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डॉ. भीमराव अंबेडकर का भारतीय राजनीति में उत्थान और योगदान

महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में मंडनगढ से पांच मील की दूरी पर आंबवडे नामक देहात है। भीमराव अंबेडकर घराने का मूल गांव यही था। इस घर आने का कुल नाम सकपाल था। कुलदेवी की पालकी रखने का सम्मान इस महार घराने का था। महार जाति मजबूत कद काठी, जोरदार आवाज वाली चमकीली त्वचा तथा गुण से बुद्धिमान और प्रवृत्ति से लड़ाकू थी।

अंबेडकर के पितामह का नाम मालोजी सकपाल था। वह रिटायर्ड फौजी थे। उनकी संतानों में मीराबाई नामक बेटी और राम जी नामक बेटे की कुछ जानकारी प्राप्त होती है। राम जी सकपाल सेना में भर्ती हो गए थे। जिस दल में वह काम कर रहे थे उसमें सूबेदार मेजर के पद पर धर्मा मुरबाडकर थे। वह भी महार परिवार के थे। थाने जिला के मुरबाड गांव के रहने वाले थे। उस परिवार के सातों भाई सेना में मेजर थे। अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि इस परिवार का रहन-सहन ठाठ बाठ वाला था।

धार्मिक आधार पर यह परिवार नाथ संप्रदाय का मतावलंबी था। महार बस्ती और गांव में उनका घराना बड़ा इज्जतदार माना जाता था। बाद में यह परिवार पनवेल के नजदीक चला गया। धर्मां जी की बेटी भीम बाई के साथ राम जी सकपाल का विवाह तय हो गया। 1865 में यह विवाह संपन्न हुआ। विवाह के समय राम जी की उम्र बीस साल रही होगी और भीमाबाई की 13 साल।

सैनिक अधिकारी की सिफारिश पर राम जी सकपाल को पुणे के पंतो जी स्कूल में प्रवेश प्राप्त हुआ। वहां उन्होंने अध्यापन के व्यवसाय की शिक्षा ली। पंतो जी स्कूल की परीक्षा पास हो जाने पर राम जी सकपाल अध्यापक बने और धीरे-धीरे फौजी छावनी स्कूल के हेड मास्टर भी हो गए। उन्होंने इस पद पर लगभग 14 साल तक काम किया। इसके बाद उन्हें पदोन्नति प्राप्त हुई तथा सूबेदार मेजर बन गए।

1890 तक राम जी सकपाल की 13 संताने हुई जिनमें से पांच ही जीवित रहे। राम जी के एक चाचा बैरागी हो गए थे। उनका लंबे समय तक कुछ अता पता नहीं था। संजोगवश बैरागियों के एक समूह के साथ महू आए। काफी बूढ़े हो गए थे। राम जी सकपाल के घर की एक महिला ने उन्हें पहचान लिया। उसने घर जाकर राम जी को बताया। सूबेदार दौड़ते हुए बैरागी के पास गए और प्रार्थना की घर चलने की।

साधु पुरुष ने राम जी सकपाल को बताया कि वह फिर से रिश्तेदारी के मोह में अटकना नहीं चाहते हैं इसलिए घर नहीं जाएंगे लेकिन आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे परिवार में एक तेजोमय पुत्र का आगमन होना है।14 अप्रैल 1891 को 14वीं संतान के रूप में भीमराव का जन्म हुआ।

परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नही थी। परिश्रम और मेधा के बल पर भारत मे स्नातक की शिक्षा पूरी की और नहीं चाहते हुए भी बरौदा रियासत मे नौकरी करने पहुँचे। सेना मे लेफ्टिनेंट का पद मिला था। जल्दी ही, पंद्रह दिनों के अंदर पिता की तबियत बिगड़ी, वापस लौटे, पिता नहीं रहे।

बरौदा रियासत की तरफ से चार छात्र वृत्ति अमेरिका के लिए देने की घोषणा हुई और इस में अंबेडकर का चयन हो गया। 1913 में अमेरिका गये। कोलंबिया विश्वविद्यालय मे अध्यन पूरा किया। आज वहाँ उनकी मूर्ति लगी हुई है। 1917 में भारत वापस आये। कॉलेज में पढ़ाया। 1920 पूरा होते होते फिर अध्ययन के लिए लंदन जाने का मौका मिला। शोध उपाधि तथा कानून की डिग्री लेकर 14 अप्रिल 1923 को भारत वापस आये। उनकी उम्र 32 वर्ष की पूरी हो चुकी थी। वे भारतीय समाज और राजनीति में भागीदारी के लिए तैयार हो चुके थे।

1923 में भारत की राजनीतिक स्थिति के बारे में थोड़ा सा समझ लेना उपयोगी होगा। असहयोग आंदोलन समाप्त हो चुका था और उसके बाद महात्मा गांधी को सरकार ने जेल में बंद कर दिया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंदर मोतीलाल नेहरू, सी आर दास, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू आदि के नेतृत्व में कांग्रेस स्वराज दल असेंबली में प्रवेश के लिए चुनाव लड़ने हेतु गठित हो चुका था।

इस दल को कांग्रेस में प्रो चेंजर्स के नाम से जाना जा रहा था। गांधीवादी खेमा नो चेंजर्स के नाम से जाना जाता था। स्वास्थ्य के आधार पर सरकार ने 1924 में गांधी जी को जेल से रिहा कर दिया। कांग्रेस के अंदर यह सहमति बन गई कि असेंबली में प्रतिनिधित्व का कार्य स्वराज दल वाले करेंगे और शेष कांग्रेसी गांधीजी के नेतृत्व में रचनात्मक एवं सामाजिक सुधार का कार्य करेंगे।

समाज सुधार के क्षेत्र में कुछ प्रमुख धाराएं इस प्रकार थी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक धड़ा था जो 1916 से ही छुआछूत को जीवन में व्यावहारिक तौर पर समाप्त करना चाहता था। इसके बाद वीर सावरकर का खेमा था। उन पर राजनीतिक आंदोलन में भागीदारी करने पर रोक लगाई गई थी तथा इसी आधार पर उन्हें रिहा किया गया था। उनके लिए समाज सुधार का क्षेत्र पूरी तरह खुला हुआ था। उन्होंने धर्म ग्रंथो की आधुनिक व्याख्या करनी शुरू की तथा समाज से छुआछूत का विरोध किया।

सावरकर की भूमिका हिंदू राष्ट्रवादी तथा यथार्थवादी क्रांतिकारी की थी। उनका मकसद यह था कि संगठन और समता की नींव पर जाति विहीन हिंदू समाज का निर्माण किया जाए। इस संगठित हिंदू समाज पर एक शक्तिशाली हिंदू राष्ट्र खड़ा किया जाए। लगातार कैद में अटके रहने से उनके आंदोलन प्रचार और संचार कार्य सीमित हो गए थे। तब भी उन्होंने रत्नागिरी जिले में काफी ठोस कार्य किया तथा महाराष्ट्र को हिलाकर रख दिया। इसी तरह पंजाब में भाई परमानंद के नेतृत्व में भारतीय साम्यवाद संघ का गठन किया गया था । यह संघ पूर्व में जाति पाति तोड़क संघ के नाम से आर्य समाज आंदोलन में कार्यरत था।

मुंबई के नए विधान परिषद में अछूतों के सर्वप्रथम प्रतिनिधि ज्ञान देव ध्रुवनाथ घोलप थे। उन्होंने अछूतों की समस्या पर परिषद में निरंतर प्रश्न उठाए। आनंद राव सर्वे नामक भंडारी जाति के सदस्य ने भी प्रश्न किया। सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव समाज सुधारक सीताराम केशव बोले की तरफ से आया। 4 अगस्त 1923 को उन्होंने प्रस्ताव पेश किया कि सार्वजनिक पनघट, सराय, विद्यालय, आदि स्थल अछूतों के लिए खोले जाएं।

अंबेडकर ने अछूत समाज की समस्याओं पर विचार विमर्श करने के लिए 9 मार्च 1924 को सायं काल परेल ( मुंबई ) के दामोदर ठाकरसी सभागृह में एक सभा बुलाई। इस सभा में सहमति बनी कि जस्टिस रानाडे की पुणे सार्वजनिक सभा की तरह की एक संस्था अपने समाज के लिए बनाई जाए। अंततः 20 जुलाई 1924 को बहिष्कृत हितकारिणी सभा स्थापित की गई। सभा के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार थे –
1.छात्रावास अथवा अन्य साधनों से बहिष्कृत समाज में शिक्षा का प्रसार करना।
2.बहिष्कृत समाज में उच्च संस्कृति की वृद्धि करने के लिए विभिन्न स्थलों पर पुस्तकालय तथा स्वाध्याय केंद्र खोलना।
3.बहिष्कृत समाज की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए औद्योगिक और कृषि स्कूल चलाना।
बहिष्कृत हितकारिणी सभा के अध्यक्ष सर चिमनलाल हरिलाल शीतलवाड थे। कार्यकारिणी समिति के अध्यक्ष स्वयं अंबेडकर थे।

बहिष्कृत हितकारिणी सभा के प्रचार की पहली सभा बहुत निराशाजनक रही। इस सभा में अछूत समाज के चार- छह गिने चुने कार्य करता ही उपस्थित थे। आसपास के कमरों में, दरवाजे और बरामदे पर बैठकर लोग या तो चिलम पी रहे थे या गपशप कर रहे थे। उनकी रुचि सभा में नहीं थी। वक्ताओं के स्वागत भाषण में ही वह सभा समाप्त हुई।

ऐसी कठिन परिस्थिति का मुकाबला करते हुए अंबेडकर देहात और नगरों में जाकर वहां के अपने समाज को तीखा उपदेश किया करते थे। त्रावणकोर के वैकोम गांव में मंदिर प्रवेश के लिए अछूतों का आंदोलन शुरू हुआ। इसका नेतृत्व गैर ब्राह्मण नेता रामास्वामी नायकर कर रहे थे। इस आंदोलन में गांधी जी के शिष्य आचार्य विनोबा भावे और कर्मवीर शिंदे ने भी हिस्सा लिया था।

इस तरह से समस्या का समाधान हो पाया। मुरुगेशन नामक एक अछूत ने मद्रास के एक मंदिर में बंदिश तोड़कर प्रवेश किया। इसके कारण न्यायालय में मुरुगेशन को सजा हुई। इन दोनों घटनाओं का भावपूर्ण उल्लेख अंबेडकर ने महाड़ सत्याग्रह के पूर्व अपने भाषण और लेखन में किया।

अक्टूबर 1926 में पुणे के सर्वश्री बागडे, जेधे और जवलकर इन तीनों गैर ब्राह्मण नेताओं के खिलाफ पुणे के कुछ ब्राह्मणों ने मानहानि का अभियोग न्यायालय में दाखिल किया कि इन लोगों ने देश के दुश्मन नामक किताब में अपने ब्राह्मण विरोधी मत को पेश किया था। इन तीनों नेताओं ने अपना वकालतनामा अंबेडकर को दिया। अंबेडकर ने बड़ी कुशलता से प्रभावशाली भाषा में उनका पक्ष रखा और विजय प्राप्त की। इस विजय से अंबेडकर की कीर्ति और प्रतिष्ठा महाराष्ट्र में बढ़ गई। होशियार वकील के रूप में वह प्रसिद्ध होने लगे।

1927 के वर्ष का प्रारंभ हो रहा था। इस समय अंबेडकर ने कोरेगांव युद्ध स्मारक के सामने सभा आयोजित की जिसमें अछूत समाज के बड़े नेता उपस्थित थे। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि महार जाति के सैकड़ो सैनिकों ने अनेक लड़ाईया में सरकार को सफलता दिलाई परंतु सरकार सेना मे उनका प्रवेश रोक कर विश्वास घात कर रही है। उन्होंने बलपूर्वक अपनी बात रखी कि फौज में महारों की भर्ती पर लगाई गई रोक को ब्रिटिश सरकार जल्दी से जल्दी हटा दे। जोश में उन्होंने कहा कि अगर सरकार हमारी मांग नहीं मानती है तो सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया जाए।

सरकार तक अंबेडकर की आवाज पहुंच रही थी सरकार ने उन्हें विधान परिषद के सदस्य के रूप में नियुक्त कर दिया फरवरी मास में एक सभा आमंत्रित की गई तथा उसमें अछूतों के द्वारा अंबेडकर का अभिनंदन किया गया, अप्रैल मास में भी परेल के दामोदर सभागृह में उनका सत्कार किया गया।

मुंबई विधान परिषद द्वारा सीताराम केशव बोले का पारित करवाया गया प्रस्ताव अभी तक व्यवहार में लागू नहीं हुआ था। महाड नगर पालिका ने अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले चवदार तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया है ऐसी घोषणा की गई थी परंतु व्यवहार में यह प्रारंभ नहीं हुआ था। अंबेडकर और उनके सहयोगियों ने महाड़ में 19 और 20 मार्च को जिला बहिष्कृत परिषद की सभा का आयोजन किया। इस सभा में मुंबई और नागपुर विभागों से 15 साल के किशोरी से लेकर 75 साल के बूढ़ों तक के अछूत लगभग 5000 की संख्या में जमा हुए।

यह सब अपने साथ खाने के लिए रोटियां लेकर आए थे। तालाब से करीब दो फर्लांग दूर बांस और झाँप से बने मंडप में यह परिषद संपन्न हुई। भाषण हुए और पानी पीने का कार्य व्यावहारिक तौर पर प्रारंभ करना निश्चित हुआ। अंबेडकर ने अपनी अंजलि में तालाब का पानी उठाया और मुंह लगाकर पिया। इसके बाद उस प्रचंड जनसमूह ने भी अपने नेता का अनुसरण किया। हर एक व्यक्ति अपने घर लौटने की तैयारी में लगा। इस घटना के बाद अंबेडकर की कीर्ति की लहरें एक के बाद एक सारे देश में फैल गई।

अंबेडकर के नेतृत्व में परिषद प्राचीन ग्रंथो को प्रमाण मानने के लिए नहीं तैयार थी। श्रुति स्मृति और पुराण का विरोध किया जा रहा था । 1926 में मद्रास प्रांत के ब्राह्मनेतर पक्ष ने मनुस्मृति जला दी थी। परिषद ने तय किया कि मनुस्मृति का दहन किया जाए। रात में 9:00 बजे परिषद के सामने एक गड्ढे में अछूत बैरागी के हाथों मनुस्मृति को जलाने का कार्य किया गया। इस अधिवेशन में लगभग 10000 लोग एकत्रित हुए थे।

1928 के प्रारंभ में इंदौर के महाराज तुको जी राव 3 की इच्छा अमेरिकन कन्या कुमारी मिलर से विवाह करने की हुई। महाराज की दो शादियां पहले हो चुकी थी। पहली शादी 1895 में हुई थी जब महाराज 4 वर्ष के थे और उनकी रानी 7 वर्ष की थी। इस विवाह से महाराज को दो बच्चे हुए थे एक पुत्र और एक पुत्री । वही पुत्र उनका उत्तराधिकारी बना। 1913 में महाराज ने महारानी इंदिराबाई होलकर से विवाह किया। इस विवाह से एक पुत्री हुई जिसकी 1925 में मृत्यु हो गई। महारानी ने इसके बाद इतिहास और साहित्य से जुड़ी संस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महाराज अंग्रेज अधिकारी की हत्या के आरोप में शासन से हटाए गए तथा देश निकाला दे दिया गया। उन्होंने इस हालत में तीसरी और आखरी बार विवाह करना चाहा। होने वाली पत्नी का नाम नैंसी मिलर था। वेअमेरिकी नागरिक थी। उन्होंने शर्मिष्ठा होलकर का नाम ग्रहण किया तथा हिंदू धर्म में शामिल हो गयी। बारामती में इस समस्या के निराकरण हेतु परिषद की बैठक आमंत्रित की गई। पथ प्रदर्शन के लिए डॉक्टर अंबेडकर तथा राव बहादुर बोले को आमंत्रित किया गया था। इन दोनों ने महाराज को विवाह की अनुमति देने का कार्य किया। महाराज ने विवाह किया और इस पत्नी से उनकी चार बेटियां हुई। विवाह के बाद वह पेरिस में सेटल हो गए और पचास वर्षों के लंबे अंतराल बाद 1978 में उनकी मृत्यु हुई।

इसके उपरांत डॉक्टर अंबेडकर का जीवन अधिक प्रसिद्ध है वह लंदन के तीनों गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए थे दूसरे सम्मेलन में उन्होंने महात्मा गांधी की उपस्थिति में उनके सामाजिक सुधार वाले विचारों से असहमति जाहिर की थी। मैकडॉनल्ड अवार्ड के बाद महात्मा गांधी ने यह कहा कि दलित बंधू हिंदू समाज के अंग है तथा मतदान के लिये उन्हें हिंदू समाज से अलग नहीं किया जा सकता क्योँकि इस आधार पर वे सदा के लिए अलग हो जाएंगे।

उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया। पूरे भारत में अछूतों को समाज में मिलाने की कोशिश शुरू हुई। जवाहर लाल नेहरू और सुभाष बोस इस पक्ष मे नहीं थे। हरिज़न के लिए सीटों की संख्या दोगुनी से अधिक की गयी लेकिन मतदाता मंडल सवर्ण तथा निम्न वर्ण का संयुक्त ही रह गया। बंगाल के सवर्ण वर्ग को इस समझौते से नुकसान हुआ। सवर्ण हिंदुओं की तरफ से मदन मोहन मालवीय जी ने तथा निम्न वर्ग की तरफ से डॉ अंबेडकर जी ने पूना समझौता पर हस्ताक्षर किया। गांधी जी के अनशन को तोड़ने के अवसर पर गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर कोलकाता से जेल तक पहुंचे थे । इस मौके पर डॉक्टर अंबेडकर ने गांधी जी तथा सवर्ण नेताओं को निराश नहीं किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाने की शुरुआत कर रही थी उस समय डॉक्टर अंबेडकर को महामहिम वायसराय की कार्यकारी परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया। उन्होंने इस पद को स्वीकार किया।

जब भारत छोड़ो आंदोलन के बाद गांधी जी को गिरफ्तार करके दक्षिण अफ्रीका भेजने का निर्णय लिया जाना था उस समय डॉक्टर अंबेडकर ने इसका विरोध किया । उन्होंने कहा कि अगर ऐसा किया गया तो वह कार्यकारी परिषद से इस्तीफा दे देंगे। इसके अतिरिक्त युद्ध के काल में सुरक्षित तौर पर गांधी जी को भारत से निकलकर दक्षिण अफ्रीका ले जाना संभव नहीं था अतः उन्हें पुणे के आगा खान पैलेस में ही रखा गया।

भारत की आजादी निश्चित हो गई थी तथा अंतरिम सरकार का गठन किया गया। इस सरकार में जगजीवन राम जी शामिल किए गए थे तथा डॉक्टर अंबेडकर शामिल नहीं किये जा सके लेकिन जब पूर्ण सरकार का गठन किया जा रहा था उस वक्त नेहरू जी ने डॉक्टर अंबेडकर को बुलाया और पूछा कि क्या वह कानून मंत्री की हैसियत से काम करना चाहेंगे। डॉ अंबेडकर ने अपनी स्वीकृति दी और इस तरह उनके मंत्रिमंडल में आने का रास्ता खुला।

इस घटना का दूसरा वर्णन यह है कि मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले नेताओं की सूची लेकर नेहरू जी महात्मा गांधी के पास गए थे। महात्मा जी ने कहा कि आजादी कांग्रेस को नहीं मिल रही है भारत को मिल रही है। अतः सभी आवाजों को शामिल किया जाना चाहिए और इस तरह श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा डॉक्टर अंबेडकर के मंत्रिमंडल में आने का रास्ता खुला।

संविधान सभा की बैठक होने पर यह माना जा रहा था कि नेहरू जी इंग्लैंड से बड़े राजनीति विज्ञानी को बुलाना चाह रहे थे परंतु गांधी जी ने कहा कि डॉक्टर अंबेडकर इस कार्य के लिए सर्वथा उपयुक्त है और इस तरह प्रारूप समिति की अध्यक्षता का दायित्व उन्हें मिला। प्रारूप समिति में 7 सदस्य थे। विकास जी बताते हैं इन सात सदस्यों में से डॉक्टर अंबेडकर ने सर्वाधिक कार्य किया था।

डॉ आंबेडकर का योगदान इस रूप में समझ में आता है कि उन्होंने हिंदू धर्म के अंदर रहकर बौद्ध मत को ग्रहण किया। अपने समूह की समस्याएं जनमत के सामने रखी तथा किसी विरोधी धर्म का मत ग्रहण नहीं किया जबकि इसके लिए अवसर उपलब्ध था। उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह लगती है कि वह मंत्रिमंडल में बने रहने और उसके सुख को भोगने के लिए सत्ता प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं थे। सत्ता उनके लिए विलासिता का माध्यम नहीं थी। उन्होंने अपने अध्ययन अध्यापन और सिद्धांत प्रियता को छोड़कर किसी भी हालत में सत्ता में बने रहने को पूरी तरह से त्याग दिया।

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