जनजातीय कथाओं की लोक दृष्टि
October 19, 2022
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी | शुक्रवार
नक्षत्र: मघा | योग: व्यतिपात | करण: वणिज
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ी गीत संग्रह ‘‘रात पहाही अंजोरी आही’’ कवि डाॅ. पीसीलाल यादव छत्तीसगढ़ी के अत्यंत प्रतिभाशाली कवि हैं। प्रतिभाशाली कवि कहना ही काफी नहीं ‘अत्यंत’ भी लगाना पड़ता है। मैं तो छत्तीसगढ़ी के पूरे ही परिवेश से परिचित हूं, डाॅ. पीसीलाल यादव जी से मेरा परिचय डेढ़ दशक से है-कह सकता हूं कि छत्तीसगढ़ में इतना प्रतिभाशाली कवि मुझे कोई दूसरा नहीं मिला।
डाॅ. पीसीलाल यादव अपनी बातों को सहज सरल शब्दों में कहने का साहस किया है। यह भी कि वे स्वप्नजीवी नहीं, व्यवहारिक धरातल पर जीने वाले कवि हैं। वे छत्तीसगढ़ी लिखने में तनिक भी गुरेज नहीं करते। वे अपने लेखन और प्रकाशन के मध्य एक संतुलन बनाकर चलने वाले कवि हैं। वे समाज को कुछ ऐसा देना चाहते हैं , जिससे समाज का स्तर ऊंचा हों। देश और समाज की हर स्थितियों से पूरी तरह वाकिफ डाॅ. पीसीलाल यादव अपने साहित्य के लिए करते हैं।
‘‘रात पहाही अंजोरी आही’’ संग्रह की कविताएं वैविध्यपूर्ण हैं। प्रकृति और देशप्रेम से परिपूर्ण कविता संग्रह के अभिन्न अंग है। अपनी सिराओं में ‘‘भुंइया भवानी’’ की तरह कविता की चेतना में दुर्गा महारानी, महादानी, लहु पसीना, जग कल्यानी, करम के गंगा, अमरित बानी, सब कुछ है। कवि डाॅ. पीसीलाल यादव ने संरक्षण की आवश्यकता प्रदर्शित करते हुए अपने गीतों के माध्यम से मानव समाज के लिए आह्वान करते हैं।
तहीं माता भाग विधाता
अउ ये जिनगी के दाता
तैं महतारी हम तोर बेटा
मया-पीरा के हे नाता
अन्याय संग जूझे बर
दाई हमला तैं दे शक्ति
निसदिन तोर करन पूजा
दे अपन चरन के भक्ति
प्रारंभिक गीतों में छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना, अपनों के प्रति निश्छल प्रेम, मानवीय संवेदना का शनैः शनैः विस्तार होता गया और तमाम मानव राशि के मंगल का गायन उनका लक्ष्य होता गया। उदात्त मानवीय चेतना से अनुप्रमाणित उनकी कविता छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत में प्रतिष्ठा प्राप्त की और फिल्मों में भी बहुचर्चित और बहुप्रशंसित होती गई।
तैं रें गे जा रे रद्दा के रेंगइया
रात पहाही अंजोरी आही, आही रे भईया।
मन के हारे हार हे
अउ मन के जीते जीत
आघू मढ़ा पांव अपन
गावत जिनगी के गीत
बाट सिराही बिरो आही, आही रे भईया
तैं रें गे जा रे रद्दा के रेंगईया।
रद्दा बनावत चल रे संगी
विधन बाधा ला नाहकत
कांटा, खूंटी, जंगल पहार
अगम दाहरा ला डाहकत
सुम्मत लाही मन मुस्काही-मुस्काही रे भईया
तैं रें गे जा रे रद्दा के रेंगईया।
डाॅ. पीसीलाल यादव की काव्य-यात्रा बहुत लंबी है। पिछले पचास सालों के पहले से शुरू हुई उनकी काव्य-यात्रा अब भी जारी है। पिछले पांच दशक की छत्तीसगढ़ी कविता के वे सहयात्री कवि हैं। इन पांच दशक में इनकी कविता ने संवेदना के जिन-जिन नूतन आयामों को छुआ, वह पाठकों को विस्मय -विमुग्ध करने वाला है। बचपन से ही उन्होंने काव्य लेखन प्रारंभ की थी। किशोरावस्था में ही प्रौढ़ता को प्राप्त उनके लिखे गीत जवानी में और अधिक प्रौढ़ एवं गंभीर हो गई। कवि की प्रतिभा शिखरों को संस्पर्श करती है।
तोर मया मा मरथौं, तोर मया बर जियथौं
आजा रे आजा संगी, चंदा के अंजोर म।
नदिया के लहरा मारे भवना
खोपा मा गोंदा काने में दवना
कोइली रे कुहके आमा के डार मा
मरत हंव मैं मया के बोखार मा
रेसमाही लुगरा रेसमाही फ़ुंदरी
मोर मया चिन्हारी चांदी के मुंदरी।
ओंट रचाए रे बंगला के पान
तहीं मोर सपना, तहीं मोर परान।
डाॅ. पीसीलाल यादव अपने गीतों में संघर्षशीलजन, मेहनती किसान, अपनी धरती और परिवेश को ऊर्जात्मक पहचान दी है। गीत उनका वजूद है दरअसल आज हमें, खासतौर से नये लिखने-पढ़ने वालों को, यह जानने-समझने की बड़ी जरूरत है कि अपनी धरती में जब हम अपने ही बीज बोयेंगे तो फसल पुख्ता और दमदार होगी। कवि पूरे परिवेश को, किसान की सूक्ष्म भावनाओं को बचाये रखने में सफल हुए हैं।
नवा जुग हे नवा जमाना
साज ले तैं अपन बाना।
नवा तरीका खेती-पाती
करके अन-धन उपजाना
हाही-माही, जग अघाही, करही तोर गुनगान।
सशक्त परिकल्पना के साथ डाॅ. पीसीलाल यादव के गीत ‘‘फुटहा करम के फुटहा दोना’’ के विस्तार को समेटती है, जहां दो महत्वपूर्ण पात्रों में एक पात्र दुहरी जिंदगी जीता है और अनेकानेक सवालों का तहकीकात करता है। उन गीतों में अनुभूति का, महसूस करने का महत्व है। लोक जीवन में ‘‘फुटहा करम के फुटहा दोना’’ को स्वाभाविकता का पर्याय के रूप में अभिव्यक्त करती है।
महतारी के कोख म आए
तहां मुक्ति बर गोहराये
बाहिर आके ये जग म
हरि नाम ल बिसराये
जिनगी होगे खेल-खिलौना।
बैरी तैं तो राम सुमर ले
सहारा लाठी कस धर ले
अपन दुख पीरा ला तैं
संऊहे अपन हाथ हर ले
तोर जनम झन होवे पुराना ।
व्यवहारिक जीवन में देखा जाए तो बहुत सारे कवि जो निज की बात करते हैं। डाॅ. पीसीलाल यादव के पास पूरा एक समाज है। गीत अनुभव की परिधि में है। साहित्य की विकसित संवेदनशीलता का विषय है। जीवन यथार्थ की विविधता, वास्तविक मनुष्य की पीड़ा, उनकी खुशी, उलझन, साहसिकता और जीवनेच्छा से स्वयं को काटती चली गई।
अब जिनगी राह के जाय
नई छोड़व मैं तोला
दुनिया कांही कहे
नई हे संसो मोला
मोर मया के तैहां कजरउटी
मोर पिरोहिल …………….
छत्तीसगढ़ी कविता के विकास में डाॅ. पीसीलाल यादव की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। तमाम अभाव, संघर्षों और आर्थिक कठिनाइयों के डाॅ. पीसीलाल धैर्यपूर्वक काव्य सृजन में सृजनरत हैं। यथार्थ के धरातल पर वह बहुत सहज रूप से अपने आपको दृढ़ता से जमाए हुए हैं।
चंदा देख चकोर हरसे
अउ पानी देख मछरी
तइसे मेंहा हरस घूमेंव
भांवर धर तोर अंगुरी
ममहाहूँ तोर जिनगी म
बन के मैं हर दवना।।
डाॅ. पीसीलाल यादव जब श्रृंगार गीत लिखते हैं तो श्रोता समाज को केन्द्र में रखकर लिखते हैं। पीसीलाल यादव का शुभचिंतक वह व्यक्ति है जो गांव व शहर के कहीं बीच खड़ा है, जंगल-पहाड़ में सीना चैड़ा कर अड़ा है, जो गांव की समस्याओं से वाकिफ है, उसके बारे में सोचता भी है। जो नायिका कजरेली के बारे में सोचता है, याने अपने समय की श्रृंगार को समझने की, परखने की, कैनवास में उतारने की क्षमता रखते हैं।
अइसने तैं सुघ्घर हस
काबर गोई सिंगार करे ?
रंग-रूप सागर संऊहे
काबर गोई उधार करे ?
मार डारिस तोर नखरा नखरेली
डाॅ. पीसीलाल यादव अपने समय के सरोकारों से कभी अलग नहीं हुए बल्कि उनके गीतों में अपेक्षित पाठक वर्ग की छाया मौजूद रहती है।
आलेख
डुमनलाल ध्रुव मुजगहन, धमतरी (छ.ग.) पिन - 493773 मो. 9424210208
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