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विलुप्त होती भारत की कलीगर जाति एवं व्यवसाय

वैदिक काल में समाज का मार्गदर्शन करते हुए ॠषियों ने पुरुषार्थ चतुष्टय एवं चतुर्वर्ण की व्यवस्था दी। जिससे मानव को जीवन निर्वहन के लिए दिशा मिल सके। इसके पश्चात आगामी काल में कर्म के आधार पर जातियों का निर्माण प्रारंभ हुआ। नवीन अविष्कार होते और नवीन जातियों का निर्माण होता जाता।

इन अविष्कारों का उद्देश्य मानव जीवन की कठिनाईयों को दूर करते हुए उसे सरलीकृत करना होता है। अग्नि के अविष्कार से लेकर मृदा भाण्ड एवं धातुओं के अविष्कार फ़लस्वरुप धातु बर्तनों का निर्माण हुआ तथा इन्हें बनाने वाले एक जाति विशिष्ट में विभक्त हो गए और समाज में यही पहचान बन गई।

समाज में कार्य की आवश्यकता के अनुसार जातियाँ बनती बिगड़ती रही। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमें आज भी दिखाई देता है। ऐसी ही एक जाति कलीगर या कलई चढाने वाली है। जिनकी सेवा आम किसान मजदूर से लेकर राजे-महाराजे तक लेते थे, वर्तमान में दिखाई नहीं देती। इस जाति के लोगों ने रोजगार खत्म होने के पश्चात और कोई दूसरा काम अपना लिया। वर्तमान पीढी को तो ज्ञात भी नहीं कि ऐसी कोई जाति भी होती थी।

बरतन कलई करवा लो sss, बर्तनों की मोच निकलवा लो sss, पंजाबी का एक गीत भी सुना था, भाण्डे कली करा लोssss, परांता दे थल्ले लवा लोssss. ये आवाजें आनी बंद हो गयी गली मुहल्ले में। इन आवाजों को मैं बरसों से ढूँढ रहा हूँ, पर न जाने दुनिया की भीड़ में कहां गायब हो गयी।

आते आते आवाज का अचानक बंद हो जाना शुभ संकेत नहीं, कहीं तो कुछ ऐसा अप्रिय घटा जो कि एक जाति समुदाय की आवाज बंद हो गयी और उसके लिए रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया। जीजिविषा के लिए उसे रोजगार बदलना पड़ गया और उसकी सदियों की पहचान खत्म हो गयी।

कलई वाला या कलीगर गांव में फेरा लगाकर लोगों को सूचना दे देता और चौपाल के पास बरगद पीपल के नीचे अपनी भट्टी लगाकर बैठ जाता। थोड़ी देर बाद उसके पास बर्तनों का ढेर लग जाता और कई दिनों तक सारे गांव के पीतल-तांबे के बर्तनों पर कलई चढ़ाता।

मानकर चलिए कि वह कलई चढ़ाने की चलती फिरौती फैक्टरी था। मशीन के नाम पर एक हाथ से चलाने वाली चमड़े धोंकनी, संसी, रांगा की पट्टी, सुहागा और पुरानी रुई। कोयला वह गांव से ले लेता तथा भट्टी हाथ से खोदकर बना लेता।

कलई किए हुए इन बर्तनों में बैक्टिरिया नहीं पनपते थे तथा माना जाता था कि कलई किए हुए बर्तनों में भोजन करना स्वर्ण बर्तनों में भोजन करने के बराबर है तथा यह भी माना जाता था कि इससे पौरुष शक्ति में वृद्धि होती है।

कलई करने के साथ बर्तनों के रिसते हुए जोड़ और उनकी मोच निकालने का काम भी साथ में हो जाता था। भट्टी पर बर्तन गर्म कर उसमें रांगा की दो चार बूंद चुवाता और संसी से गर्म बर्तन को पकड़कर सुहागा छिड़ककर पुरानी रुई से रांगे को बर्तन के भीतर चुपड़ देता। पांच मिनट में बर्तन भीतर से ऐसा चमक जाता जैसे किसी ने चांदी का मुलम्मा चढ़ा दिया हो।

इस तरह सारे बर्तन चुल्हे पर उपयोग एवं खट्टा खाने के लायक हो जाते, उनकी टूट फूट सुधर जाती और कलीगर को मेहनत के बदले अनाज या नगदी राशि मिल जाती, जिससे उसका भी घर परिवार चल जाता। समाज एवं कलीगर दोनों का काम सध जाता।

जब से स्टील के बर्तनों का आगमन हुआ तब से लोगों की रसोई से पीतल, तांबा एवं कांसे के बर्तन बाहर हो गये। इन बर्तनों के रख रखाव में मेहनत थी। उपयोग में लाने के बाद राख से मांजकर चमकाना पड़ता था। गृहणियों को नाखून काटने की जरुरत नहीं पड़ती थी, वे बर्तन मांजने से ही घिसकर छोटे हो जाते थे।

स्टील के बर्तन आने के बाद मांजने धोने की एवं टूट फूट की समस्या लगभग खत्म हो गयी। निरमा पावडर लगाकर एक हाथ फेरते ही बर्तन चमकाने लगते हैं तो फिर कौन सहुलियत छोड़ कर झंझट मोल ले।

इसी सहुलियत ने स्टील के दो कौड़ी का बर्तनों को रसोई में प्रतिष्ठित कर दिया एवं तांबे पीतल जैसी कीमती धातु के बर्तनों को बाहर। भले ही स्टील के टुटे फूटे बर्तनों का बाजार में धेला न मिले पर रसोई घर में ऐसे घुसने कि निकलने का नाम ही नहीं लिया।

इन्ही स्टील के बरतनों की आमद ने कलीगरों का रोजगार ही खत्म कर दिया और एक तकनीकि कुशल जाति के सामने रोजगार का संकट खड़ा कर दिया। नहीं तो प्राचीनकाल में इनका बड़ा मान सम्मान था। अब गुजरे जमाने के किस्से कहानी हो गये।

समाज में इसी तरह नवीन जातियाँ जन्म लेती हैं और खत्म होती है। कुछ स्थाई काम होने के कारण जातियां स्थाई हो गई, अगर उनका काम मशीनों ने ले लिया तो उन्होंने कोई और दूसरा रोजगार ढूंढ लिया।

अब कलीगर नहीं दिखते। सिर्फ हमारे जैसे की यादों में ही कायम हैं, अगर वह आकर एक बार फिर आवाज लगाए तो कहीं से ढूँढ कर दो चार बर्तन उसके सामने अवश्य दूं। इस जाति का व्यवसाय बदलना अर्थात खत्म होना ही है।

आलेख

ललित शर्मा
इण्डोलॉजिस्ट, रायपुर छग

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3 comments

  1. बहुत ही सटीक लेख कलीगरों के जीवन पर
    दिल को छूटा हुआ सजीव इतना कि कान में वो आवाजे सुनाई देने लगी

  2. अब परंपरागत कार्यों में बहुत कम जातियाँ रह गयी हैं। अपने गाँव में होश सँभालते ही मैंने देखा था कि अपना अनाज बचाने के लिए लोगों ने धोबी से कपडे धुलवाने बंद कर अपने घर में काम कर रही महिलाओं से ही काम करवाने लगे थे। धोबी परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया था। लगभग पुरे समाज को मेरे पिताजी ने रिक्शा खरीदवाने की व्यवस्था की थी। अभी तक वे रिक्शा चलाते हैं। मशीन आने के बाद गरीब तेली परिवार के सामने भी रोजी-रोटी के लिए मुसीबत खड़ी हो गयी थी। उन्होंने किसानो से धन खरीदकर उसने चावल बनाकर बाजार में बेचना शुरू किया था। ५० साल पहले तक का समाज एक ही ढर्रे में चल रहा था, अचानक समाज में कई रोजगार ख़त्म हो गए हैं। उनकी जगह नए नए रोजगार आ गए हैं, नहीं पढ़े-लिखे लोग उन रोजगारों में तकनिकी रूप से जितनी जल्दी सक्षम हो जाएँ , उतना अच्छा होता है। सुविधभोगी पीढ़ी अभी और क्या क्या न करे ? पीतल और काँसे के बर्तनों का रसोई से हटकर स्टील के बर्तनो का आना स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है है, आपकी चिंता सही है।

  3. संध्या शर्मा

    विलुप्त होती कला और जाति पर बहुत अच्छा आलेख . नई पीढ़ी तो जानती भी नहीं होगी जो हमने देखा है पीतल के बर्तनों पर चाँदी सी चमकदार कलई चढ़ते हुये . और हाँ वो कलई करने की भट्टी को हवा देने के लिए बनाई गई अनोखी धौंकनी भी कितनी लुभाती थी . शानदार पोस्ट हेतु आभार

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