"हरेला पर्व : प्रकृति, संस्कृति और संरक्षण की परंपरा" पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
राजकीय महाविद्यालय बलुवाकोट, धारचूला रोड, पिथौरागढ़ के हिंदी विभाग द्वारा "हरेला पर्व : प्रकृति, संस्कृति और संरक्षण की परंपरा" विषय पर एक ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। यह संगोष्ठी प्रातः 11:30 बजे प्रारंभ होकर दोपहर 2 बजे तक चली, जिसमें देशभर के विविध प्रांतों से शिक्षाविदों, शोधार्थियों व बुद्धिजीवियों ने सहभागिता की।
पिथौरागढ़, उत्तराखंड | 16 जुलाई 2025
राजकीय महाविद्यालय बलुवाकोट, धारचूला रोड, पिथौरागढ़ के हिंदी विभाग द्वारा "हरेला पर्व : प्रकृति, संस्कृति और संरक्षण की परंपरा" विषय पर एक ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। यह संगोष्ठी प्रातः 11:30 बजे प्रारंभ होकर दोपहर 2 बजे तक चली, जिसमें देशभर के विविध प्रांतों से शिक्षाविदों, शोधार्थियों व बुद्धिजीवियों ने सहभागिता की।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य उत्तराखंड की लोक परंपरा हरेला पर्व को व्यापक जनचेतना और समसामयिक संदर्भों से जोड़ना था जिसे प्रतिभागियों और वक्ताओं ने अत्यंत सार्थक रूप में संपन्न किया। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो. सतपाल सिंह बिष्ट, कुलपति, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा ने पर्व के सामाजिक और पर्यावरणीय पक्ष को रेखांकित किया। वहीं विशिष्ट अतिथियों में शामिल रहे प्रो. जगत सिंह बिष्ट (पूर्व कुलपति) ने हरेला को पर्वतीय समाज की सांस्कृतिक आत्मा बताया। प्रो. एम. एम. सेमवाल (केंद्रीय विश्वविद्यालय गढ़वाल) ने लोक पर्वों के वैज्ञानिक और शोधपरक दृष्टिकोण पर बल दिया। प्रो. गुड्डी बिष्ट पंवार (हिंदी विभाग, गढ़वाल विश्वविद्यालय) ने पीपल, बरगद और पंय्या जैसे वृक्षों की सांस्कृतिक आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
प्रो. एच. एस. पुरोहित (डीन, दून विश्वविद्यालय) ने लोक पर्वों को अर्थव्यवस्था और GDP से जोड़ने की आवश्यकता पर बात रखी। संरक्षक प्रो. सुभाष चंद वर्मा, प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय बलुवाकोट ने इस पर्व को राष्ट्रीय एकता व सांस्कृतिक मेल-जोल का माध्यम बताया। संयोजक डॉ. चंद्रकांत तिवारी ने कहा कि “प्रकृति और संस्कृति मानवीय संवेदनाओं का रूप हैं, और हरेला पर्व इनका सजीव प्रतीक है।”
डॉ. संदीप कुमार ने भी इस अवसर पर कहा कि “हरेला केवल एक पर्व नहीं, अपितु हमारी संस्कृति से आत्मिक रूप से जुड़ा हुआ जीवनदर्शन है।” संगोष्ठी में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि हरेला पर्व केवल उत्तराखंड ही नहीं, अपितु पूरे भारतवर्ष की सांस्कृतिक विरासत में एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान और भावनात्मक संबंधों का जीवंत संगम है।
यह संगोष्ठी प्रकृति, परंपरा और संरक्षण के समन्वय का एक सफल बौद्धिक मंच साबित हुई, जिसने भविष्य की पीढ़ियों के लिए लोक पर्वों के संरक्षण की दिशा में सार्थक पहल प्रस्तुत की। साथ ही रायपुर स्थित ‘दक्षिण कोसल टुडे’ के संपादक श्री वेद प्रकाश सिंह ठाकुर, संपादक मंडल सदस्य श्रीमती सोनल बाजपेई तथा सेवानिवृत्त शिक्षक श्री राम कुमार वर्मा (भिलाई छत्तीसगढ़) के साथ साथ देश भर जुड़े अध्येता, शोधार्थियों की गरिमामयी उपस्थिति ने इस संगोष्ठी को एक अंतरराज्यीय सांस्कृतिक संवाद का स्वरूप प्रदान किया तथा भविष्य में छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के बीच के सांस्कृतिक संबंधों की कड़ी को लेकर एक ऑनलाइन संगोष्ठी की भी योजना है। चाहे छत्तीसगढ़ का पर्व हरेली हो या उत्तराखंड का हरेला दोनों ही पर्व हरियाली, खेती, और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े हैं। ये दर्शाते हैं कि भले ही नाम और परंपराएँ अलग हों, पर उद्देश्य एक ही है प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की साझी चेतना। इस तरह उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के पर्व सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। हरेला पर्व के बहाने संस्कृति और पर्यावरण को जोड़ने की यह पहल निश्चित ही राष्ट्रीय स्तर पर नई दिशा प्रदान करेगी।