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जनक्रांति के प्रणेता : संत गुरु घासीदास

गुरु घासीदास का संपूर्ण जीवन संघर्ष पूर्ण रहा। उस समय देश में सामंती प्रथा व्याप्त थी। पूरा देश अंग्रेजी शासन के अधीन था। जनता शोषित और पीड़ित थी। दलित समाज में विचित्र छटपटाहट थी। विचार अभिव्यक्ति की स्वतंतत्रा तो दूर की बात, लोगों को रोटी-कपड़े के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा था। आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक उत्पीड़न से मुक्त समतामूलक समाज की स्थापना परिकल्पना से बाहर थी। शोषित, पीड़ित और उपेक्षित समाज भी जातियों में बँटा हुआ था। लोग छुआछूत, धर्म, परंपराओं के बाह्य आडंबर में फँसे हुए थे।

अन्याय के विरुद्ध संघर्घ करने की क्षमता किसी में न थी और ऐसा कोई सामाजिक संगठन और नेता भी नहीं था, जो तत्कालीन उपेक्षित समाज में चेतना पैदा करे और शोषण के विरूद्ध संघर्ष को जन्म दे। तात्कालीन उपनिवेशवादी, साम्राज्यवादी, सामंतशाही समाज से कैसे मुकाबला करें, समझ से परे था। आततायी निरंकुश हो रहे थे। इस विषमतामूलक समाज में समता की बात बेमानी थी। सामाजिक परिवर्तन लाना अकल्पनीय था। इन परिस्थितियों में एक प्रेरणास्पद, व्यक्तित्व का उदय हुआ, जिन्हें हम गुरु घासीदास के नाम से जानते हैं।

गुरु घासीदास का जन्म 18 दिसम्बर सन् 1756 में गिरौधपुरी नामक गाँव में हुआ। यह गाँव वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य के बलौदाबाजार जिले में है। गुरु घासीदास के पिता का नाम महंगू दास और माता का नाम अमरौतिन था। उनका जन्म एक सामान्य श्रमिक कृषक परिवार में हुआ। उस समय शिक्षा के प्रति जागरूकता के अभाव के कारण घासीदास की स्कूली शिक्षा नहीं हो पाई, किन्तु परिवार के माध्यम से उन्हें अनौपचारिक शिक्षा मिली। शिक्षा का संबंध विषयवस्तु के ज्ञान से अधिक आत्मिक चेतना से है। इस दृष्टि से घासीदास बड़े समृद्ध थे। बाल्यावस्था से ही अत्यन्त संवेदनशील होने के कारण वे अन्य बच्चों से काफी अलग थे।

बाल्यावस्था में ही वे जिस ढंग से बात-व्यवहार करते थे, उसे उस समय का समाज अलग ही दृष्टि से देखता था। उनके आसपास के बच्चे व उनके भाई-बहन भी उन्हें अलग मानते थे। उनके मन में बाल्यकाल से ही वैराग्य का भाव था। उनमें  सत्य के प्रति अटूट आस्था थी, वे सात्विक जीवन जीने पर विश्वास करते थे। बचपन से ही छुआछूत, ऊँच-नीच, झूठ-कपट आदि बुराइयों से वे पूरी तरह मुक्त थे। उनका पूरा विश्वास भाई-चारा और समता मूलक समाज पर था। समाज में फैली विषमता से उनका मन बड़ा खिन्न था। जैसे-जैसे उनकी अवस्था बढ़ती गई वे अध्यात्म की ओर अभिमुख होते गए, त्याग और तपस्या के मार्ग पर आगे बढ़ते गए।

सात्विक भावना की पराकाष्ठा होने के कारण उनकी अराधना अत्यंत प्रबल हुई और वे दाशर्निकों की तरह विचार व्यक्त करने लगे।  इन सबका प्रभाव यह हुआ कि उनके आसपास के लोग उन्हें चमत्कारी और अवतारी पुरुष मानने लगे, परन्तु घासीदास के मन में तो एक अलग ही चिंता थी कि समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव से उसे कैसे मुक्त किया जाए। वे इस तरह के अनान्य प्रश्नों के हल और सत्य की खोज के लिए गिरौधपुरी के जंगल में ‘छाता पहाड़’ पर समाधि लगाने चले गए। उन्होंने सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लंबी तपस्या की और उन्हें अंत में उन्हें आत्म ज्ञान की प्राप्ति हुई।

गुरु घासीदास ने अपने आत्मचिंतन और तपस्या के बल पर समाज सुधार के लिए कुछ सिद्धांतों का प्रतिपादन किया उन्हें हम सप्त सिद्धांत कहते हैं। ये सात सिद्धांत स्वानुभव और जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर आधारित थे। ये सात सिद्धांत हैं :-

1.            सतनाम पर विश्वास

2.            मूर्तिपूजा का निषेध

3.            वर्ण भेद से परे

4.            हिंसा का विरोध

5.            परस्त्री गमन की वर्जना

6.            दोपहर में खेत न जोतना

7.            व्यवसन मुक्ति

गुरु घासीदास ने सतनाम को ही ईश्वर और प्रकृति का रूप माना। उनका कहना था कि ईश्वर सत्य है, निर्गुण और निराकार है। सत्य को आचरण में उतारो। सतनाम पर विश्वास करके हम मानव जीवन को सार्थक कर सकते हैं। बाह्य आडंबरों से बच सकते हैं। जब ईश्वर सत्य है और प्रकृति का रूप है, तब मुर्तिपूजा क्यों? मुर्तिपूजा आस्था का आडंबर है। ईश्वर अन्तस्थ है और सबसे परे। ईश्वर प्रकृति है और प्रकृति ही ईश्वर। सतनाम के अनुयायी जब यह गाते हैं-‘‘मंदिरवा मा का करेबर जइबोन, घर के देवे ला मनइबोन।’’ तो इसका सीधा अर्थ है, मंदिरों में मुर्तिपूजा आडंबर है। हम अपने भीतर बैठे आत्मतत्व को जानें  और उसी की आराधना करें, क्योंकि आत्मा रूप ईश्वर चेतन है।

गुरु घासीदास ने एक समता मूलक समाज की परिकल्पना की। ‘‘मनखे-मनखे एक समान’’। मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद कैसा? इसलिए उन्होंने वर्ण भेद से परे, समाज की स्थापना पर बल दिया, जो कि जाति विहीन और आत्म निर्भरता के सिद्धांत पर आधारित था। इसका निहितार्थ जातियों में बँटे हुए समाज को एक सुत्र में बाँधना और उन्नत समाज की स्थापना करना था। छुआछूत का भाव, ऊँच-नीच का व्यवहार मनुष्य को एक दूसरे से अलग करता है। इस सिद्धांत को दो महत्वपूर्ण पक्ष थे। 1. मनुष्य के भीतर चेतना पैदा करना और 2. जाति प्रथा समाप्त कर एक समतावादी समाज की स्थापना करना।

‘‘ईश्वर अंश नीव अविनाशी। चेतन, अमल, सहज सुख राशि।।’’

यदि जीव ईश्वर का अंश है तो मनुष्यों के बीच भेद क्यों? डॉ. हीरालाल शुक्ल अपनी पुस्तक- गुरु घासीदास का संघर्ष, समन्वय और सिद्धांत की भूमिका में लिखते हैं- ‘‘गुरु घासीदास दलितों की विपन्न स्थिति से बहुत दुखी थे। उच्च आध्यात्मिक विरासत संपन्न होने के बावजूद भी दलित शोषण के शिकार थे तथा उसका जीवन गुलामों से भी ज्यादा बदत्तर हो गया था।’’

छाता पहाड़

गुरु घासीदास के सिद्धांत वास्तव में जन आन्दोलन थे जिनके माध्यम से वे चेतना शून्य समाज को उद्वेलित करना चाहते थे। सतनाम आन्दोलन में लोगों को गृहस्थ त्यागने की प्रेरणा बिल्कुल नहीं थी, बल्कि गृहस्थ में रहकर सब कुछ पाना था। यह विचार पूर्णरूपेण प्रकृति के अनुरूप था। उनका दर्शन भौतिकता से दूर जाने की बातें नहीं करता बल्कि भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होने की ओर प्रेरित करता है।

गुरु घासीदास का सिद्धांत जीव हिंसा मत करो। हिंसा का विरोध प्राणीमात्र में समान भाव को देखना था। हिंसा के मार्ग की कभी भी समाज में स्वीकारोत्ति नहीं होती है। अहिंसा का भाव मन की उदारता को पुष्ट करता है। उदारमना व्यक्ति कभी हिंसा का पक्षधर नहीं होता। वह सदैव सब जीवों को एक ईश्वर की संतान के रूप में देखता है। इसीलिए गुरु घासीदास ने यह भी कहा कि ‘‘मांसाहार मत करो।’’ मांसाहार का सीधा संबंध जीव हत्या से है।

गुरु घासीदास का सिद्धांत ‘‘दोपहर में हल मत जोतो।’’ वास्तव में मन की करूणा है। दोपहर में कार्य करने में जब मनुष्य को पीड़ा होती है, तो पशुओं को भी होती होगी यह सिद्धांत पशुओं के प्रति प्रेम भाव को प्रकट करता है। उन्होंने जाति-पाँति के भेद भाव और छुआछूत के प्रपंचों से दूर रहने की शिक्षा दी। जाति, धर्म, और संप्रदाय मनुष्य को जोड़ते नहीं हैं, बल्कि दो हिस्सों में बाँटते हैं। मनुष्य को मनुष्य से अलग करना मनुष्यता का विरोध है। मानव प्रकृति से तो एक होता है, किन्तु ज्यों ही जाति, धर्म और संप्रदाय के आडंबर को ओढ़ लेता है, उसकी मानवीय संवेदना समाप्त हो जाती है। गुरु घासीदास ने धार्मिक कट्टरता को अमानवीयता के रूप में देखा और उन्होंने मनुष्यों के बीच की गहरी खाई को पाटने का उपक्रम किया। गुरु घासीदास के ये सिद्धांत उन्हें संत समुदाय में अलग खड़ा करतै हैं।

वे एक दूरदर्शी चिंतक थे। उनका यह कहना कि ‘‘पर स्त्री को माता माना’’ नारी जाति के प्रति पूर्ण सम्मान का भाव था। ऐसा सम्मान जो मनुष्य को देवत्व प्रदान करता है। भारतीय परंपरा में – 

‘‘यत्र नार्यवस्तु पूज्यत्ते रमन्ते तत्र देवता,

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।

जहाँ स्त्रियों की पूजा नहीं होती, उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ देवता निवास नहीं करते और वहाँ किए गए अच्छे कार्य निष्फल हो जाते हैं। गुरु घासीदास का यही चिंतन समाज में उनके सिद्धांतों की स्वीकारोत्ति बना। समाज उपदेशक की वाणी और व्यवहार की परख करता है और तभी उसके मन में विश्वास या अविश्वास के भाव पैदा होते हैं । यदि उपदेशक का मन वाणी और कार्य एक से  हैं तो अनुयायी उसके साथ चलने के लिए उठ खड़े होते हैं।

गुरु घासीदास जी ने कई व्यावहारिक सिद्धांत भी दिए जो मनुष्य को मानवीय आचरण करने के लिए प्रेरित करते हैं। जैसे चोरी मत करो, समाज को शिक्षित और संगठित करो, सभी धर्मों का आदर करो, सादा जीवन व्यतीत करो, हम सब एक ही सत पुरुष की संतान हैं, सतनाम धर्म का पालन गृहस्थ में रहकर किया जा सकता है। काम, क्रोध, मोह, लोभ का परित्याग करो, सत्य अहिंसा में मानवता निहित है, अंधविश्वासी और परंपरावादी मत बनो, विचार परिवर्तन और विचार क्रांति पर बल दो, अपनी व्यवस्था पर अटल रहो, जड़ नहीं चेतन मरता है, दुधारू प्राणी माँ की श्रेणी में आता है। प्रकृति के विरुद्ध आचरण मत करो, माता पिता और गुरु की आज्ञा का पालन करो आदि। ये सिद्धांत मात्र सिद्धांत नहीं थे बल्कि व्यावहारिक जीवन के लिए सर्वोत्तम आदर्श थे और यही सिद्धांत मानव समाज में चेतना जागृत करने में सहायक सिद्ध हुए। 

गुरु घासीदास का सतनाम आंदोलन मूल रूप में एक जनक्रांति था, जो वास्तव में सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक उत्पीड़न से मुक्ति का मार्ग दिखाती था और अमानवीयता, झूठी नैतिकता, धार्मिक पाखंडता और अंधविश्वास से बाहर निकालता था। यह आंदोलन दलित समाज को हीन भावना से उबारने और उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा करने में भी समर्थ रहा। उसके भीतर का भय दूर हुआ। समाज में सम्मान सूचक व्यवहार पाने के लिए राह बनी, कुरूतियों की जकड़न से मुक्ति और स्व का बोध हुआ। आज छत्तीसगढ़ को समतामूलक समाज के रूप में देखा जाता है। उसमें गुरु घासीदास के सतनाम आन्दोलन का बहुत बड़ा योगदान है।

गुरु घासीदास ही ऐसे पहले संत थे, जिन्होंने अपने उपदेश छत्तीसगढ़ी भाषा में दिए और वे ऐसे संत हुए जिन्होंने सत्य, अहिंसा, करूणा के भाव उदात्त रूप में प्रकट किए। उनके जीवन दर्शन और व्यक्तित्व को युगों तक चिर स्थायी बनाये रखने के लिए उनके जन्म स्थली गिरौधपुरी में कुतुब मीनार से भी ऊँचा जय स्तंभ का निर्माण छत्तीसगढ़ शासन द्वारा कराया गया है तथा सामाजिक चेतना और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कार्य करने के लिए “गुरु घासीदास सम्मान” की महती परंपरा को स्थापित किया गया है। 

आलेख

बलदाऊ राम साहू
वार्ड नं. 53 न्यू आदर्श नगर,
हॉटल सांई राम के पास
पोटिया चौक, दुर्ग (छ.ग.)
मो. 9407650458
br.ctd1958@gmail.com

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