माँ धूमावती सनातन धर्म में सातवीं महासिद्धि (महाविद्या) के रुप में शिरोधार्य हैं। “ऊँ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा” माँ धूमावती का बीज मंत्र है। माँ सभी अपकारी तंत्रों मंत्रों और शक्तियों की विनाशक, मानव जाति के लिए सर्वाधिक कल्याण कारी और अपराजेय बनाने वाली देवी हैं। इनके दर्शन ही पर्याप्त होते हैं।
माँ धूमावती का प्राकट्य इस प्रकार हुआ कि माता पार्वती ने क्षुधातुर होकर शिव को निगल लिया पर इससे क्षुधा तो शांत हो गयी परंतु शिव के विष के प्रभाव से पार्वती के श्रीमुख से भयंकर धुआं निकला और शरीर भयानक हो गया, शिव के आशीर्वाद से यही स्वरूप मां” धूमावती “के रुप में पूजित हुआ। दक्षप्रजापति के यहाँ सती का भौतिक स्वरूप नष्ट हुआ पर उत्पन्न धुऐं में सती मां धूमावती के रुप में विद्यमान रहीं। शास्त्रों के अनुसार पीपल का वृक्ष में निवास करती हैं और कौआ (कौवा) उनका वाहन है।
विधवाओं की प्रमुख आराध्य देवी हैं। दतिया में पीताम्बरा पीठ में माँ बगलामुखी के साथ माँ धूमावती विराजमान हैं। जबलपुर में चार खंबा में स्थित “बूढ़ी खेरमाई के रुप में माँ धूमावती शिरोधार्य हैं। यह प्रतिमा 1500 वर्ष पुरानी है तथा गोंडवाना की विरासत है। दस में से सातवीं महासिद्धि माँ धूमावती को काल्हप्रिया देवी, उग्र तारा देवी के रुप में जाना जाता है। प्रलय काल में सबका विनाश होता है| केवल धूमावती देवी ही विद्यमान रहती हैं।
माँ धूमावती का प्राकट्य इस प्रकार हुआ कि माता पार्वती ने क्षुधातुर होकर शिव को निगल लिया पर इससे क्षुधा तो शांत हो गयी परंतु शिव के विष के प्रभाव से पार्वती के श्रीमुख से भयंकर धुआं निकला और शरीर भयानक हो गया, शिव के आशीर्वाद से यही स्वरूप मां” धूमावती “के रुप में पूजित हुआ। दक्षप्रजापति के यहाँ सती का भौतिक स्वरूप नष्ट हुआ पर उत्पन्न धुऐं में सती मां धूमावती के रुप में विद्यमान रहीं। शास्त्रों के अनुसार पीपल का वृक्ष में निवास करती हैं और कौआ (कौवा) उनका वाहन है।
इनकी साधना से जीवन में निडरता और निश्चिंतता आती है। इनकी साधना और प्रार्थना से आत्मबल का विकास होता है। इस महाविद्या के फल से देवी धूमावती सूकरी के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर साधक के सभी रोग अरिष्ट और शत्रुओं का नाश कर देती है। प्रबल महाप्रतापी तथा सिद्ध पुरूष के रूप में उस साधक की ख्याति हो जाती है।
मां धूमावती महाशक्ति स्वयं नियंत्रिका हैं। ऋग्वेद में रात्रिसूक्त में इन्हें ‘सुतरा’ कहा गया है। अर्थात ये सुखपूर्वक तारने योग्य हैं। इन्हें अभाव और संकट को दूर करने वाली मां कहा गया है। सप्तम महाविद्या माँ
धूमावती का मंत्र :
मोती की माला से नौ माला
‘ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:।’
इतिहास गवाह है कि सन् 1962 के भारत – चीन युद्ध में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु जी और उनके सहयोगियों ने भी पीताम्बरा पीठ में तांत्रिक पूजा और यज्ञ कराया था, तब जाकर युद्ध विराम हुआ था। विधवाओं की आराध्य देवी होने के कारण वीरांगना रानी दुर्गावती विधवा होने के उपरांत माँ धूमावती(बूढ़ी खेरमाई जबलपुर) की शरण में चली गई थीं।