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स्वाभिमान और आर्य संस्कृति की रक्षा के लिये महाशय राजपाल का बलिदान

6 अप्रैल 1929 : महाशय राजपाल का बलिदान

दासता के दिनों में भारतीय अस्मिता पर चौतरफा हमला हुआ है। आक्रांताओं ने केवल सत्ताओं को ही ध्वस्त नहीं किया अपितु भारतीय संस्कृति और साहित्य को भी विकृत करने का प्रयास किया है। एक ओर यदि भारतीय जन स्वाधीनता संघर्ष के लिये आगे आये तो दूसरी ओर भारतीय साहित्य और संस्कृति को सहेज कर संकलित करने वालों की भी एक लंबी श्रृंखला रही है। महाशय राजपाल ऐसे ही बलिदानी थे जिन्होंने आर्य साहित्य को सहेजकर प्रकाशन करने के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया।

वे आर्य साहित्य के प्रमुख प्रकाशक थे। उन्होंने अपना जीवन आर्य साहित्य के संकलन, युवाओं में संस्कार और भय अथवा लालच से मतान्तरित व्यक्तियों की घर वापसी में लगाया था और यही उनकी हत्या का कारण बना।

महाशय राजपाल का जन्म आषाढ़ कृष्ण पक्ष पंचमी विक्रम संवत 1942 (2 जुलाई 1885) को अमृतसर में हुआ था। उनके बचपन का नाम घसीटाराम था। उनके पिता लाला रामदास खत्री एक छोटे व्यवसायी थे। परिवार भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपराओं के प्रति समर्पित था। राजपाल जी बचपन से बहुत संवेदनशील और कुशाग्र बुद्धि थे। पढ़ाई में भी सदैव प्रथम आते। राजपाल जी जब छोटे ही थे, तब अचानक उनके पिता कहीं गायब हो गये। उनकी किसी ने हत्या की या वे स्वयं किसी कारण घर परिवार छोड़कर चले गये यह रहस्य सदैव बना रहा।

पिता के चले जाने से परिवार गहन आर्थिक संकट में आ गया। माँ ने भी छोटे मोटे काम किये और राजपाल जी ने भी। इस प्रकार परिवार आगे बढ़ा। इसी संघर्ष में उन्होंने मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण कर काम की तलाश की। उनकी आवश्यकता वैद्य फकीर चंद जी यहाँ पूरी हुई। फकीरचंद जी अमृतसर में एक प्रसिद्ध वैद्य और आर्यसमाज के कार्यकर्ता थे। उनको एक सहायक की आवश्यकता थी और राजपाल जी को काम की खोज थी। अतएव दोनों की आवश्यकता पूरी हुई।

राजपाल जी बारह रुपये मासिक पर उनके सहयोगी हो गये और आर्यसमाज से भी जुड़ गए। अपने कार्य के प्रति समर्पण, जिज्ञासु स्वभाव के चलते उन्होंने न केवल वैद्य जी के हृदय में अपितु आसपास के क्षेत्र में भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था। राजपाल नाम इन्हीं वैद्य फकीरचंद जी ने दिया। वे अपने चिकित्सा व्यवसाय के साथ भारत राष्ट्र के मूल्यों और आर्य समाज के सिद्धांतों के प्रति जागरूकता का कार्य करते थे।

एक ओर जहाँ युवकों में साँस्कृतिक जागरण का अभियान चलाये हुये थे वहीं 1905 से स्वदेशी आँदोलन भी जुड़ गये। वैद्य जी ने इस काम में राजपाल जी भी जोड़ लिया। राजपाल जी ने युवाओं से संपर्क किया और एक टोली बना ली। यह टोली पूरे नगर में घूम घूम कर युवाओं को संस्कारों से जोड़ने का कार्य करने लगी।

इसके लिये सांस्कृतिक और मानवीय विन्दुओं को तार्किक तरीके से लोगों को समझाकर अपने धर्म और परंपरा से जोड़ने का अभियान चला। उन्होंने यह कार्य अमृतसर से लाहौर तक फैलाया। इस अभियान से उन लोगों को कठिनाई हुई जो कुतर्क के आधार पर युवाओं को सनातन परंपरा से तोड़कर मतान्तरण का अभिमान चला रहे थे। कई बार सार्वजनिक शास्त्रार्थ भी हुये पर राजपाल जी अध्ययन बहुत करते थे । उनकी तार्किक क्षमता भी अद्भुत थी इसीलिए हर बार वे ही भारी पड़ते।

उन्होने प्रतिदिन रात्रि आठ बजे युवाओं की एक संस्कार बैठक करने की परंपरा भी आरंभ की और एक संगठन भी बनाया जिसका नाम “सुधार सभा” रखा। राजपाल जी इस सभा में बच्चों और युवाओं को व्यक्तित्व और जीवन निर्माण के लिए संस्कारों के अनुरुप जीवन जीने का संदेश देते थे। इस सभा में मांस-भक्षण, तम्बाकू व मदिरा पान आदि से दूर रहने का आव्हान होता। इस सभा के प्रचार से अनेक युवकों ने दुर्व्यसनों का परित्याग किया। कितने ही युवक कुसंगति से बचे।

समय के साथ विवाह हुआ और राजपाल जी लाहौर आ गये। यहाँ उन्होंने दो संस्थाएँ बनाई एक “आर्य पुस्तकालय और दूसरी “सरस्वती प्रकाशन”। सरस्वती उनकी पत्नि का नाम था। सरस्वती प्रकाशन पत्नि के नाम पर ही रखा था। उन दिनों पंजाब में हिन्दी का प्रचलन बहुत कम था। अधिकतर पुस्तकें उर्दू या पंजाबी में ही प्रकाशित होती थीं। हिन्दी के प्रकाशक भी नगण्य थे। इस बात को भाँप कर राजपाल ने ‘आर्य पुस्तकालय’ तथा ‘सरस्वती आश्रम’ नामों से हिन्दी के प्रचार का अभियान छेड़ा।

राजपाल जी ने उन विपरीत परिस्थिति में हिन्दी के स्तरीय प्रकाशन का आयाम स्थापित किया वह अपने आप में एक आश्चर्यजनक है। उनका सौम्य और आत्मीय व्यवहार सबको प्रभावित करता। यहाँ उन्हें सब लोग महाशय संबोधन से पुकारने लगे। अब उनका नाम महाशय राजपाल हो गया।

1920 और 1930 के दशक में महाशय राजपाल ने चार भाषाओं में एक साथ स्तरीय पुस्तकें प्रकाशित कीं। हिन्दी और उर्दू में उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 200 से ऊपर थी। वे स्वयं अच्छे लेखक एवं कुशल सम्पादक थे। अनेक पुस्तकें स्वयं लिखीं तथा अन्य लेखकों के लेखों तथा भाषणों का संपादन और प्रकाशन किया।

समय के साथ स्वामी श्रद्धानन्द से जुड़े और न केवल स्वामी जी के पत्र ‘सद्धर्म-प्रचारक’ में सहायक सम्पादक बने अपितु स्वामी जी शुद्धीकरण अभियान में सहभागी भी बन गये। कालान्तर में वे लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक ‘प्रकाश’ के वर्षों सह-सम्पादक रहे। इसी पृष्ठभूमि के साथ उन्होंने राजपाल प्रकाशन संस्था गठित कर पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में भी पदार्पण किया।

लाहौर में उन दिनों हिन्दी प्रकाशन आरंभ करना सरल नहीं था। तब इस व्यवसाय में संघर्ष अधिक और पैसा कम था लगभग पन्द्रह वर्षों के अपने प्रकाशकीय जीवन में उन्होंने अनेक हिन्दी पुस्तकों के प्रकाशन किए और सुदूर देशों में बसे भारतीय मूल के लोगों तक उन्हें पहुंचाने का काम भी किया।

उनके प्रकाशन मॉरिशस, फिजी, पूर्वी अफ्रीका, ब्रिटिश तथा डच गयाना आदि स्थानों पर बड़ी संख्या में जाते थे। पुस्तकों के माध्यम से भारतीय विचारधारा और संस्कृति के संदेशवाहक साहित्य के निर्यात में भी उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही थी।

स्वामी श्रृद्धानंद जी सानिध्य के कारण वे कुछ कट्टरपंथियों के निशाने पर तो आ ही गये थे। स्वामी श्रृद्धानंद जी की हत्या की उन्होंने कठोर शब्दों में निंदा की और लेख भी लिखे। इससे उनके विरुद्ध गुस्सा और बढ़ा। तभी लाहौर में एक घटना घटी, उन्हीं दिनों लाहौर के बाजार में दो पुस्तकें आईं। जिनमें भारतीय मान विन्दुओं पर अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ थीं।

एक पुस्तक का नाम ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और दूसरी पुस्तक का नाम ‘उन्नीसवीं सदी का महर्षि’था। पहली पुस्तक में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और दूसरी पुस्तक में महर्षि दयानन्द सरस्वती पर बहुत ही भद्दे और अश्लीलता से भरा कीचड़ उछाला गया था। सनातन परंपरा और उसके आदर्शों पर इस प्रकार कीचड़बाजी पहली नहीं थी। उन दिनों लाहौर में आम बात थी।

इस प्रकार का प्रचार उस समूह की ओर से होता था जो युवाओं के मतान्तरण का अभियान चला रहा था। लेकिन इस बार इसके उत्तर में एक पुस्तक बाजार में आई जिसमें पैगंबर साहब पर टिप्पणियाँ थीं। “रंगीला रसूल” नाम से सामने आई। इस पुस्तक पर लेखक और प्रकाशन का नाम नहीं था पर यह प्रचार हो गया कि इसके प्रकाशक राजपाल जी हैं। पुस्तक को लेकर तनाव हुआ।

राजपाल जी से लेखक का नाम पूछा गया पर उन्होंने अनभिज्ञता व्यक्त कर दी। इस पुस्तक पर गाँधी जी ने भी आपत्तिजनक माना और यंग इंडिया में लेख लिखा। राजपाल जी गिरफ्तार हुये। उनपर मुकदमा चला। उन पर निचली अदालत में कारावास और जुर्माने की सजा हुई। उन्होंने अपील की और हाई कोर्ट से बरी हो गये।

उनके बरी हो जाने को से कट्परपंथी समाज में नाराजी बढ़ी। उन्हे जान से मारने की धमकियाँ मिलने लगीं। उन पर हमले भी हुये। वे दो बार के हमलों में बच गये। वे हमलावर पकड़े भी गये पर तीसरी बार का हमला प्राणलेवा बना।

वह 6 अप्रैल 1929 का दिन था एक इल्मदीन नामक कट्टरपंथी पुस्तक देखने के बहाने दुकान में घुसा और अवसर देखकर छुरे से हमला बोल दिया। राजपाल जी आर्य वैदिक धर्म तथा सत्य वैदिक साहित्य के प्रकाशन के लिये बलिदान हो गये। हमलावर इल्मदीन को पकड़ लिया गया। उस पर मुकदमा चला और अदालत ने उसे फाँसी की सजा सुनाई।

राजपाल जी चौथे बलिदानी थे, उनसे पहले महर्षि दयानन्द, स्वामी श्रृद्धानंद और पं. लेखराम जी भी वैदिक परंपरा की रक्षा में बलिदान हुए थे। राजपाल जी एक निर्भीक पत्रकार, लेखक, प्रकाशक और वैदिक संस्कृति के लिये समर्पित थे। उनके बलिदान दिवस पर सादर नमन्।

आलेख

श्री रमेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल, मध्य प्रदेश

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