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नारी शक्ति की अपरिमितता का द्योतक हैं, कालजयी वीरांगना रानी दुर्गावती

(24 जून को 460 वें बलिदान दिवस के पूर्ण होने, तदनुसार 461वें बलिदान दिवस पर सादर समर्पित)

*गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग *————–
रानी दुर्गावती ने लगभग 16 वर्ष शासन किया और यही काल गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग था।गोंडवाना साम्राज्य राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक,कला एवं साहित्य के क्षेत्र में सुव्यवस्थित रुप से पल्लवित और पुष्पित होता हुआ अपने चरमोत्कर्ष तक पहुँचा। वर्तमान में प्रचलित जी.एस. टी. जैंसी कर प्रणाली रानी दुर्गावती के शासनकाल में लागू की गई थी, फलस्वरुप तत्कालीन भारत वर्ष गोंडवाना ही एकमात्र राज्य था जहाँ की जनता अपना लगान स्वर्ण मुद्राओं और हाथियों में चुकाते थे, इसका उल्लेख स्वयं अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल ने भी किया है। रानी दुर्गावती ने महिलाओं को शिक्षित करने का प्रयास किया और उनके लिए लाख के आभूषणों के लघु उद्योग स्थापित कराए। चिरौंजी, सिंघाड़ा, महुआ एवं इमारती लकड़ी के व्यापार को प्राथमिकता दी । गढ़ा में उन्नत वस्त्र उद्योग था। जड़ी बूटियों से बनी औषधियों के व्यापार को भी बढ़ावा दिया।

“चंदेलों की बेटी थी, गोंडवाने की रानी थी, चंडी थी रणचंडी थी, वह तो दुर्गावती भवानी थी। “
“मृत्यु तो सभी को आती है अधार सिंह, परंतु इतिहास उन्हें ही याद रखता है जो स्वाभिमान के साथ जिये और मरे” -रानी दुर्गावती (आत्मोत्सर्ग के समय अपने सेनापति से कहा था)

पूर्वपीठिका – भारत के हृदय स्थल में स्थित त्रिपुरी के महान् कलचुरि वंश का 13 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अवसान हो गया था, फलस्वरूप सीमावर्ती शक्तियां इस क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए लालायित हो रही थीं। अंततः इस संक्रांति काल में एक वीर योद्धा जादोंराय (यदुराय) ने, तिलवाराघाट निवासी एक महान् ब्राह्मण सन्यासी सुरभि पाठक के भगीरथ प्रयास से, त्रिपुरी क्षेत्रांतर्गत, गढ़ा-कटंगा क्षेत्र में गोंड वंश की नींव रखी। (यह उपाख्यान आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य की याद दिलाता है) कालांतर में यह साम्राज्य महान् गोंडवाना साम्राज्य के नाम से जाना गया।गोंडवाना साम्राज्य का चरमोत्कर्ष का प्रारंभ 48 वीं पीढ़ी के महानायक राजा संग्रामशाह (अमानदास) के समय हुआ और इनकी पुत्रवधू वीरांगना रानी दुर्गावती का समय गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग के नाम से जाना जाता है।

—-*गोंडवाना का चरमोत्कर्ष – आमन बुध बावन में *छल और उसका पटाक्षेप ————-
भारतीय इतिहास का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू रानी दुर्गावती एवं गोंडवाना साम्राज्य के महान् इतिहास को एक छोटी सी कहानी बना डाला और पटाक्षेप कर दिया। रानी दुर्गावती का साम्राज्य लगभग इंग्लैंड के बराबर था। 16 वर्ष का शासन काल था, पूरे भारत में एकमात्र राज्य था जहाँ कर, सोने के सिक्के एवं हाथियों तक में चुकाया गया था। जिसके शौर्य, पराक्रम, प्रबंधन और देशभक्ति के सामने आस्ट्रिया की मारिया थेरेसा रुस की कैथरीन द्वितीय और इंग्लैंड की एलिजाबेथ प्रथम कहीं नहीं लगतीं। (केवल जोन आव आर्क को छोड़ दिया जाए वह भी युद्ध कला में) मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने रानी दुर्गावती एवं गोंडवाना के इतिहास को गौण स्वरुप प्रदान करते हुए छिन्न – भिन्न रुप में प्रस्तुत कर,छल किया है। इसलिए अब शोधपूर्ण वास्तविक इतिहास लिखा जाना अनिवार्य है ताकि रानी दुर्गावती और गोंडवाना साम्राज्य के इतिहास के साथ न्याय हो और वर्तमान पीढ़ी और भावी पीढ़ी में गर्व और गौरव की अनुभूति हो तथा राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हो।


गोंडवाना साम्राज्य का चरमोत्कर्ष 15 वीं शताब्दी के अंत में गोंड वंश के महान् प्रतापी राजा संग्रामशाह के शासन काल में प्रारंभ हुआ। संग्रामशाह का वास्तविक नाम अमानदास था, जिसकी पुष्टि दमोह के पास ठर्रका ग्राम में प्राप्त एक शिलालेख से होती है। रामनगर प्रशस्ति में लिखा है कि “प्रतापी अर्जुन सिंह का पुत्र संग्रामशाह था। जिस भाँति विशाल कपास का ढेर एक छोटी सी चिंगारी से नष्ट हो जाता है, उसी भाँति उसके शत्रु तेजहीन हो गये थे। मध्य काल का सूर्य भी उसके प्रताप के सामने धूमिल सा दिखाई देता था, मानो सारी धरती को जीत लेने का निश्चय किया हो। तदनुसार उसने 52 गढ़ों को जीत लिया था। गोंड़ों में तो कहावत ही प्रचलित हो गई थी कि “आमन बुध बावन में”।


——*भोपाल, नागपुर और बिलासपुर तक गोंडवाना साम्राज्य का विस्तार *—————–गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ जबलपुर, सागर, दमोह, सिवनी, मंडला, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, नागपुर, होशंगाबाद, भोपाल, और बिलासपुर तक फैले हुए थे। समकालीन इतिहासकारों की माने तो 70 हजार गांव थे जिनकी संख्या रानी दुर्गावती के समय 80 हजार तक हो गई थी। किलों की संख्या 57 परगनों की संख्या 57 हो गई थी। कतिपय इतिहासकारों ने 56 सूबों का उल्लेख किया है।अकबर का दरबारी लेखक अबुल फजल लिखता है कि 23 हजार गांव में प्रत्यक्ष प्रशासन था और शेष सामंतों के अधीन करद गांव थे। गोंडवाना या गढ़ा-कटंगा विस्तृत और संपन्न राज्य हो गया था, इसके पूर्व में झारखंड, उत्तर में भथा या रीवा का राज्य, दक्षिण में दक्षिणी पठार और पश्चिम में रायसेन प्रदेश था। इसकी लंबाई पूर्व से पश्चिम 300 मील तथा चौड़ाई उत्तर से दक्षिण 160 मील थी। इन सीमाओं को रानी दुर्गावती ने और बढ़ा लिया था। गोंडवाना साम्राज्य का क्षेत्रफल लगभग इंग्लैंड के क्षेत्रफल जितना हो गया था। विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण दिल्ली के सुल्तान या पड़ौस के कोई अन्य राजा गोंडवाना पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सके। महान् पुरातत्व एवं इतिहासविद राय बहादुर हीरालाल के जबलपुर गजेटियर, श्री रविशंकर शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ, जगमोहन दास स्मृति ग्रंथ और जबलपुर कमिश्नरी द्वारा प्रकाशित जबलपुर अतीत दर्शन ग्रंथ में गढ़ों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है।


—-*रानी दुर्गावती का विवाह सामाजिक समरसता का अद्वितीय उदाहरण है – आलोचकों के लिए तमाचा *———-
उत्तर भारत में मुगल शासक हुमायूँ को शेरशाह ने बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध परास्त कर भारत से बाहर खदेड़ दिया और साम्राज्य विस्तार के लिए उद्यत हो गया। शेरशाह की धर्म की आड़ में विस्तारवादी नीति से कालिंजर के महान् शासक कीरत सिंह चिंतित हो गए थे, इसलिए शेरशाह सहित अन्य मुस्लिम आक्राताओं को मुँह तोड़ जवाब देने के लिए गोंडवाना साम्राज्य के महान् राजा संग्रामशाह से मित्रता का प्रस्ताव रखा,जो एक वैवाहिक संबंध के रुप में फलीभूत हुआ। वीरांगना रानी दुर्गावती का जन्म कालिंजर के किले में राजा कीरत सिंह के यहाँ 5 अक्टूबर सन् 1524 को दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था, उनकी माता का नाम कमलावती था। राजा संग्रामशाह और उनके सुपुत्र दलपतिशाह , राजा कीरतसिंह की सुपुत्री वीरांगना दुर्गावती के स्त्रियोचित सौंदर्य,शिष्टता, मधुरता और पराक्रम से बहुत प्रभावित थे, इसलिए संग्रामशाह ने कीरतसिंह से उनकी सुपुत्री का अपने पुत्र दलपतिशाह के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा, जो स्वीकार्य हुआ। दुर्भाग्य से सन् 1541 में राजा संग्रामशाह का निधन हो गया है बावजूद इसके राजा कीरतसिंह ने अपना वचन निभाया और सन् 1542 अपनी सुपुत्री वीरांगना दुर्गावती का विवाह, राजा दलपतिशाह से कर दिया। यह विवाह सामाजिक समरसता का अद्वितीय उदाहरण है और आलोचकों करारा तमाचा है जो भारतीय संस्कृति में जातिवाद और वर्ण व्यवस्था का दुष्प्रचार करते हैं।


—–महान् साम्राज्ञी के रुप वीरांगना रानी दुर्गावती का उदय———-
सन् 1545 में शेरशाह ने कालिंजर पर आक्रमण किया और मारा गया जिसमें रानी दुर्गावती की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस युद्ध में राजा कीरतसिंह का भी बलिदान हुआ। जिससे वीरांगना दुर्गावती को धक्का लगा परंतु सन् 1548 में पति दलपतिशाह की आकस्मिक मृत्यु ने वीरांगना पर वज्रपात कर दिया। इस वज्रपात से वीरांगना दुर्गावती विचलित हुईं पर शीघ्र ही उन्होंने साहस के साथ अपने 5 वर्षीय अल्पवयस्क सुपुत्र वीर नारायण की ओर से गोंडवाना साम्राज्य की सत्ता संभाल ली। इस तरह गोंडवाना साम्राज्य की वीरांगना रानी दुर्गावती का महान् साम्राज्ञी के रुप में उदय हुआ।


—*गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग *————–
रानी दुर्गावती ने लगभग 16 वर्ष शासन किया और यही काल गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग था।गोंडवाना साम्राज्य राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक,कला एवं साहित्य के क्षेत्र में सुव्यवस्थित रुप से पल्लवित और पुष्पित होता हुआ अपने चरमोत्कर्ष तक पहुँचा। वर्तमान में प्रचलित जी.एस. टी. जैंसी कर प्रणाली रानी दुर्गावती के शासनकाल में लागू की गई थी, फलस्वरुप तत्कालीन भारत वर्ष गोंडवाना ही एकमात्र राज्य था जहाँ की जनता अपना लगान स्वर्ण मुद्राओं और हाथियों में चुकाते थे, इसका उल्लेख स्वयं अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल ने भी किया है। रानी दुर्गावती ने महिलाओं को शिक्षित करने का प्रयास किया और उनके लिए लाख के आभूषणों के लघु उद्योग स्थापित कराए। चिरौंजी, सिंघाड़ा, महुआ एवं इमारती लकड़ी के व्यापार को प्राथमिकता दी । गढ़ा में उन्नत वस्त्र उद्योग था। जड़ी बूटियों से बनी औषधियों के व्यापार को भी बढ़ावा दिया।


—-*जी. एस. टी. जैंसी कर व्यवस्था और आर्थिक विकास की अधोसंरचना *—-
गढ़ा -मंडला की वीरांगना, रानी दुर्गावती के शासन में जी.एस.टी. जैंसी कर प्रणाली लागू थी। इस प्रणाली से तत्कालीन राज्य की जनता और व्यापारी वर्ग भी अत्यंत प्रसन्न था। जिसके चलते वे कर के रूप में सोने के सिक्के और हाथी तक दिया करते थे। रानी दुर्गावती का गोंडवाना राज्य समृद्ध और संपन्न था, जिसकी चर्चा मुगल शासक अकबर तक पहुंच गई थी और उसने अब्दुल मजीद आसफ खां को रानी दुर्गावती के राज्य पर चढ़ाई करने भेजा। यह सारी बातें कपोल कल्पना नहीं हैं। अबुल फजल द्वारा लिखी गई आईन -ए-अकबरी में रानी दुर्गावती के शासन और कर-प्रणाली का उल्लेख है। वहीं कर्नल स्लीमन द्वारा संपादित ग्रंथ ‘स्लीमन की जीवनी तथा उनकी उपलब्धियाँ’ में संगृहीत है, कि जबलपुर में रानी दुर्गावती के राज्य के बारे में उसने क्या-क्या समझा और जाना।


प्राचीन लेखों में शासकों द्वारा भाग, सीता और हिरण्य नामक करों का वर्णन मिलता है। रानी दुर्गावती एक समान कर व्यवस्था लागू करना चाहती थी, इसलिए बिहार से आए महेश ठाकुर और आधारसिंह की सलाह पर भाग नामक कर प्रणाली लागू की। इसकी गणना भाग= औसत उपज/3 के आधार पर होती थी। जिसमें वनोपज और कृषि दोनों पर समान कर लगाया जाता था। यही व्यवस्था अन्य कुटीर और वर्ग व्यवसाय करने वाले व्यापारियों पर भी लागू थी। भाग कर के पहले वस्तु विनिमय प्रथा लागू थी।


80 हजार गांवों में एक कर प्रणाली थी। जिस प्रकार जीएसटी में केन्द्रीयकृत व्यवस्था के अंतर्गत हर राज्य को एक दर से कर देना निर्धारित किया है। ठीक उसी तरह रानी दुर्गावती के शासन में लगभग 80 हजार गांव भी भाग देते थे। उस दौरान गौंडवाना में 52 गढ़ों के जरिए शासन होता था। जबलपुर केन्द्र था, अन्य क्षेत्रों में सागर, सिवनी, मंडला, छिंदवाड़ा, भोपाल नरसिंहपुर, दमोह, होशंगाबाद, बिलासपुर और नागपुर भी गढ़ों में सम्मिलित थे। कर्नल स्लीमन ने एक गढ़ में 750 गांवों की संख्या बताई है। जबकि अबुल फजल ने रानी के शासन में गांवों की संख्या 80 हजार लिखी है।


पहले हर रियासत जनता से अपने हिसाब से कर वसूलती थी। इसका निश्चित भाग राजा को दिया जाता था। कराधान कहीं ज्यादा तो कहीं कम था। वह रियासतदार के स्वभाव और मर्जी पर आधारित था। रानी दुर्गावती ने अपने शासनकाल में इसमें बदलाव किया। उन्होंने पूरे राज्य में एक जैसे कर की घोषणा की। यह कर राज दरबार पर केन्द्रित हो गया। एक समान कर प्रणाली के तहत राजा को जो कर मिलता था, उसका उचित हिस्सा रियासतों को दिया जाता था। इससे रियासतों की ज्यादती और कर की विसंगतियों पर लगाम लगी। गोंडवाना में विपुल पशुधन और उन्नत कृषि थी यहाँ का मोटा अनाज (मिलेट्स) पूरे भारत में हुआ। वहीं वस्त्र उद्योग, काष्ठ उद्योग, जड़ी बूटियों से तैयार औषधि उद्योग और शस्त्र उद्योग को बढ़ावा दिया गया। वनांचल में रहने वालों को लाख, औषधि निर्माण, शहद, चार-चिरोंजी और गोंद उद्योग को बढ़ाया गया। नगरीय क्षेत्र में आम, जामुन सीताफल और अमरुद के बगीचे विकसित किए. तो ग्रामीण क्षेत्रों में साल, सागौन, खैर, तेंदू और महुआ आदि का संरक्षण और रोपण हुआ। जल संसाधन विकसित किए गए जिससे मत्स्य और सिंघाड़ा उद्योग उन्नत हुआ। रानी दुर्गावती के समय गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग बनाने में कर प्रणाली और आर्थिक नीतियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।


———गढ़ा बना लघु काशी- वृंदावन और सनातन का केन्द्र—उन दिनों उत्तर – मध्य भारत का हिन्दुओं का धार्मिक केंद्र बिंदु था, जहाँ कोई भी हिन्दू अपनी इच्छानुसार धार्मिक अनुष्ठान कर सकता था, श्रीमद् वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ का आगमन देवताल (गढ़ा) में अक्सर होता था। रानी दुर्गावती के आग्रह पर 3 वर्ष विट्ठलनाथ गढ़ा में ही रहे। यहीं बैठकजी के मंदिर का निर्माण किया गया जहाँ पर शुद्धाद्वैत नियमों से पूजा होती थी, इसलिए इस स्थान को लघुकाशी वृंदावन कहा जाता था। रानी दुर्गावती के समय ही यहाँ राधा – वल्लभ संप्रदाय पल्लवित हुआ। गढ़ा के चतुर्भुज दास और दामोदर दास इस संप्रदाय में अग्रणी थे। इसलिए कहा गया है कि “हरिवंश चरण बल चतुर्भुज, गोंड देश तीरथ किए”।
रानी दुर्गावती ने माला देवी के मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और कुल देवी के रुप में शिरोधार्य किया। नवरात्र पर्व धूमधाम से मनाया जाता था। माँ त्रिपुर सुंदरी बूढ़ी खेरदाई, बड़ी खेरमाई और शारदा देवी के मंदिर आज भी सुप्रसिद्ध हैं।


——*नारी शिक्षा के लिए प्रथम गुरुकुल व गोलकी मठ का संरक्षण तथा कौशल विकास का प्रबंधन *—————–
रानी दुर्गावती ने नारी सशक्तिकरण की दिशा में श्लाघनीय कार्य किये हैं। स्त्रियों को शास्त्र और शस्त्र की शिक्षा देने के उद्देश्य से गढ़ा में विट्ठलनाथ के प्रवास के दौरान ही रानी दुर्गावती ने देवताल के पास पचमठा में स्त्रियों के लिए प्रथम गुरुकुल स्थापित कराया था, जिसमें स्वयं स्वामी विट्ठलनाथ ने स्त्रियों को शिक्षा प्रदान की थी। यहाँ दामोदर ठाकुर, अधार सिंह, कीकर सिंह पानीकार, पद्मनाभ भट्टाचार्य तथा लोंगाक्षि जैंसे विद्वानों ने अध्यापन कार्य किया है।स्त्रियों के लिए एक सैन्य पाठशाला भी स्थापित की गई थी। कौशल विकास केन्द्र स्थापित किए गए थे जिनमें उद्यमिता और कुटीर उद्योग को बढ़ाने के लिए कक्षाएं होती थीं। रानी दुर्गावती ने भेड़ाघाट में स्थित भारत के प्रसिद्ध कलचुरि कालीन तांत्रिक विश्वविद्यालय – गोलकी मठ का जीर्णोद्धार कराया जहां संस्कृत, प्राकृत और पालि भाषा में शिक्षा प्राप्त होती थी।


———–* विश्व का अद्भुत एवं अद्वितीय जल प्रबंधन तथा पर्यावरण संरक्षण*——- जल प्रबंधन और पर्यावरण की दृष्टि से वीरांगना रानी दुर्गावती की योजनाएं आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं जितनी उस काल में थीं। यूँ तो अपने साम्राज्य में 1000 तालाब और 500 बावलियों का निर्माण कराया था परंतु जबलपुर में 52 सरोवर (तालाब) और 40 बावलियों का अद्भुत एवं अद्वितीय प्रबंधन किया गया था। सरोवर 3 प्रकार के होते थे प्रथम – शिखर सरोवर – पहाड़ी सरोवर थे जो वनस्पतियों और वन्य जीवों की रक्षा के लिए थे। द्वितीय – तराई सरोवर – पहाड़ियों की तराई में जल संग्रहण हेतु बनाये गये थे। तृतीय – नगरीय सरोवर थे। तीनों प्रकार के सरोवर भूमिगत नहरों द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए थे, इस योजना को पंचासर योजना के नाम से जाना जाता है। जल संवर्धन के लिए वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग किया गया और भूजल विशेषज्ञ कीकर सिंह पानीकार का नाम उल्लेखनीय है। जल प्रबंधन और पर्यावरण की दृष्टि से गोंडवाना साम्राज्य की व्यवस्थाएं संपूर्ण विश्व में अद्भुत एवं अद्वितीय रही हैं। गोंडवाना के महान् राजा संग्राम शाह ने महान् भूजल विशेषज्ञ कीकर सिंह पानीकार के सहयोग से जल शोधन और प्रबंधन की अनोखी प्रणाली को विकसित किया था।

जल प्रबंधन के अंतर्गत 3 प्रकार के तालाब निर्मित किए गए थे और उनको पंचसर (पंचासर) प्रणाली के अंतर्गत भूमिगत नहरों से जोड़ा गया था। पंचसर का तात्पर्य एक तालाब से 5 तालाबों का जुड़ाव था उसके बाद अन्य तालाब जुड़ते थे। यह योजना संग्राम सागर से प्रारंभ हुई थी। संग्राम सागर से सगड़ा ताल, बाल सागर, कोलाताल, देवताल और सूपाताल क्रमशः जुड़े हुए थे। तदुपरांत इन तालाबों से अन्य तालाब भूमिगत नहरों से जुड़े थे।इसलिए उन दिनों जबलपुर को जलहलपुर के नाम से भी जाना जाता था। संग्राम सागर स्थित महल 5 मंजिला था परंतु अब जीर्ण – शीर्ण हो गया है। भूतल पर 32 कमरों के बीच में एक विशाल कक्ष था जहाँ मंत्रिपरिषद की बैठक होती थीं।

मदन महल से भूमिगत चार सुरंग निकलती थीं, जिसमें एक सुरंग महल में खुलती थी, जिसे आम खास कहा जाता है।तालाबों के निकट देवालयों और मठों की स्थापना की गई थी इसलिए तालाबों को अस्वच्छ करने वालों पर अर्थ दंड भी लगाया जाता था। यद्यपि बहुत से ताल तलैयों को पूर कर कालोनियां बना ली गईं इसलिए जल स्तर गिर गया है परंतु अभी भी चौंतीस तालाब विरासत के रुप में बचे हैं जिनमें से कुछ संरक्षित हो गए हैं शेष होना है। उपरोक्तानुसार स्वर्ण युग के लिए आवश्यक सभी प्रतिमानों के आलोक में सिंहावलोकन करने पर यही प्रमाणित होता है कि यह काल गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग था।

—-*क्रौंच व्यूह और अर्द्धचंद्र व्यूह बनाकर करती थीं दुश्मन का सामना-युद्ध नीति और सैन्य संगठन *—————
रानी दुर्गावती की युद्ध नीति और कूटनीति विलक्षण थी, जिसकी तुलना काकतीय वंश की वीरांगना रुद्रमा देवी और फ्रांस की जान आफ आर्क को छोड़कर विश्व की अन्य किसी वीरांगना से नहीं की जा सकती है।युद्ध के 9 पारंपरिक युद्ध व्यूहों क्रमशः वज्र व्यूह, क्रौंच व्यूह, अर्धचन्द्र व्यूह, मंडल व्यूह, चक्रशकट व्यूह, मगर व्यूह, औरमी व्यूह, गरुड़ व्यूह, और श्रीन्गातका व्यूह से परिचित थीं। इनमें क्रौंच व्यूह और अर्द्धचंद्र व्यूह में सिद्धहस्त थीं। क्रौंच व्यूह रचना का प्रयोग ,जब सेना ज्यादा होती थी, तब किया जाता था जिसमें क्रौंच पक्षी के आकार के व्यूह में पंखों में सेना और चोंच पर वीरांगना होती थीं और शेष अंगों पर प्रमुख सेनानायक होते थे। वहीं दूसरी ओर जब सेना छोटी हो और दुश्मन की सेना बड़ी हो तब अर्द्धचंद्र व्यूह रचना का प्रयोग किया जाता था, जिससे सेना एक साथ ज्यादा से ज्यादा जगह से दुश्मन पर मार सके।

वीरांगना की रणनीति अकस्मात् आक्रमण करने की होती थी। रानी दुर्गावती दोनों हाथों से तीर और तलवार चलाने में निपुण थीं। गोंडवाना साम्राज्य की सत्ता संभालने के कुछ दिन बाद ही गढ़ों की संख्या 52 से बढ़कर 57 हो गई थी और परगनों की संख्या भी 57 हो गई थी । वीरांगना ने एक बड़ी स्थायी और सुसज्जित सेना तैयार की, जिसमें 20 हजार अश्वारोही एक सहस्र हाथी और प्रचुर संख्या में पदाति थे। तत्कालीन भारत में गोंडवाना साम्राज्य प्रथम साम्राज्य था, जहां महिला सेना का भी दस्ता था और रानी दुर्गावती की बहिन कमलावती और पुरागढ़ की राजकुमारी कमान संभालती थीं।


—–*16 बड़े युद्ध सहित 52 युद्धों में से 51 में अपराजेय रहीं *- – – – वीरांगना रानी दुर्गावती के शौर्य, साहस एवं पराक्रम के संबंध में प्रकाश डालते हुए तथाकथित छल समूह के इतिहासकारों ने कुल 4 युद्धों का टूटा-फूटा वर्णन कर इतिश्री कर ली है, जबकि वीरांगना ने 16 बड़े युद्ध (छुटपुट युद्धों को छोड़कर) लड़े। 16 युद्धों में से 15 युद्धों विजयी रहीं, जिसमें 12 युद्ध मुस्लिम आक्राताओं से लड़े गये, उसमें से भी 6 मुगलों के विरुद्ध लड़े गये। वैंसे गोंडवाना में प्रचलित है कि छोटे – बड़े सभी युद्धों की बात की जाए तो वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपने जीवनकाल में 52 युद्ध लड़े थे जिसमें 51 युद्धों में उन्होंने विजय प्राप्त की थी। पिता राजा कीरतसिंह के साथ मिलकर, हनुमान द्वार का युद्ध, गणेश द्वार का युद्ध, लाल दरवाजा का युद्ध, बुद्ध भद्र दरवाजा का युद्ध (कालिंजर का किला- अब कामता द्वार,पन्ना द्वार, रीवा द्वार हैं)लड़े गये जिसमें विजयश्री प्राप्त की।


—–*मांडू के शासक बाजबहादुर को घर तक खदेड़ा *—–गोंडवाना की साम्राज्ञी के रुप में सत्ता संभालते ही मांडू के अय्याश शासक बाजबहादुर ने विधवा महिला जानकर गोंडवाना साम्राज्य दो बार आक्रमण किए परंतु रानी दुर्गावती ने दोनों बार जम कर दुर्गति कर डाली। प्रथम आक्रमण में वीरांगना रानी दुर्गावती ने बाजबहादुर के चाचा फतेह खां को द्वंद्व युद्ध में मार डाला और द्वितीय आक्रमण में बाजबहादुर को मांडू राजधानी घर तक खदेड़ा। बाजबहादुर जीवन भर शरणागत रहा। आगे मालवा के सूबेदार शुजात खाँ की कभी हिम्मत नहीं हुई। शेरखान (शेरशाह) कालिंजर अभियान में मारा गया। कुछ दिनों बाद मुगलों ने पानीपत के द्वितीय युद्ध के उपरांत पुनः सत्ता हथिया ली और अकबर शासक बना। शीघ्र ही उसने येन केन प्रकारेण साम्राज्य विस्तार करना आरंभ कर दिया।


——-*वीरांगना रानी दुर्गावती का निर्भय संदेश और तिलमिला गया अकबर *——-
रानी दुर्गावती के गोंडवाना साम्राज्य की संपन्नता और समृद्धि की चर्चा कड़ा और मानिकपुर के सूबेदार आसफ खान द्वारा मुगल दरबार में की गई । धूर्त, लंपट और चालाक अकबर लूट और विधवा रानी को कमजोर समझते हुए बदनीयती से बलात् गोंडवाना साम्राज्य हथियाने के उद्देश्य से रानी को आत्मसमर्पण के लिए धमकाया और अपने दूत से यह परवाना लिख कर भेजा कि
“अपनी सीमा राज की, अमल करो परमान। भेजो नाग सुपेत सोई, अरु अधार दीवान।


परंतु गोंडवाना की निर्भीक, स्वाभिमानी, स्वतंत्र प्रिय और स्व की प्रतिमूर्ति वीरांगना रानी दुर्गावती नहीं मानी। तब अकबर का एक और संदेश आया कि स्त्रियों का काम रहंटा कातने का है, तो रानी ने जवाब में अपने संदेश के साथ एक सोने का पींजन भेजा और कहा कि आपका भी काम रुई धुनकने का है। अकबर तिलमिला गया और उसने आसफ खान को गोंडवाना साम्राज्य की लूट और उसके विनाश के लिए रवाना किया। इसके पूर्व अकबर ने दो गुप्तचरों क्रमशः गोप महापात्र और नरहरि महापात्र को भेजा परंतु वीरांगना ने दोनों को अपनी ओर मिला लिया। उन्होंने अकबर की योजना और आसफ खाँ के आक्रमण के बारे में रानी दुर्गावती को सब कुछ बता दिया।


—–*वीरांगना रानी दुर्गावती के मुगलों से 6 भीषण युद्ध *——–वीरांगना रानी दुर्गावती सतर्क हो गईं और सिंगौरगढ़ में मोर्चा बंदी कर ली। आसफ खान 6 हजार घुड़सवार सेना 12 हजार पैदल सेना एवं तोपखाने तथा स्थानीय मुगल सरदारों के साथ सिंगोरगढ़ आ धमका। इधर रानी दुर्गावती के साथ, उनके पुत्र वीर नारायण सिंह, अधार सिंह, हाथी सेना के सेनापति अर्जुन सिंह बैस, कुंवर कल्याण सिंह बघेला, चक्रमाण कलचुरि, महारुख ब्राह्मण, वीर शम्स मियानी, मुबारक बिलूच, खान जहान डकीत, महिला दस्ता की कमान रानी दुर्गावती की बहन कमलावती और पुरा गढ़ की राजकुमारी (वीर नारायण सिंह की होने वाली पत्नी) संभाली। अविलंब युद्ध आरंभ हो गया।

सिंगोरगढ़ का प्रथम युद्ध*- आसफ खान ने आत्मसमर्पण के लिए कहा, वीरांगना दुर्गावती ने कहा कि किसी शासक के नौकर से इस संदर्भ में बात नहीं की जा सकती है। वीरांगना रानी दुर्गावती ने भयंकरआक्रमण किया, मुगलों के पैर उखड़ गये आसफ खान भाग निकला।
सिंगौरगढ़ का द्वितीय युद्ध – प्रथम युद्ध की तरह पुनः मुगलों के वही हाल हुए, लेकिन मुगलों का तोपखाना पहुंच गया और रानी को जानकारी लग गयी उन्होंने गढ़ा में मोर्चा जमाया और सिंगोरगढ़ छोड़ दिया।

*सिंगौरगढ़ का तृतीय युद्ध – सेनानायक अर्जुन सिंह बैस ने मुगलों के पैर उखाड़ दिए परंतु मुगलों का तोपखाना भारी पड़ गया। इसलिए सिंगोरगढ़ का किला एक रणनीति के अंतर्गत छोड़ दिया गया। चंडाल भाटा (अघोरी बब्बा) का युद्ध – यह चौथा युद्ध था जिसका उद्देश्य मुगल सेना को पीछे हटाना था ताकि वीरांगना रानी दुर्गावती गढ़ा से बरेला के जंगलों की ओर निकल जाए।

चंडाल भाटा के मैदान में घमासान युद्ध हुआ और सेनानायक अर्जुन सिंह बैस ने आसफ खाँ को बहुत पीछे तक खदेड़ दिया। वीरांगना ने तोपखाने से निपटने के लिए एक शानदार रणनीति बनायी जिसके अनुसार बरेला (नर्रई) के सकरे और घने जंगलों के मध्य मोर्चा जमाया ताकि तोपों की सीधी मार से बचा जा सके। गौर नदी का युद्ध -गौर नदी पर आसफ खान ने तोपखाना ले जा के लिए पुल का निर्माण करवाया, जिसे ध्वस्त करने के लिए गये महारथी अर्जुन सिंह बैस लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। वीरांगना रानी दुर्गावती के जीवन के 15वें बड़े और मुगलों से 5वें युद्ध में 22 जून 1564 को स्वतंत्रता,स्वाभिमान और शौर्य की देवी – विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती ने,प्रात:सेनानायक अर्जुन सिंह बैस के बलिदान होने का समाचार मिलते ही “अर्द्धचंद्र व्यूह”बनाते हुए “गौर नदी के युद्ध” में आसफ खाँ सहित मुगलों की सेना पर भयंकर आक्रमण किया और पुल तोड़ दिया ताकि तोपखाना नर्रई (बरेला) न पहुँच सके।

मुगल सेना तितर-बितर बितर हो गई जिसको जहां रास्ता मिला भाग निकला। वीरांगना रानी दुर्गावती ने पुन:रात्रि में आक्रमण की योजना बनाई परंतु सरदारों की असहमति के कारण निर्णय बदलना पड़ा। यहीं भारी चूक हो गई, यदि रात्रि में आक्रमण होता तो इतिहास कुछ और ही होना था। —-नर्रई के घमासान युद्ध और स्व के लिए वीरांगना का प्राणोत्सर्ग———– अंततः वीरांगना ने नर्रई की ओर कूच किया और युद्ध के लिए “क्रौंच व्यूह” रचना तैयार की.।23 जून 1564 को नर्रई में प्रथम मुठभेड़ हुई, रानी और उनके सहयोगियों ने मुगलों की की दुर्गति कर डाली ।आसफ खान सहित मुगल सेना भाग निकली और डरकर बरेला तक निकल गई । 23 जून की रात तक तोपखाना गौर नदी पार कर बरेला पहुंच गया। 23 जून की रात को घातक षड्यंत्र हुआ।

.आसफ खान ने रानी के एक छोटे सामंत बदन सिंह को घूस देकर मिला लिया। उसने रानी की रणनीति का खुलासा कर दिया कि कल युद्ध में रानी मुगलों को घने जंगलों की ओर खींचेगी जहाँ तोपखाना कारगर नहीं होगा और सब मारे जाएंगे। आसफ खान डर गया उसने उपचार पूंछा, तब बदन सिंह ने बताया कि नर्रई नाला सूखा पड़ा है और उसके पास पहाड़ी सरोवर है जिसे यदि तोड़ दिया जाए तो पानी भर जाएगा और रानी नाला पार नहीं कर पाएगी और तोपों की मार सीधा पड़ेगी।उधर रात में रानी को अनहोनी का अंदेशा हुआ, उन्होंने सरदारों से रात में ही हमले का प्रस्ताव रखा पर सरदार नहीं माने ! यदि मान जाते तो इतिहास कुछ और ही होता। अंततोगत्वा युद्ध की अंतिम घड़ी समीप आ ही गयी। वीरांगना रानी दुर्गावती ने “क्रौंच व्यूह” रचा। सारस पक्षी के समान सेना जमाई गई। चोंच भाग पर रानी दुर्गावती स्वयं और दाहिने पंख पर युवराज वीरनारायण और बायें पंख पर अधारसिंह खड़े हुए। 24 जून 1564 को प्रातः लगभग 10 बजे भयंकर मोर्चा खुल गया और घमासान युद्ध प्रारंभ हुआ पहले हल्ले में मुगलों के पांव उखड़ गए।

मुगलों ने 3 बार आक्रमण किये और तीनों बार गोंडों ने जमकर खदेड़ा, इसलिए मुगलों ने तोपखाना से मोर्चा खोल दिया। रानी दुर्गावती ने योजना अनुसार घने जंगलों की ओर बढ़ना प्रारंभ किया परंतु बदन सिंह की योजना अनुसार पहाड़ी सरोवर तोड़ दिया गया। नर्रई में बाढ़ जैसी स्थिति बन गयी, अब वीरांगना घिर गयी। इसी बीच अपरान्ह लगभग 3 बजे वीरनारायण के घायल होने की खबर आई परंतु वीरांगना रानी दुर्गावती तनिक भी विचलित नहीं हुई। आंख में तीर लगने के बाद भी युद्ध जारी रखा, मुगल सेना के बुरे हाल थे परंतु अचानक रानी को एक तीर गर्दन पर लगा रानी ने तीर तोड़ दिया। हाथी सरमन के महावत को अधार सिंह पीछे हटने का आदेश दिया परंतु रानी समझ गयी थी कि अब वो नहीं बचेंगी! अत: अधार सिंह को उन्होंने स्वयं को मार देने का आदेश दिया परंतु अधार सिंह ने वीरांगना को मारने से मना कर दिया।

वीरांगना रानी दुर्गावती, अधार सिंह से यह कहते हुए कि “मृत्यु तो सभी को आती है अधार सिंह, परंतु इतिहास उन्हें ही याद रखता है जो स्वाभिमान के साथ जिये और मरे”, युद्ध के गोल में समा गयीं और लगभग 150 मुगल सैनिकों का वध करते हुए, भीषण युद्ध किया जब उनको मूर्छा आने लगी तो उन्होंने अपनी कटार से प्राणोत्सर्ग किया। वहीं सेनापति अधार सिंह के नेतृत्व में कल्याण सिंह बघेला, चक्रमाण कलचुरि और महारुख ब्राम्हण ने युद्ध जारी रखा और वीरांगना के पवित्र शरीर को सुरक्षित किया तथा युवराज वीर नारायण सिंह को रणभूमि से सुरक्षित भेज कर अपनी पूर्णाहुति दी।

इस युद्ध में वीरांगना के पक्ष से लगभग 700 सैनिकों का बलिदान हुआ जबकि मुगल सेना से लगभग 2000 सैनिक मारे गए। युवराज वीरनारायण सिंह ने वीरांगना रानी दुर्गावती का अंतिम संस्कार कर चौरागढ़ में सेनापति अधार सिंह के साथ मुगलों के विरुद्ध मोर्चा जमाया, जहाँ मुगलों के विरुद्ध चौरागढ़ ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया।

—-वीरांगना रानी दुर्गावती की समाधि और कर्नल स्लीमन का नत मस्तक होना ———जबलपुर के समीप बरेला, ग्राम पंचायत-पिपरिया खुर्द, बारहाग्राम में स्थित नर्रई की युद्ध भूमि में वीरांगना रानी दुर्गावती का समाधि स्थल है। रानी दुर्गावती की समाधि स्थल पर सफेद पत्थर की कंकरी डालकर आदरांजलि प्रथा थी। कर्नल स्लीमन स्वयं समाधि स्थल के दर्शनार्थ पहुंचे थे तो उन्होंने भी नतमस्तक होते हुए भावुक होकर एक सफेद कंकर अर्पित किया था। उन्होंने रानी दुर्गावती को भारत की महानतम वीरांगना के रुप स्वीकार किया। कर्नल स्लीमन ने भी रानी दुर्गावती पर अच्छा इतिहास लिखा है।

————-वीरांगना की समाधि बनी स्वाधीनता संग्राम का पवित्र तीर्थ *———–जबलपुर में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न आंदोलनों का शुभारंभ रानी दुर्गावती की समाधि स्थल से ही हुआ। इतिहास के पन्नों को पलटें तो उल्लेख मिलता है कि गाँधी जी ने जब नमक कानून तोड़ा तब इसे लेकर जबलपुर में भी प्रतिक्रिया आरंभ हो गई। सेठ गोविंददास और पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र सहित अनेक सत्याग्रहियों को साथ लेकर 6अप्रैल 1930 को रानी दुर्गावती की समाधि नर्रई नाला गए और वहां पर प्रण किया कि जब तक पूर्ण स्वराज्य प्राप्त नहीं कर लेंगे, तब तक आंदोलन बंद नहीं करेंगे।

सेठ गोविंददास और पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र तो रात में गौर नदी के किनारे विश्राम करते रहे, परंतु 6 अप्रैल को जब समाधि स्थल पहुंचे तो हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी वहीं रामनवमी के दिन सबने शपथ ली कि जब तक देश को विदेशी शासन से मुक्त नहीं करा लेंगे, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे।


नर्रई से रानी दुर्गावती की समाधि से पवित्र माटी का कलश लेकर सभी आंदोलन स्थल तिलक भूमि तलैया पहुंचे। यहाँ 8 अप्रैल 1930 को मुंबई से लाए गए पानी से नमक बनाकर कानून को तोड़ा गया। तदुपरांत सुंदरलाल तपस्वी की पुस्तक प्रतिबंधित पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ में के कि कुछ अध्याय पढ़कर सुनाए गए तो पुलिस हरकत में आई और उसी रात सेठ गोविंददास, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र, माखनलाल चतुर्वेदी तथा विष्णुदयाल भार्गव, ब्योहार राजेंद्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया। वहीं सदर में सेना को भड़काने के आरोप में पंडित बालमुकुंद त्रिपाठी को सर्वाधिक लंबी सजा सुनाई गयी। प्रमुख नेताओं के गिरफ्तार हो जाने के कारण जन साधारण के प्रतिनिधियों ने मोर्चा संभाला और प्रतिदिन एक व्यक्ति अधिनायक चुना जाता था जिसके नेतृत्व में सत्याग्रह अनवरत् चलता रहा।


जबलपुर नगर समुद्र के निकट न होने के कारण यहां नमक सत्याग्रह आगे नहीं बढ़ पा रहा था। ऐसे में शासन से विरोध प्रगट करने के लिए, नए तरीके अपनाए गए। वस्तुतः पं. द्वारका प्रसाद मिश्र जंगल सत्याग्रह के प्रणेता थे। इसके अंतर्गत जंगल सत्याग्रह नामक एक नए आंदोलन की शुरुआत की गई। इसके अंतर्गत लिए युवा सत्याग्रही जबलपुर के निकट रानी दुर्गावती समाधि से जंगलों में जाते और सरकारी नियमों का उल्लंघन कर पेड़ों को काटते और अपनी गिरफ्तारी देते थे। अतः वीरांगना रानी दुर्गावती का समाधि स्थल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पवित्र तीर्थ है। इसलिए जबलपुर के उत्कृष्ट कवि श्रीयुत नर्मदा प्रसाद खरे वीरांगना रानी दुर्गावती के लिए ये पंक्तियाँ कितनी सार्थक हैं कि “आसफ खां से लड़कर तूने, अमर बनाया कोसल देश। अमर रहेगी रानी तू भी, अमर रहे तेरा संदेश।”


विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती का व्यक्तिव और कृतित्व सनातन धर्म में नारी शक्ति की मीमांसा का पर्याय है। ऋग्वेद के देवी सूक्त में माँ आदिशक्ति स्वयं कहती हैं,”अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां,अहं रूद्राय धनुरा तनोमि “अर्थात् मैं ही राष्ट्र को बांधने और ऐश्वर्य देने वाली शक्ति हूँ, और मैं ही रुद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूँ। हमारे तत्वदर्शी ऋषि मनीषा का उपरोक्त प्रतिपादन वस्तुत: स्त्री शक्ति की अपरिमितता का द्योतक है। यह शोध आलेख उन हिंदू वीरांगनाओं और समग्र नारियों को सादर समर्पित है,जो जीवन के संग्राम में स्व के लिए मां, बेटी, बहन, पत्नी के रुप में देश की रक्षा के लिए अनादि काल से पूर्णाहुति देती आ रही हैं और दे रहीं हैं जिनकी आस्था और समर्पण अटल है और उन्हें विपरीत परिस्थितियाँ भी हरा नहीं सकीं। हिन्दुओं में बेटी का जन्म एक परिवार, एक कुटुम्ब का जन्म है इसलिए मातृशक्ति हिंदुत्व का मूलाधार है।


यह अटल सत्य है कि व्यक्ति का जन्म साधारण ही होता है परंतु मृत्यु सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि मृत्यु के समय ही उसका आकलन होता है। कमजोर और भीरु व्यक्ति की मृत्यु पर इतिहास मौन हो जाता है, श्रद्धांजलि भी नहीं देता है परंतु जब स्व के लिए किसी धीर, वीर और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो इतिहास ऐंसी हुतात्माओं को अमर कर देता है, और इन सब में सबसे महत्वपूर्ण मृत्यु है, मातृभूमि के प्रति बलिदान!!! वीरांगना रानी दुर्गावती का बलिदान इस कोटि की उच्चतम पराकाष्ठा है। हिंदू धर्म में एक बेटी का जन्म शक्ति के अवतार के रूप में शिरोधार्य किया जाता है।


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डॉ. आनंद सिंह राणा, विभागाध्यक्ष इतिहास विभाग, श्री
जानकीरमण महाविद्यालय जबलपुर, उपाध्यक्ष, इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत

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