आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

प्राचीन ध्वजों का एक अध्ययन

प्राचीन ध्वजों का एक अध्ययन

 


दक्षिण कोसल टुडे द्वारा सम्पादकीय प्रस्तावना

भारतीय संस्कृति में ध्वज केवल एक वस्त्रखंड नहीं, बल्कि शौर्य, विजय और राष्ट्रीय मर्यादा का जीवंत प्रतीक रहा है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में ध्वज का स्थान राजसिंहासन से भी ऊँचा माना गया है, जिसके रक्षण हेतु योद्धा अपने प्राणों की आहुति देना परम धर्म समझते थे। 'दक्षिण कोसल टुडे' के इस विशेष अंक में, हम ध्वज की इसी गौरवशाली ऐतिहासिक यात्रा को प्रस्तुत कर रहे हैं।

यह लेख वैदिक ऋचाओं से लेकर अजंता के भित्ति-चित्रों तक, साहित्य और कला के संगम से ध्वज के विविध रूपों, उनके तकनीकी अंगों (जैसे केतु, पताका, यष्टि) और उनके प्रतीकात्मक महत्व का सूक्ष्म विवेचन करता है। आइए, भारत की इस वैभवशाली 'केतु-परंपरा' और उसके कलात्मक विकास को गहराई से समझें।



प्राचीन ध्वजों का एक अध्ययन

हमारे यहाँ छत्र, चामर तथा सिंहासन के साथ ध्वज को भी राजचिह्नों के अंतर्गत गिनाया गया है। यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो इसका स्थान अन्य राज- चिह्नों से कहीं अधिक ऊँचा है। राजा के चामर या छत्र का रक्षण उतना महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता था जितना उसके ध्वज का। इसका पूरा ध्यान रखा जाता था कि ध्वज-रक्षण करने में प्राणों की आहुति भले ही देनी पड़े, पर ध्वज-भंग न होने पाए। इसी कारण ध्वज के रक्षण का कार्य बड़े ही जीवटवाले सैनिकों को सौंपा जाता था। ध्वज को इतना बड़ा स्थान केवल भारत में ही दिया गया हो यह बात नहीं, विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं में भी उसका वही स्थान था। इस लेख में ऐतिहासिक दृष्टि से ध्वजों के रूप, प्रकार तथा महत्त्व के विकास का अध्ययन प्रस्तुत करने की चेष्टा की जा रही है।

ध्वजों का उपयोग वैदिक काल से होता आ रहा है। ऋग्वेद में उसके उल्लेख कम पाए जाते हैं, पर जो मिलते हैं उनसे सष्ट हो जाता है कि ध्वजों का उपयोग युद्धों में किया जाता था।[1] रामायण-महाभारत काल में पहुँचते-पहुँचते ध्वजों के उल्लेख प्रचुरता से मिलने लगते हैं। स्वपक्षीय एवं परपक्षीय योद्धाओं को पहिचानने का एकमात्र साधन उनके रथ पर के ध्वज ही थे। सेनापति का सुंदर फहराता हुआ ध्वज ही सारी सेना का उत्साह-केंद्र होता था। प्रासाद पर प्रतिष्ठित करने के लिये, पूजन के लिये, राजा की सवारी को सुशोभित करने के लिये तथा राजचिह्न के रूप में ध्वज का उपयोग किया जाता था। इन प्रकारों की विस्तृत मीमांसा आगे की जायगी। परवर्ती काल के अन्य सभी ग्रंथों से ध्वज-विषयक ज्ञान की वृद्धि ही होती जाती है, पर उसका जितना सुंदर सुसंबद्ध विवेचन बृहत्संहिता (लभभग छठी शती) तथा युक्तिकल्पतरु (लगभग दसवीं-ग्यारहवीं शती) में मिलता है वैसा अन्य स्थलों पर कचित् ही प्राप्त होगा। साहित्य से प्राप्त ज्ञान की कसौटी कला है। कला की सहायता से साहित्य की कई गुत्थियों सुलझाई जा सकती हैं। भारतीय कला के विविध नमूनों से ध्वज के कई प्रकारों का पता लगता है और इस प्रकार हमारे ध्वज-विषयक झाम में वृद्धि होती है। अतएव प्रस्तुत विवेचन की आधार-भित्तियों दो हैं- भारतीय साहित्य और भारतीय कला।

ध्वज के अंग
साधारणतः केतु पताका, ध्वज इत्यादि शब्द समानार्थक माने जाते हैं और इसी रूप में बहुधा प्रयुक्त भी होते हैं। किंतु विशेष अध्ययन से स्पष्ट लक्षित होता है कि उनके अर्थों में भेद है। 'ध्वज' मंांडे के लिये सामान्य शब्द है। मुख्यतः लंबे और ऊँचे मंडे को ध्वज कहते थे। इसके कई प्रकार थे जिनका विवेचन आगे किया जायगा। मुंडे के डंडे को 'ध्वजदंड' या 'ध्वजयष्टि' कहते थे (बृह० ४३|१८) और उसमें फहरानेवाले वस्रखंड को 'पताका' । ध्वजदंड के उपर बहुधा कोई चिह्न रहता था जो ध्वजपति के पद एवं महत्ता का सूचक होता था। इसके सिवा ध्वज-शीर्ष को सजाने के लिये कई वस्तुएँ होती थीं, जो अपने-अपने विशेष नामों से पुकारी जाती थीं; जैसे चामर, किंकिणी, घंटा, मोरपंख या बर्हि पत्र इत्यादि । ध्वजशीर्ष से लटकनेवाले मोतियों के गुच्छे या रेशमी मध्ये को 'अवचूल' या 'चूलक' (अग्निपुराण, अध्याय १०३) कहते थे। ध्वज जिस बेदी पर खड़ा किया जाता था उसे 'यंत्र' कहते थे (पपाताभिमुखः शूरो यंत्रमुक्त इव ध्वजः- महाभारत ७|३३३२)। जिन रस्सियों के सहारे ध्वज खड़ा किया जाता था उन्हें 'रश्मि' या 'रज्जु' कहते थे ।

ध्वज के भेद
ध्वज के मुख्य भेद दो थे- सपताक और निष्पताक। कुछ ध्वज ऐसे होते थे जिनमें पताका या झण्डी लगी रहती थी, पर कुछ ऐसे भी होते थे जिनमें यष्टि के उपर केवल चिह्न होता था, पताका नहीं होती थी। एक तीसरा प्रकार भी होता था, जिसमें ध्वज-चिह्न की तो प्रमुखता होती थी पर शोभा के लिये कभी एक और कभी दो पताकाएँ भी लगी रहती थीं। कला में लगभग सभी प्रकार के ध्वजों के दर्शन होते हैं। भारहूत, साँची तथा मथुरा की कलाकृतियों में कितने ही सपताक ध्वज दिखलाई पड़ते हैं जिनका विस्तृत विवेचन आगे यथास्थान किया जायगा। निष्पताक ध्वज प्राचीन मुद्राओं पर दिखलाई पड़ते हैं। औदुम्बरों (लगभग १०० वर्ष ई० पू०) की ताम्र-मुद्राओं पर शिव-मन्दिर चित्रित है, ठीक उसके पार्श्व में त्रिशुल चिह्नांकित निष्पताक ध्वज दिखलाई पड़ता है। [2] आज भी बहुधा शिव-मंदिर के द्वार पर लोहे या ताँबे के बने हुए बड़े-बड़े त्रिशूल रखे मिलते हैं। इन्हें भी भगवान शिव के निष्पताक ध्वज कहना अनुचित न होगा। छोटी-छोटी पताकाओं वाले तीसरे प्रकार के निधताक ध्वज गुप्त राजाओं की मुद्राओं पर देखने को मिलते हैं। समुद्रगुप्त का गरुड़ध्वज इसी प्रकार का है। ध्वजदंड के ऊपर पंख फैलाए गरुड़ की मूत्ति बनी है और उसके नीचे छोटी-छोटी दो पताकाएँ या एक ही पताका के बँधे हुए दो छोर दिखलाई पड़ते हैं। [3] कुछ मुद्राओं पर यह पताका बिलकुल दिखाई नहीं पड़ती। [4] (द्रष्ट० चित्र सं० १ अ-ई)

पताकाओं के आठ प्रकार थे। 'जया' पताका पाँच हाथ लंबी और एक हाय चौड़ी होती थी। उसकी लंबाई में एक हाथ तथा चौड़ाई में रे हाथ बढ़ाते चलने पर क्रमशः विजया, भीमा, चपला, वैजयंतिका, दीर्घा, विशाला और लोला नामक पताकाएँ बनती थीं (युक्ति ४९६, ४९७)। इस क्रम से अंतिम लोला पताका ३३ हाथ चौड़ी और १२ हाथ लंत्री होती थी। प्राचीन कला में दिखलाई पड़नेवाली अनेक लंबी पताकाएँ लाल, पीली, नीली तथा चित्र-विचित्र रंगों की होती थीं। अंतिम प्रकार को पताका अजंता की गुफाओं में बने हुए चित्रों में (गुफा १७) स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ती है। साँची तथा भारहूत की कलाकृतियों में पताकाओं पर कई आकृतियाँ दिखलाई पड़ती हैं। साँची की पताकाओं पर तो ये आकृतियाँ सरल रेखा की सहायता से बनाई गई हैं पर भारहूत की पताकाओं पर कहीं-कहीं फूल भी बने हैं।

पताकाओं का आकार
अब तक के विवेचन से इतना तो निश्चित हो जाता है कि पताकाएँ पर्याप्त लंबी और कम चौड़ी होती थीं, पर प्रश्न यह उठता है कि इनका आकार त्रिकोणा- त्मक होता था या आ आयताकार। आज हमें दोनों प्रकार की पताकाएँ देखने को मिलती हैं, पर देखना यह है कि प्राचीन काल में स्थिति क्या थी। पताकाओं के आकार पर रघुवंश के एक श्लोक से बड़ा अच्छा प्रकाश पड़ता है। सातवें सर्ग में स्वयंवर के पक्षान् अज और अन्य राजाओं के बीच होनेवाले युद्ध का वर्णन करते हुए कवि बतलाता है कि, "वायु के कारण मदली के आकारवाली पताकाओं के मुँह खुले रह गए थे, उनमें जब धूल घुस रही थी तय वे ऐसी जान पड़ती थी मानो वर्षा का गेंदला पानी पीनेवाली मछलियाँ हों-

मत्स्यध्वजाः वायुवशाद्विदीर्णैः मुखैः प्रवृद्धध्वजिनी रजांसि।
बभुः पिबन्तः परमार्थमत्स्याः पर्याविलानीव नवोदकानि।। रघु०, ७।४०

इस श्लोक से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं-एक तो यह कि मत्स्यध्वज की पताका का कपड़ा दोहा सिला होता था और उसका एक छोर मछलियों की पूँछ के समान हुआ करता था, क्योंकि तभी तो पताका का मुँह खुल जाने पर उसमें भरी हुई हवा के कारण सारी पताका मछली के आकार की दिखलाई पड़ सकती है। दूसरे यह कि पताका वर्गाकार न होकर कुछ आयताकार सी होती थी, जिसकी लंबाई चौड़ाई से कहीं अधिक हुआ करती थी। अंतिम निष्कर्ष हमारे उपर्युक्त विवेचन से भी पुष्ट होता है कि पताका की लंबाई कम से कम पाँच हाथ और चौड़ाई ने हाथ होती थी। रही मछलियों के आकारवाली बात। इसका स्पष्टीकरण अजंता की गुफाओं में दिखलाई पड़नेवाली पताकाओं को देखने पर हो जाता है (गुफा १७)। इन पताकाओं के हवा में फहरानेवाले छोर ठीक मछलियों की पूँछ के समान बने हुए हैं। इस प्रकार इन पताकाओं की सहायता से कालिदास का कथन भली प्रकार समझा जा सकता है (चित्र संख्या २-३)।

यह तो हुई मत्स्यध्वज की बात। कला में शुद्ध आयताकार पताकाएँ भी दिखलाई पड़ती हैं (साँची०, फलक ११, १५, १७; भारहूत०, फलक १९, चित्र १४, १५; अमरावती०, फलक ५ चित्र ३३०) । परंतु ध्यान देने योग्य बात यह है कि लगभग ये सभी पताकाएँ बौद्ध धर्म से संबंधित हैं। आज भी सारनाथ, कुशीनगर आदि बौद्ध तीर्थों में उत्सवादि के अवसर पर अनेक प्रकार के मित्रों एवं मंत्रों से अंकित ठीक इसी प्रकार की पताकाएँ दिखलाई पड़ती हैं। अतएव यो आकारों को छोड़कर अन्य आकारों की पताकाओं का भी प्राचीन भारत में होना संभव है।

पताका और दंड
अब देखना चाहिए कि दंड पर पताका किस प्रकार चढ़ाई जाती थी। इसकी भी दो रीतियों थीं। एक तो आज के ही समान दंड में ही पताका बाँध दी जाती थी। गुप्तकालीन मुद्राओं पर तथा राजघाट (काशी) से प्राप्त मिट्टी की सुहरों पर इस प्रकार की दंड में बंधी हुई पताकाओं से युक्त ध्वज दिखलाई पड़ते हैं। अजंता के चित्रों में भी इस प्रकार के ध्वज देखे जा सकते हैं (चित्र संख्या ३)।

पताका बाँधने की दूसरी विधि यह थी की ध्वजदंड के ऊपरी सिरे पर एक छोटी लकड़ी आड़ी बँधी रहती थी, उसी में पताका का चीड़ाई वाला सिरा बाँध दिया जाता था (साँची०, फलक ११)। कहीं-कहीं अधिक मजबूत बनाने के लिये इस लकड़ी को दो अन्य लकड़ियों के सहारे कसा जाता था (साँची०, फलक १७)। इस प्रकार दंड के ऊपरी सिरे पर तीन डंडों का एक ऐसा त्रिकोसा बनता था जिसका आधार ऊपर और शीर्षकोण नीचे होता था (चित्र संख्या २ अ तथा १३)। पताका-बंधन का एक तीसरा प्रकार भी भारहूत की कलाकृतियों में दिखलाई पड़ता है (भारहूत, फलक ५२ चित्र ५४)। इसमें ध्वजदंड का ऊपरी सिरा गोलाई में मुड़ जाता था और इस प्रकार बने हुए अर्धवर्तुल में लकड़ी लगा दी जाती थी जिसके सहारे नीचे की ओर पताकाएँ लटकती रहती थीं। इस प्रकार एक ही ध्वजदंड से दो पताकाएँ लटकाई जा सकती थीं। अर्धवर्तुलाकार भाग को अर्धकमल या अर्थपुष्प की आकृति से सुशोभित किया जाता था (चित्र संख्या ४अ)। कभी-कभी एक ही ध्वजदंड में एक-के-नीचे-एक कई लकडियाँ बाँधकर एक साथ कई पताकाओं की योजना की जाती थी। अजंता (गुफा १७) के चित्रों में एक स्थल पर इस प्रकार की तीन पताकाएँ उड़ती हुई दिखलाई पड़ती हैं (चित्र संख्या २३)। कहीं-कहीं छत्रदंड के सहारे भी पताकाएँ उड़ती हुई दिखलाई पड़ती हैं। यहाँ पताका को सोधे दंड से ही बाँधा गया है। अजंता में बहुधा युद्धभूति के मस्तक पर पताका सहित छत्र दिखलाई पड़ते हैं। (चित्र संख्या २ई)।

 

सन्दर्भ :-

1. मैकडॉनल, वेदिक इण्डेक्स, खण्ड 1|पृ० 406, खण्ड 2|पृ० 416
2. एलेन, कॉइंज़ ऑफ़ एंशण्ट इण्डिया, 15|1-10
3. एलेन, कैटलॉग ऑफ़ कॉइंज ऑफ़ द गुप्त डायनेस्टी, फलक 1|3
4. जॉन मार्शल, मॉन्यूमेण्ट्स ऑफ़ साँची, फलक 16

लेखक - श्री नीलकण्ठ पुरुषोत्तम जोशी

Follow us on social media and share!