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हरिहर मिलन का पर्व : बैकुंठ चतुर्दशी

सनातन धर्म मे बारह महीनों का अपना अलग अलग महत्त्व है लेकिन समस्त मासों में कार्तिक मास को अत्यधिक पुण्यप्रद माना गया है। इस माह मे स्नान, दान व दीपदान के अलावा समस्त प्रमुख तीज त्योहार होते है।

इस कार्तिक मास में बैकुंठ चतुर्दशी का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु जी के मिलन को दर्शाता है, इसलिए वैकुंठ चतुर्दशी को हरिहर का मिलन भी कहा जाता है।

ऐसा भी माना जाता है कि भगवान विष्णु चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) तक सृष्टि का सम्पूर्ण कार्यभार भगवान शिव को सौंपकर विश्राम करते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी देवशयनी के दिन भगवान विष्णु जब विश्राम में जाते है फिर भगवान शिव व उनके परिवार की पूजा आरम्भ हो जाती है।

सबसे पहले श्रावण मास शुरू हो जाता है जिसमें नागपंचमी में नाग की, स्कंद षष्ठी में कुमार कार्तिकेय जी की, पोला के दिन नन्दी बैल की, हरितालिका व्रत पार्वती जी की, फिर 11 दिन गणेश जी की पूजा, नवरात्रि देवी जी की, शरद पूर्णिमा में चंद्रदेव की पूजा आराधना होती है ।

इस तरह चार माह के बाद जब देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं तो जन मानस के द्वारा तुलसी जी के साथ अपनी पूजा स्वीकार करते है और तुलसी जी के साथ सबसे पहले देवाधिदेव महादेव का पूजन करने काशी जी जाते है।

इसीलिये वैकुण्ठ चतुर्दशी को हरिहर का मिलन कहा जाता हैं अर्थात भगवान शिव और विष्णु का मिलन। विष्णु एवं शिव के उपासक इस दिन को बहुत उत्साह से मनाते हैं। भगवान शिव और विष्णु का मिलन को देखकर सभी देवी-देवता इसकी ख़ुशी में देव दिवाली मनाते हैं।

काशी पहुँचते ही भगवान विष्णु मणिकर्णिका घाट पर स्नान करते है और एक हज़ार स्वर्ण कमल पुष्पों से भगवान विश्वनाथ के पूजन का संकल्प करते है। अभिषेक के बाद जब वे पूजन करने लगे तो शिवजी ने उनकी भक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से एक कमल पुष्प कम कर दिया। एक पुष्प की कमी देखकर विष्णु जी ने सोचा कि मेरी आंखें भी तो कमल के ही समान हैं। ऐसा सोचकर अपनी आंख चढ़ाने को उद्द्यत हुए ।

विष्णु जी की इस अगाध भक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव प्रकट होकर बोले- “हे विष्णु! तुम्हारे समान संसार में दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है। आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब वैकुण्ठ चतुर्दशी’ कहलाएगी और इस दिन व्रत पूर्वक जो पहले आपका पूजन करेगा, उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होगी। भगवान शिव ने इसी वैकुण्ठ चतुर्दशी को करोड़ों सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र, विष्णु जी को प्रदान करते हैं।

आज के दिन से ही भगवान को ”कमल नयन’ और ‘पुंडरीकाक्ष’ कहा जाता है। पूजन के बाद भगवान विष्णु, भगवान शिव को तुलसी पत्तियां प्रदान करते हैं और भगवान शिव, भगवान विष्णु को बेलपत्र देते है। अर्थात इस दिन शिव जी मे तुलसी मंजरी तथा विष्णु जी मे बिल्वपत्र चढ़ाया जाता है।

इसी दिन शिव जी तथा विष्णु जी कहते हैं कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहेंगें। मृत्युलोक में रहना वाला कोई भी व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह अपना स्थान वैकुण्ठ धाम में सुनिश्चित करेगा। भगवान शिव बैकुंठ चतुर्दशी के दिन ही भगवान विष्णु को सृष्टि का कार्यभार वापस सौंपते हैं

उज्जैन, वाराणसी में इस दिन को धूमधाम से मनाया जाता हैं। उज्जैन में भव्य आयोजन किया जाता हैं। शहर के बीच से भगवान की सवारी निकलती हैं, जो महाकालेश्वर मंदिर तक जाती हैं। इस दिन उज्जैन में उत्सव का माहौल चारो ओर रहता है। कार्तिक पूर्णिमा को काशी में देव दीवाली मनाने की परम्परा है, इसदिन रविदास घाट से लेकर राजघाट तक लाखों दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं।

माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन देवतागण दिवाली मनाते हैं व इसी दिन देवताओं का काशी में प्रवेश हुआ था। मान्यता है की तीनों लोको मे त्रिपुराशूर राक्षस का राज चलता था देवतागणों ने भगवान शिव के समक्ष त्रिपुराशूर राक्षस से उद्धार की विनती की।

भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन राक्षस का वध कर उसके अत्याचारों से सभी को मुक्त कराया और त्रिपुरारि कहलाये। इससे प्रसन्न देवताओं ने स्वर्ग लोक में दीप जलाकर दीपोत्सव मनाया था तभी से कार्तिक पूर्णिमा को देवदीवाली मनायी जाने लगी।

काशी में देवदीवाली उत्सव मनाये जाने के सम्बन्ध में मान्यता है कि राजा दिवोदास ने अपने राज्य काशी में देवताओं के प्रवेश को प्रतिबन्धित कर दिया था, कार्तिक पूर्णिमा के दिन रूप बदल कर भगवान शिव काशी के पंचगंगा घाट पर आकर गंगा स्नान कर ध्यान किया, यह बात जब राजा दिवोदास को पता चला तो उन्होंने देवताओं के प्रवेश प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया। इस दिन सभी देवताओं ने काशी में प्रवेश कर दीप जलाकर दीपावली मनाई थी।

आलेख

पं मनोज शुक्ला
महामाया, मंदिर, रायपुर

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