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हाथी किला एवं रतनपुर के प्राचीन स्थल

बिलासपुर-कोरबा मुख्यमार्ग पर 25 किमी की दूरी पर प्राचीन नगर रतनपुर स्थित है। पौराणिक ग्रंथ महाभारत, जैमिनी पुराण आदि में इसे राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। त्रिपुरी के कलचुरियों ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक शासन किया। इसे चतुर्युगी नगरी भी कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है कि इसका अस्तित्व चारों युगों में विद्यमान रहा है। राजा रत्नदेव प्रथम ने मणिपुर नामक गाँव को रत्नपुर नाम देकर अपनी राजधानी बनाया। इस नगर में बहुत सारे प्राचीन स्थल विद्यमान हैं।

हाथी किला – रतनपुर बस स्टैण्ड के पास राजा पृथ्वीदेव द्वारा निर्मित ऐतिहासिक हाथी किले के पुरावशेष स्थित हैं। यह किला चारों ओर से खाईयों से घिरा हुआ है।  किले में चार द्वार, सिंह द्वार, गणेश द्वार, भैरव द्वार तथा सेमर द्वार बने हुए हैं।  सिंह द्वार के बांई ओर गंधर्व, किन्नर, अप्सरा एवं देवी देवताओं के साथ दशानन रावण अपना शीश काटकर यज्ञ करते हुए उत्कीर्ण है। 

इसके आगे एक विशाल प्रस्तर प्रतिमा है, जिसमें सिर एवं पैर का अंश शेष है, यह प्रतिमा गोपाल राय के नाम से जानी जाती है। कहा जाता है कि गोपाल राय की वीरता से प्रभावित होकर मुगल बादशाह जंहागीर ने राजा कल्याण साय को अनेक उपाधियाँ दी तथा रतनपुर से लगान लेना बंद कर दिया।

इसके पश्चात गणेश द्वार है,जहाँ हनुमान जी की प्रतिमा विराजित है।  यहाँ से आगे जाने पर मराठा साम्राज्ञी आनंदी बाई द्वारा निर्मित लक्ष्मीनारायण मंदिर अवस्थित है। इसके आगे जगन्नाथ मंदिर है, जिसक निर्माण राजा कल्याण साय ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा एवं बलभद्र की प्रतिमा स्थापित है। साथ ही यहाँ भगवान विष्णु, राजा कल्याण साय तथा देवी अन्नपूर्णा की सुंदर प्रतिमाएं भी हैं।

इस मंदिर के पार्श्व भाग में रनिवास एवं महल के अवशेष विद्यमान हैं। इस किले का अंतिम द्वार मोतीपुर की ओर है, जहाँ बीस दुअरिया तालाब के किनारे राजा लक्ष्मण साय की बीस रानियाँ सती हुई थी। उन्हीं की स्मृति में यहाँ बीस दुअरिया का निर्माण करवाया गया था।

आदि शक्ति माँ महामाया देवी –  लगभग 1000 वर्ष प्राचीन महामाया देवी का दिव्य एवं भव्य मंदिर दर्शनीय है।  इसका निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा 11 वीं शताब्दी में कराया गया था। 1045 ईं में राजा रत्नदेव मणिपुर नामक गांव में  शिकार के लिए आए थे, जहाँ रात्रि विश्राम उन्होंने एक वट वृक्ष पर किया। अर्ध रात्रि में जब राजा की आँख खुली, तब उन्होंने वृक्ष के नीचे अलौकिक प्रकाश देखा। यह देखकर वे चमत्कृत हो गये कि वहाँ आदि शक्ति श्री महामाया देवी की सभा लगी हुई है। इतना देखकर वे अपनी चेतना खो बैठे।

महामाया मंदिर रतनपुर

सुबह होने पर वे अपनी राजधानी तुम्मान खोल लौट गये और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया तथा 1050 ईं श्री महामाया के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर के भीतर महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी की कलात्मक प्रतिमाएं विराजमान हैं। मान्यता है कि यह मंदिर तंत्र मंत्र का केन्द्र रहा है, रतनपुर में सती का दाहिन स्कंध गिरा था।

भगवान शिव ने  स्वयं आविर्भूत होकर इसे कौमारी पीठ का नाम दिया था। जिसके कारण माँ के दर्शन से कुंवारी कन्याओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है।  नवरात्रि में यहां की छटा दर्शनीय होती है, इस अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा हजारों की संख्या में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्जवलित किये जाते हैं।

श्री काल भैरव – यहाँ पर काल भैरव की लगभग नौ फ़ुट ऊंची भव्य प्रतिमा विराजमान है। कौमारी पीठ होने के कारण कालांतर में यह तंत्र साधना का भी केन्द्र रहा है। बाबा ज्ञानगिरि ने भैरव मंदिर का निर्माण कराया था।

बुढेश्वर महादेव – रामटेकरी के नीचे की ओर राजा पृथ्वीदेव द्वितीय द्वारा निर्मित यह मंदिर अत्यंत ही अद्भुत है। यहाँ विराजित शिवलिंग स्वयंभू है। स्थानीय लोगों में यह बूढ़ा महादेव के नाम से प्रसिद्ध है।

श्री खंडोबा मंदिर – यहाँ शिव एवं भवानी की अश्वारोही प्रतिमा विराजमान है। इस मंदिर का निर्माण मराठा नरेश बिंबाजी राव भोंसले की रानी ने अपने भतीजे खांडो जी की स्मृति में कराया था।  किंवदन्ती है कि मणिमल्ल नामक दैत्यों के संहार के लिए भगवान शिव ने मार्तण्ड भैरव का रुप बनाकर सहयाद्रैइ पर्वत पर उसका संहार किया था। खांडोबा मंदिर के पार्श्व में प्राचीन एवं विशाल सरोवर दुलहरा तालाब है।

श्री महालक्ष्मी देवी मंदिर – रतनपुर कोटा मुख्य मार्ग पर इकबीरा पहाड़ी पर श्री महालक्ष्मी देवी का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इसका निर्माण राजा रत्नदेव तृतीय के प्रधानमंत्री गंगाधर ने करवाया था।  इसका स्थानीय नाम लखनी देवी मंदिर भी है। यहाँ नवरात्र में मंगल जंवारा बोया जाता है तथा धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।

जूना शहर तथा बादल महल – लखनी देवी मंदिर के आगे मुख्यमार्ग पर  ऐतिहासिक जूना शहर नामक बस्ती है। इसे राजा राजसिंह ने राजपुर के नाम से बसाया था।  साथ ही उन्होंने यहाँ अपनी प्रिय रानी कजरा देवी के लिए बादल महल का निर्माण कराया था।  यह कल्चुरिकालीन स्थापत्य का बेजोड़ नमूना है। इसमें सात मंजिलें थी तथा इसे सतखंडा महल भी कहा जाता है। वर्तमान में इसकी सिर्फ़ दो ही मंजिलें शेष रह गई हैं।  महल के पास ही अस्तबल तथा जूना शहर में कोकशाह द्वारा निर्मित कोको बावली एवं कंकन बावली भी है।

रामटेकरी रतनपुर

रामटेकरी – इस पहाड़ी पर पंचायतन शैली में श्री राम का भव्य एवं ऐतिहासिक मंदिर स्थित है।  गर्भ गृह में भगवान राम, देवी सीता, भरत, लक्ष्मण एवं शतुघ्न की प्रतिमा पंचायतन शैली में विराजमान है। भगवान राम के अंगूठे से जल की धारा प्रवाहित होती है। साथ ही सभा मण्डप में भगवान विष्णु तथा हनुमान जी प्रतिमा विराजमान अहि। सभागृह के आगे रानी आनंदी बाई द्वारा निर्मित राजा बिंबाजी का मंदिर है।

गिरजावन हनुमान मंदिर – रामटेकरी मार्ग में पूर्व दिशा की ओर राजा पृथ्वीदेव द्वितीय द्वार निर्मित  सिद्ध दक्षिणमुखी हनुमान जी का ऐतिहासिक मंदिर है। हनुमान जी की इस कलात्मक प्रतिमा में उनके कांधे पर श्री राम एव लक्ष्मण बैठे हैं व उनके पैरों के नीचे अहिरावण दबा है।  इसी परिसर में राम जानकी एवं शिव मंदिर भी स्थित है।

कण्ठी देवल मंदिर – श्री महामाया देवी परिसर में श्री नीलकंठेश्वर महादेव का भव्य मंदिर  स्थित  है। इस मंदिर का पुन: निर्माण केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा कराया गया है। राष्ट्रीय धरोहर की सूची में शामिल यह मंदिर 15 वीं शताब्दी में निर्मित है। इसके चार प्रवेश द्वार हैं तथा दीवारों पर देवी देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। इसी मंदिर के पास रतनपुर तथा आस पास के क्षेत्रों से पाई गई प्रतिमाओं का संग्रहालय है।

कंठी देवल मंदिर

श्री रत्नेश्वर मंदिर – यह मंदिर करैहापारा में रत्नेश्वर तालाब के किनारे स्थित है। यह राजा रत्नदेव द्वारा स्थापित किया गया था। यहीं पर वेद-रत्नेश्वर तालाब के किनारे चार सौ वर्ष पुराना कबीर आश्रम है, जिसकी स्थापना कबीर पंथ के श्री सुदर्शन नाम साहेब ने की थी।

भुवनेश्वर महादेव मंदिर – रतनपुर-चपोरा मार्ग पर कृष्णार्जुनी तालाब के किनारे पर यह प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर में भगवान भास्कर की प्रतिमा स्थापित है तथा इसे सूर्येश्वर मंदिर भी कहा जाता है।  यह मंदिर एवं शिवलिंग ज्यामितीय आधार पर निर्मित है। गर्भगृह में प्रवेश द्वार पर शिलालेख उत्कीर्ण है।

बैरागवन एवं बीसदुअरिया मंदिर – श्री महामाया मंदिर के पीछे कुछ दूरी पर आम्रकुंजों से घिरे बैरागवन में तालाब तथा इसके किनारे पर भगवान नर्मदेश्वर महादेव का मंदिर एवं दूसरी ओर राजा राजसिंह का भव्य समारक है, जिसे बीस दुअरिया मंदिर कहते हैं। यह मंदिर मूर्ति विहीन है तथा बीस द्वारों से युक्त है। बैरगवन के पास ही खिचरी केदारनाथ का प्राचीन मंदिर है।

बीस दुअरिया रतनपुर

खूंटाघाट बांध – मनोहारी प्राकृतिक दृश्यों  से भरपूर यह बांध पर्यट्कों के आकर्षण का केन्द्र है। भाद्रमास में गणेश चतुर्थी के दिन यहाँ पर मेला भरता है। इसका निर्माण अंग्रेजों के काल में हुआ, यह 1926 में बनकर तैयार हुआ। इस जलाशय के नीचे की ओर सुंदर उद्यान है तथा ऊपर पहाड़ी पर रेस्ट हाऊस बना हुआ है। यह वाटर स्पोर्टस की दृष्टि से उत्तम स्थान है।

कैसे पहुंचे-

वायु मार्ग – रायपुर (154 किमी) निकटतम हवाई अड्डा है, जो मुंबई, दिल्ली, नागपुर, भुबनेश्वर, कोलकाता, रांची विशाखापत्तनम सहित देश के अनेकों हवाई अड्डों से जुड़ा है।
रेलमार्ग – हावड़ा-मुंबई मुख्य रेलमार्ग पर बिलासपुर से 25 किमी दूर पर समीपस्थ रेल्वे जंक्शन है।
सड़क मार्ग- बिलासपुर से सार्वजनिक एवं निजी वाहन द्वारा सड़क मार्ग से यात्रा की जा सकती है।
आवास व्यवस्था –  रतनपुर में शासकीय विश्राम गृह है तथा महामाया मंदिर ट्रस्ट की ओर से एक सर्वसुविधायुक्त धर्मशाला की व्यवस्था है। साथ ही नगर में दो-तीन और धर्मशालाएं हैं। इसके साथ ही बिलासपुर में विश्राम गृह तथा आधुनिक सुविधाओं से युक्त अनेक होटल हैं।

सभी फ़ोटो – ललित शर्मा

ललित शर्मा इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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