उसकी ओर बढ़ चले।


अर्जुन को ज्ञान देते हुए श्रीकृष्ण

उसी समय किसी ने उनका हाथ थाम लिया। वह श्रीकृष्ण थे। उन्होंने अर्जुन की ओर देखा। उनके चेहरे पर न उपहास था, न शिकायत। उन्होंने केवल इतना कहा - “मित्र, एक असफलता तुम्हारे जीवन का निर्णय नहीं कर सकती। अभी मेरे साथ चलो।”

अर्जुन बिना कुछ बोले रथ पर बैठ गए। दिव्य रथ पश्चिम दिशा की ओर बढ़ा। वह समुद्रों को पार करता गया। पर्वत पीछे छूटते गए। फिर वे उस प्रदेश में पहुँचे जहाँ प्रकाश समाप्त होता था और घना अंधकार आरम्भ। रथ के अश्व भी ठिठक गए। तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र का स्मरण किया। क्षणभर में ऐसा प्रकाश फैला मानो सहस्रों सूर्य एक साथ उदित हो उठे हों। मार्ग स्वयं खुलता चला गया।

उस प्रकाश के पार अर्जुन ने एक ऐसा लोक देखा जिसकी कल्पना भी उन्होंने कभी नहीं की थी। अनन्त शेष पर भगवान महाविष्णु विराजमान थे। सम्पूर्ण वातावरण दिव्य तेज से आलोकित था। उनके समीप वही सभी बालक सुरक्षित खेल रहे थे, जिनके लिए एक पिता वर्षों से विलाप कर रहा था। श्रीकृष्ण और अर्जुन ने प्रणाम किया।


महाविष्णु के दिव्य लोक में ब्राह्मण के पुत्र

महाविष्णु ने स्नेहभरी मुस्कान के साथ कहा, “हे नर और नारायण! मैंने इन बालकों को इसलिए यहाँ बुलाया था कि एक साथ तुम दोनों के दर्शन कर सकूँ। पृथ्वी पर तुम्हारी मित्रता युगों तक स्मरण की जाएगी। अब इन्हें लेकर लौट जाओ।”

अर्जुन मौन खड़े रहे। उन्हें लगा मानो उनके भीतर कुछ टूट गया हो। वह अभिमान, जो उन्हें अजेय समझने लगा था, उसी क्षण विलीन हो गया। द्वारका लौटकर उन्होंने ब्राह्मण को उसके सभी पुत्र सौंप दिए। वर्षों से सूनी पड़ी उस गृहस्थी में पहली बार उत्सव का वातावरण था। ब्राह्मण की आँखों में आँसू थे, पर इस बार वे दुःख के नहीं, कृतज्ञता के आँसू थे।

उस दिन लोगों ने एक और बात देखी। विजयी होकर लौटने वाले अर्जुन पहले जैसे नहीं थे। उनके हाथ में वही गांडीव था। उनकी वीरता भी वही थी। पर उनके भीतर एक नई विनम्रता जन्म ले चुकी थी। उन्होंने समझ लिया था कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसके अस्त्र नहीं, उसका अहंकार भी नहीं, बल्कि वह सच्चा मित्र है जो समय आने पर उसका रथ भी संभाल ले और उसका मन भी।


ब्राह्मण को पुत्र सौंपते कृष्ण और अर्जुन

श्रीकृष्ण ने उस दिन केवल एक ब्राह्मण के पुत्रों को ही नहीं लौटाया था। उन्होंने अपने प्रिय मित्र अर्जुन को भी स्वयं अर्जुन से बचा लिया था। शायद यही इस कथा का सबसे बड़ा संदेश है। ईश्वर जब मित्र बनते हैं, तब वे केवल संकट दूर नहीं करते; वे हमारे भीतर छिपे उस अहंकार को भी दूर कर देते हैं जो हमें उनसे और अपने वास्तविक स्वरूप से दूर ले जाता है।

इसीलिए भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण और अर्जुन की मित्रता केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत आदर्श मानी जाती है - ऐसी मित्रता, जिसमें प्रेम है, विश्वास है, सुधार है और अंततः आत्मोन्नति भी।

- श्रीनिवासा चारी 
लेखक भारतीय संस्कृति व रामायण परंपरा के कथाकार हैं, जो कॉरपोरेट अनुभवों के साथ पौराणिक प्रसंगों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करते हैं।

Follow us on social media and share!