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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 अक्टूबर 2026

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जनजातीय गौरव दिवस: हमारे महापुरुषों और राष्ट्रीय-गौरव के स्मरण का दिन

जनजातीय गौरव दिवस: हमारे महापुरुषों और राष्ट्रीय-गौरव के स्मरण का दिन

किसी भी राष्ट्र के निर्माण में परमार्थजीवी महात्माओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यही कारण है कि विश्व का प्रत्येक राष्ट्र अपने महान् पूर्वजों के प्रति श्रद्धावनत् रहते हुए उनमें अपने भविष्य के लिए प्रेरणा खोजता है और उनसे जुड़े विशेष दिनों में अपने गौरवशाली अतीत का पुण्यस्मरण कर उसके अनुसरण का संकल्प करता है।

हमारे भारत देश का यह परम सौभाग्य है कि सभ्यता-संस्कृति के उषाकाल से लेकर आज तक अनेक महात्माओं ने हमारे राष्ट्रजीवन को आकार दिया है, उसे दिशा दिखाई है। उन महात्माओं की स्मृति आज भी प्रत्येक भारतीय मन में हल्की-गहरी रेखाओं के रूप में अंकित है, जिन्हें समय-समय पर आने वाली विभिन्न तिथियों पर हम प्रगाढ़ करते जाते हैं। तिथिपत्र में ऐसी ही एक तिथि है - भगवान बिरसा मुण्डा की जन्मतिथि अर्थात् 15 नवम्बर; जिसे पूरा देश प्रतिवर्ष जनजातीय गौरव दिवस के रूप में उल्लासपूर्व मनाता है।

Janjatiya Gaurav Divas: Odisha distributes tribal instruments - The  Samikhsya
जनजातीय गौरव दिवस के कार्यक्रम की झलक

यह दिन अंग्रेजों द्वारा मान-मर्दित किए गए हमारे भारतीय समाज के गौरव को पुन: स्थापित करने के संकल्प का दिन तो है ही, साथ-साथ भारतवर्ष को स्वाधीनता की ओर ले जाने में अपना योगदान देने वाले उन सभी हुतात्माओं के स्मरण का भी दिन है, जिनके बलिदान के कारण देश के कुछ भाग कभी परतन्त्र ही नहीं हुए। अन्य अनेक राष्ट्रीय दिवसों के बीच यह दिन इसलिए विशेष है, क्योंकि आज जब हम स्वाधीनता से स्वतन्त्रता की ओर अपने पग रख रहें हैं, तब हमें 'स्व' और उसके तन्त्र की महत्ता का भान यह दिवस कराता है।

जनजातीय गौरव दिवस की स्थापना
प्रतिवर्ष 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस मनाने की आधिकारिक घोषणा भारत सरकार ने वर्ष 2021 में की थी। यह निर्णय आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में लिया गया। पर यह तिथि केवल औपचारिक चयन नहीं है। जैसा कि हमने अभी देखा ही कि 15 नवंबर आधुनिक भारतीय इतिहास के कुछ सबसे प्रभावशाली नायकों में से एक भगवान बिरसा मुंडा की जन्मतिथि है, जिन्होंने अपने देश-धर्म व परम्पराओं की रक्षा के लिए न केवल ब्रिटिश आक्रान्ताओं के विरुद्ध, बल्कि सेवा की आड़ में मतान्तरण तथा भूमि हड़पने का भयावह षड्यन्त्र रच रहीं ईसाई मिशनरियों के विरुद्ध भी संघर्ष का सूत्रपात किया।
इसका प्रभाव इसी बात से समझा जा सकता है कि आज भी झारखण्ड में रहने वाली मुंडा जाति के लोग उन्हें धरती आबा के रूप में पूजते हैं। इसीलिए आज जब भारत की राष्ट्रीय अस्मिता पर चहुँओर से आक्रमण हो रहे हैं, तब उनसे संघर्ष कर हमारे देश व परम्पराओं की रक्षा हेतु अथक संघर्ष की प्रेरणा हमें जनजातीय गौरव दिवस देता है।

Press Release:Press Information Bureau
जनजातीय गौरव दिवस : नई दिल्ली 2024

जनजातीय गौरव दिवस की आवश्यकता
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समुदायों के योगदान को लंबे समय तक कमतर आँका गया। औपनिवेशिक इतिहासलेखन ने इन समुदायों को आदिम और असभ्य कहकर चित्रित किया, जबकि वास्तविकता यह थी कि यही समुदाय ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सबसे पहले और सबसे साहसी विरोधी थे। और उन्होंने केवल विरोध ही नहीं किया, बल्कि देश के कई हिस्सों को मुगलिया एवं अंग्रेजी हुकूमतों के दमन से भी सुरक्षित रखा। यद्यपि हम सब यह मानते हैं कि पूरा भारत पिछली कई शताब्दियों तक पराधीन औ परतन्त्र रहा, पर यह आधा सच है।

हमारे जनजातीय समुदायों में जन्में असंख्य वीर योद्धाओं ने अपने शौर्य से स्वयं को न केवल स्वाधीन बनाए रखा, बल्कि वे स्वतन्त्र भी रहे। अंग्रेजों तक ने भी इन क्षेत्रों को Excluded Regions या सरल शब्दों में कहें, तो अनछुए क्षेत्र कहा। अतः जनजातीय गौरव दिवस हमें ज्ञात इस अर्द्ध-सत्य को सुधारने के महनीय कर्त्तव्य का ध्यान कराने के साथ-साथ हमारे जनजातीय वीरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर देता है। यह दिन राष्ट्र के स्मृतिपट पर इन हुतात्माओं को आदरपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित कराने का हम भारतीयों का एक प्रयत्न है।


स्वराज्य के लिए बिरसा मुंडा का संघर्ष

जहाँ तक बात है कि स्वतन्त्रता संग्राम की इथनी स्मारक-तिथियों के होने के बाद एक अन्य तिथि को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की आवश्यकता क्यों अनुभव की गई? तो इशके कई उत्र हो सकते हैं। सबसे पहले, यह दिन उस ऐतिहासिक सत्य की पुनर्स्थापना का माध्यम है कि भारतीय अतीत में जनजातीय समुदाय सदा से समाज के अभिन्न अंग के रूप में रहते आए हैं। और-तो-और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कथा भी जनजातीय समुदायों के योगदान के उल्लेख के बिना पूर्ण नहीं हो सकती। गोंड, संथाल, मुंडा, भील, कोल, खासी, मिजो और अनेक अन्य जनजातीय समुदायों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध महत्वपूर्ण आंदोलन चलाए, जिन्हें प्रायः मार्क्सवादी दृष्टि से लिखी गई इतिहास की पुस्तकों में समुचित स्थान नहीं दिया गया।

ब्रिटिश-मिशनरियों का दुष्प्रभाव
ब्रिटिश शासन से पहले भारत के जनजातीय समाज अपने पारंपरिक, स्वायत्त और आत्मनिर्भर समुदायों में जीवन यापन करते थे। उनकी अपनी भूमि-व्यवस्था, सामाजिक संरचना, धार्मिक मान्यताएँ और प्रकृति के साथ गहरे संबंध पर आधारित ज्ञान व्यवस्था थी। अंग्रेजों के आगमन के बाद विशेष रूप से स्थायी बंदोबस्त अधिनियम 1793 के परिणामस्वरूप जनजातीय लोगों की पारंपरिक भूमि प्रणाली को नष्ट कर दिया गया।
  इस प्रक्रिया में जनजातीय भूमि अंग्रेजों के हाथों में चली गई।

औपनिवेशिक प्रशासकों, मिशनरियों और एन्थ्रोप्लोजिस्ट से जुड़े विद्वानों ने जनजातीय समाज को आदिम, असभ्य और विकास में बाधक जैसी संज्ञाओं से संबोधित किया। इस पूरे विमर्श का उद्देश्य जनजातीय समाज के शोषण, भूमि अपहरण और सांस्कृतिक विनाश को न्यायसंगत ठहराना था। वास्तव में, यह विवरण औपनिवेशिक हिंसा और लूट को छिपाने के लिए गढ़े गए कथानक थे। धीरे-धीरे यह नकारात्मक छवि जनजातीय समाज के भीतर भी रिसने लगी और उन्होंने स्वयं को कमतर मानना शुरू किया। इसे वैचारिक औपनिवेशिकरण कहा जा सकता है, जिसमें किसी समुदाय को अपने बारे में भी उपनिवेशवादी नजरिए से सोचने की आदत पड़ जाती है। इससे उनके आत्मविश्वास को गहरी ठेस पहुँची।

जनजातीय गौरव दिवस इसी औपनिवेशिक मानसिकता की साँखलों को तोड़ने का एक संगठित प्रयास है। यह दिन जनजातीय समुदायों समेत समस्त भारतवासियों को यह स्मरण कराता है कि अपनी परंपराएँ न तो आदिम हैं और न असभ्य। वे समृद्ध, जटिल, दार्शनिक और पर्यावरण-संवेदनशील परंपराएँ हैं, जिनमें सदियों का अनुभव, ज्ञान और मानवीय संवेदनाएँ संचित हैं। इसके साथ ही यह दिवस हमें यह भी सोचने के लिए प्रेरित करता है कि यूरोपीय औपनिवेशिक विचारधारा के अवशेषों से मुक्त हुए बिना वास्तविक स्वतंत्रता पूर्ण नहीं मानी जा सकती।

जनजातीय गौरव दिवस : एक राष्ट्रीय पर्व
जनजातीय गौरव दिवस बिरसा मुंडा की जयंती पर आधारित अवश्य है, पर इसका दायरा केवल उन्हीं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भारत के विविध भागों में हुए जनजातीय विद्रोह और नायकों के संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ा जाना आवश्यक है।


छग . रायपुर में गौरव दिवस के कार्यक्रम

झारखंड और बिहार के तिलका मांझी, सिद्धू, कन्हू और बिरसा मुंडा हों, आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू हों, मणिपुर की रानी गाइडिनलियु हों, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के भीमा नायक, शंकर शाह, रघुनाथ शाह, टंट्या भील, सीताराम कंवर हों, राजस्थान और अन्य क्षेत्रों के भील-भिलाला नायक हों, ओडिशा के कोया क्षेत्र के संघर्ष हों या छत्तीसगढ़ के बस्तर विद्रोह और वहाँ के वीर, सभी प्रदेशों के इन महापुरुषों को जनजातीय गौरव दिवस के व्यापक संदर्भ में जोड़ना समय की आवश्यकता है। यह दिवस एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में विकसित होना चाहिए, जिसमें हर प्रदेश अपने स्थानीय नायकों को गर्व के साथ स्मरण करे।

 
स्वतंत्रता सेनानी हमारे जनजातीय नायक

जनजातीय गौरव दिवस इस दृष्टिकोण को भी चुनौती देता है और यह याद दिलाता है कि जनजातीय समुदाय न तो इतिहास के हाशिये पर हैं और न विकास के विरोधी, बल्कि वे इस देश की आत्मा के महत्त्वपूर्ण वाहक हैं। औपनिवेशिक शासन और बाद की नीतियों ने उनमें हीनता और संकोच का भाव पैदा किया है। इस स्थिति से आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है कि वे अपने इतिहास, अपने नायकों और अपनी सांस्कृतिक परंपरा को सम्मान की दृष्टि से देखें, उस पर गर्व करें और आने वाली पीढ़ियों में भी वही गौरव-बोध जागृत करें।

जनजातीय गौरव दिवस मनाने का स्वरूप
इस दिवस को सार्थक रूप से मनाने के लिए केवल औपचारिक कार्यक्रम पर्याप्त नहीं होंगे। आवश्यकता है कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में जनजातीय नायकों पर आधारित विशेष पाठ, व्याख्यान, प्रदर्शनी और वृत्तचित्र दिखाए जाएँ। सांस्कृतिक मंचों पर जनजातीय संगीत, नृत्य, कला और लोकसाहित्य को सम्मानजनक स्थान दिया जाए। जनजातीय नायकों के स्मारक, संग्रहालय और स्मृति-स्थल विकसित किए जाएँ, ताकि नई पीढ़ी उन्हें प्रत्यक्ष देख और समझ सके।

शहीद वीर नारायण सिंह संग्रहालय नया रायपुर ।। Shahid veer narayan singh  museum Naya Raipur - YouTube
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को समर्पित संग्राहलय: रायपुर

इसके साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, कौशल-विकास और उद्यमिता से जुड़े कार्यक्रमों को इस दिन के संदर्भ में विशेष रूप से रेखांकित किया जा सकता है। जनजातीय समाज की राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व को भी प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है, ताकि वे नीतिनिर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा सकें।

विकसित भारत में जनजातीय समाज की भूमिका
भारत सरकार ने विकसित भारत 2047 की जो परिकल्पना रखी है, उसका उद्देश्य है कि स्वतंत्रता के 100 वर्ष तक भारत पूर्ण विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में पहुँचे। यह लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब विकास की यात्रा में प्रत्येक समाज, विशेषकर जनजातीय समाज, समान भागीदार और सहकर्मी के रूप में उपस्थित हो। इसलिए विकसित भारत की परिकल्पना में उनका योगदान केवल सहायक नहीं, बल्कि अनिवार्य रूप से होना है।

यह दिवस यूरोपीय औपनिवेशिक दृष्टिकोण से मुक्त होकर अपने इतिहास को स्वयं की दृष्टि से देखने का प्रयास है। जब तक भारत अपने जनजातीय समाज के योगदान, ज्ञान और नेतृत्व को पूरी गंभीरता से स्वीकार नहीं करेगा, तब तक वास्तविक आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की स्थापना अधूरी रहेगी। विकसित भारत 2047 का स्वप्न तभी पूर्ण हो सकेगा, जब हर प्रदेश और हर समुदाय, विशेषकर जनजातीय समाज, स्वयं को इस यात्रा का गौरवपूर्ण सहभागी महसूस करे। जनजातीय गौरव दिवस उसी महान परिवर्तन की दिशा में उठाया गया एक महत्त्वपूर्ण कदम और जीवंत प्रतीक है।

लेखक
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर,
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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