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वनवासी युवाओं को संगठित कर सशस्त्र संघर्ष करने वाले तेलंगा खड़िया का बलिदान

23 अप्रैल 1880 : सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी तेलंगा खड़िया का बलिदान

भारत पर आक्रमण चाहे सल्तनतकाल काल का रहा हो अथवा अंग्रेजीकाल का। वन्य अंचलों ने कभी दासत्व को स्वीकार नहीं किया और स्वाधीनता केलिए सदैव संघर्ष किया और बलिदान हुये। ऐसे ही संघर्ष के नायक हैं तेलंगा खड़िया जिन्होंने वनवासी युवाओं की टोली बनाकर सशस्त्र क्रान्ति आरंभ की और बलिदान हुये।

अंग्रेजी सत्ता ने मुक्ति के प्रत्येक संघर्ष को विद्रोह का नाम दिया। इस संघर्ष को भी विद्रोह नाम देकर बल पूर्वक दमन किया गया। इतिहास के पन्नों में इस संघर्ष को “खड़िया विद्रोह” नाम दिया गया। यह उल्लेख तो है कि सेना ने वनक्षेत्र में घुसकर विद्रोह का दमन किया पर कितने क्राँतिकारी बलिदान हुए इसका विवरण नहीं मिलता।

इस संघर्ष की नींव अंग्रेजों के उस दमनकारी आदेश से पड़ गई थी जिसमें समूची वन संपदा पर अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया था और इसके दोहन के लिये अपने एजेंट नियुक्त कर दिये थे। इससे वनवासी एक प्रकार से बेघर हो गये थे उनके सामने अपने जीवन यापन की समस्या आ गई थी। अंग्रेजों के ऐजेन्ट वनवासी समूहों से वन संपदा एकत्र कराते और शोषण करते थे। इस असहाय स्थिति का वनक्षेत्रों में विरोध तो हुआ पर सामूहिक स्वर न बन सका। इसे सामूहिक स्वर दिया था क्राँतिकारी तेलंगा खड़िया ने।

ऐसे क्राँतिकारी तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 को बिहार प्राँत के गुमला जिला अंतर्गत ग्राम मुरगू में हुआ था। तब यह क्षेत्र छोटा नागपुर रियासत के अंतर्गत आता था। पिता हुईया खड़िया एक साधारण किसान थे। बाद में वे रियासत की ओर से अपने गाँव मुरमू में भंडारी नियुक्त हो गये। उनका काम वन संपदा का संग्रह करना था।

माता पेतो खड़िया अपनी सामाजिक परंपराओं के लिये समर्पित गृहणी थीं। कृषि और रियासत के भंडारी होने के कारण पिता और परिवार की प्रतिष्ठा पूरे वनक्षेत्र में थी। तेलंगा बचपन से ही वीर साहसी और थे। शरीर भी वलिष्ट था। उन्हें पारंपरिक शस्त्र तीर कमान, तलवार, लाठी, गदका आदि के संचालन के साथ कुश्ती लड़ने का भी शौक था।

इससे उनके साथ युवाओं की एक अच्छी टोली बन गई थी। उन्होंने युवाओं में पारंपरिक खेल और शरीर सौष्ठव अभ्यास के लिये अखाड़ा भी चालू किया। समय के साथ बड़े हुये और रतनी खड़िया से विवाह हो गया और खेती करने लगे।

लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनकी वन संपत्ति ही नहीं वनवासियों के परिश्रम से उत्पन्न कृषि पर भी अंग्रेजों का अधिकार होता था। तब क्राँतिकारी तेलंगा खड़िया ने अंग्रेजों के आदेश को नकार दिया और कहा- जमीन हमारी, जंगल हमारे, मेहनत हमारी, फसलें हमारी, तो फिर अंग्रेज कौन ?

युवाओं की पूरी टोली ने उनका साथ दिया। इस टोली ने लगान एवं मालगुजारी न देने का अभियान चलाया। तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में काम करने वाली युवा टोली पेड़ों पर छिपकर बैठती और अंग्रेजों की ओर वसूली के लिये आने वाले अधिकारियों पर हमला करके भगा देते।

उनकी टोली में आसपास के गाँव और वनक्षेत्र के अनेक युवा तेलंगा से जुड़ गये और उन्होंने “पंचैत संगठन” तैयार कर लिया। इस संगठन की शाखाएँ हर गाँव में खड़ी की गईं जिसमें गाँव के प्रत्येक युवा को सशस्त्र करके गुरिल्ला युद्ध के लिये तैयार किया जाता था। यद्यपि तेलंगा और उनकी टोली स्थानीय नागरिकों से कोई लगान या वसूली नहीं करते थे। पर इस टोली की शक्ति और सक्रियता से अंग्रेजों की वसूली रूक गई थी और अंग्रेजों द्वारा नियुक्त वसूली एजेंट इलाका छोड़कर भाग गये थे।

निसंदेह यह संघर्ष एक सीमित क्षेत्र में था पर यह एक प्रकार से समानांतर सत्ता जैसी स्थापना थी। सभी ग्रामीण क्षेत्र से समर्थन मिला। अंग्रेजों ने इस टोली के प्रमुख लोगों और तेलंगा को पकड़ने केलिये सैन्य टुकड़ी तैनात की पर सफलता नहीं मिली। क्राँतिकारियों ने महिलाओं की भी टोली तैयार की गई थी। महिलाओं की यह टोली सैन्य टुकड़ी के मूवमेंट की खबर देती और रात को टोली के सदस्य तीर कमान से हमला कर देते।

क्राँतिकारियों की यह रणनीति इतनी सटीक थी कि बंदूक धारी अंग्रेज सिपाही भी क्राँतिकारियों का कोई विशेष नुकसान न कर सके। अंततः अंग्रेजों ने इनाम का लालच दिया और विश्वासघाती तलाश किये। अंग्रेजों की यह चाल काम कर गई और जब क्राँतिकारी तेलंगा कुम्हारी गांव में बैठक कर रहे तब यकायक घेराबंदी हुई और तेलंगा बंदी बना लिये गये। चौदह साल की सजा हुई।

चौदह वर्ष जेल में रहकर उनके विचार और दृढ़ हुये। चौदह वर्ष बाद जेल से रिहा हुये। लौटकर अपने पुराने सहयोगियों को तलाशा और पुनः संघर्ष आरंभ कर दिया । इन चौदह वर्षों में अंग्रेज बसूली कर्ताओं और अंग्रेज परस्त जमींदारों ने शोषण की सभी हदें पार कर दीं थीं।

इसलिये जब जेल से लौटकर तेलंगा ने दोबारा संघर्ष का रास्ता अपनाया तो इस बार उनके साथ केवल युवा ही नहीं आये जन सामान्य से बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सब साथ आये। इस बार भी अंग्रेज सरकार ने विश्वासघातियों को आगे किया। तेलंगा खड़िया का पीछा शुरु किया।

वह 23 अप्रैल 1880 का दिन था। तेलंगा अपने विश्वस्त सहयोगियों के साथ दूसरे गाँव जा रहे थे। रास्ते में झाड़ियों में छिपकर अंग्रेज टुकड़ी ने मोर्चाबंदी कर रखी थी। ऐसे ही यह टोली समीप आई गोलियाँ चलने लगीं। तेलंगा खड़िया सहित पूरी टोली का बलिदान हो गया। बाद में सैन्य टुकड़ी गांवो में घुसी। सर्चिंग हुई। जिन पर संदेह हुआ उन्हे मार डाला गया।

इस दमन में कितने क्राँतिकारियों का बलिदान हुआ इसका विवरण कहीं मिलता। जिस सिपाही बेधन सिंह की गोली से क्राँतिकारी तेलंगा खड़िया का बलिदान हुआ उसे पदोन्नति मिली। इतिहास की पुस्तकों में इस संघर्ष सबसे कम है पर लोकगीतों में क्राँतिकारी तेलंगा खड़िया आज भी सजीव हैं।

आलेख

श्री रमेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल, मध्य प्रदेश

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