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छत्तीसगढ़ में ब्रह्मा उपासना

भारतीय धार्मिक पृष्ठभूमि में त्रिदेवों का महत्वपूर्ण स्थान है। जिसमें ब्रह्मा को सृष्टी का सृजनकर्ता माना गया है। त्रिदेवों में सम्मिलित होने के बाद भी ब्रह्मा को वह लोकप्रियता नहीं प्राप्त हुई जो विष्णु एवं महेश की है। इसलिए ऐसी संभावनाएं व्यक्त की गई है की ब्रह्मा का अपना कोई स्वतंत्र समुदाय नहीं हुआ।

पद्मपुराण तथा भागवत् पुराण में भूगु द्वारा ब्रह्मा को सम्पूर्ण संसार में अपूज्य होने के लिए शाप दिया गया है। ब्रह्मा का एक मात्र मंदिर राजस्थान के पुष्कर में स्थित है। ब्रह्मा को सदैव ऋषि के रूप में जटायुक्त चतुर्भुजी, चतुर्मुखी बनाया जाता है। उनका चौथा मुख पीछे की ओर अदृश्य होता है। इनका एक हाथ अभय मुद्रा में तथा शेष अन्य हाथों में रूद्राक्ष की माला, पुस्तक एवं कमण्डलु स्थित होता है।

हिन्दू त्रिमूर्ति में ब्रह्मा का प्रथम स्थान माना गया है। ‘पुराणों में उल्लेखित है कि ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण करते वक्त पहले प्रजापति का सर्जन किया फिर बाद में अपने मानस पुत्रों को प्रजा के निर्माण करने के लिए आदेशित किया। इसलिए उन्हें प्रजापति भी कहा गया है। सृष्टिकर्ता होने के कारण ब्रह्मा को पितामह भी कहा जाता है। ब्रह्मा ने सतरूपा, सावित्री, सरस्वती और ब्रह्माणी के रूप-दर्शन हेतु चारों ओर मुख और पांचवां मुख ऊपर धारण किया।

प्राचीन काल में भारत में ब्रह्मा की पूजा होने के अनेक प्रमाण प्राप्त होते है। ब्रह्मा के बारे में जानकारी स्वतंत्र प्रतिमाओं, मंदिरों के साथ – साथ अभिलेखों से भी प्राप्त होती है। इसी तरह हमें छत्तीसगढ़ में भी ब्रह्मा की अनेक स्वतंत्र और मंदिरों में उत्कीर्ण प्रतिमाएं प्राप्त होती हैं। ब्रह्मा की प्रतिमाएं प्रायः द्विभुजी, चतुर्भुजी एवं चार मुखों वाली होती है। ब्रह्मा की प्रत्तिमा शिव-पार्वती के विवाह में पुरोहित के रूप में, विष्णु की शेषशायी प्रतिमा में उनके नाभि से निकले कमल पर आसनस्थ एवं त्रिदेवों के रूप में प्राप्त होती है।

पद्मपुराण तथा भागवत् पुराण में भृगु द्वारा ब्रह्मा को सम्पूर्ण संसार में अपूज्य होने के लिए शाप दिया गया है। ब्रह्मा का एक मात्र मंदिर राजस्थान के पुष्कर में स्थित है। ब्रह्मा को सदैव ऋषि के रूप में जटायुक्त चतुर्भुजी, चतुर्मुखी बनाया जाता है। उनका चौथा मुख पीछे की ओर अदृश्य होता है। इनका एक हाथ अभय मुद्रा में तथा शेष अन्य हाथों में रूद्राक्ष की माला, पुस्तक एवं कमण्डलु स्थित होता है।

छत्तीसगढ़ में शिल्प के साथ-साथ ब्रह्मा का वर्णन यहां से प्राप्त होने वाले अभिलेखों में भी हुआ है।भवदत्त वर्मा के ऋद्धिपुर ताम्रपत्र’ में प्रजापति का उल्लेख हुआ है। जिसका अर्थ ब्रह्मदेव से लिया गया है। स्कन्द वर्मा के पोरागढ़ अभिलेख’ में ब्रह्मा का उल्लेख “पुरूष” रूप में किया गया है। इसी तरह कलचुरि कालीन बहुत से अभिलेखों में ब्रह्मा का उल्लेख हुआ है। पृथ्वीदेव प्रथम के आमोदा ताम्रपत्र’ लेख (कलचुरि संवत् 831), पृथ्वीदेव द्वितीय के घोटिया ताम्रपत्र लेख’ एवं पृथ्वीदेव द्वितीय के बिलाईगढ़ ताम्रपत्र लेख” (कलचुरि संवत 890) में अभिलेखों का प्रारंभ ब्रह्मा की उपासना से किया गया है।

जाजल्लदेव द्वितीय के अमोदा ताम्रपत्र लेख तथा प्रतापमल्ल के बिलईगढ़ ताम्रपत्र लेख में ब्रह्मा के निर्गुण, व्यापक, शिव, नित्य, संसार के परम-ज्योति, परम कारण तथा भाव ग्राह्य आदि रूपों की चर्चा की गई है। गोपालदेव के पुजारीपाली अभिलेख” का आरम्भ ब्रह्मा, विष्णु और महेश की वंदना द्वारा, त्रिदेवों के रूप में एक साथ की गई है।

ब्रह्मा की प्रतिमाएं, छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों से प्राप्त हुई है, जैसे मल्हार के केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के स्थल संग्रहालय में ब्रह्मा की प्रतिमा स्थापित है जिसका निर्माण काल सातवी-आठवी शताब्दी ईसवी है। खरोद के इन्दलदेव मंदिर में द्वार शाखा के सिरदल के दाएं तरफ त्रिमुखी ब्रह्मा का अंकन हुआ है, जो हंसारूढ़ है। इसका निर्माण काल सातवी शताब्दी ईसवी माना गया है।

सिरपुर से भी ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश की प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। त्रिमुखी ब्रह्मा की एक प्रतिमा राजिम स्थित मंदिर पर भी उत्कीर्ण है। रायपुर स्थित मठपुरैना में तालाब किनारे स्थित शिव मंदिर के अंदर भी ब्रह्मा की पद्मासन मुद्रा में एक आकर्षक स्वतंत्र प्रतिमा स्थित है, जिसका निर्माण काल सातवी – आठवीं शताब्दी ईसवी माना गया है।

मठपुरैना, रायपुर से प्राप्त
ब्रह्मा की प्रतिमा

इसी तरह सिद्धेश्वर मंदिर पलारी की द्वार शाखा में द्विभुजी ब्रह्मा, तीन हंसों पर आरूढ़ हुए अंकित है। अडभार के शिव मंदिर की द्वार शाखा के ऊपर त्रिदेव रूप में ब्रह्मा अंकित है। महादेव मंदिर पाली के द्वार शाखा के सिरदल में दाएं ओर ब्रह्मा की प्रतिमा अंकित है।” केन्द्रीय पुरातत्व संग्रहालय तुम्माण में ब्रह्मा की प्रस्तर निर्मित दसवी शताब्दी ईसवी की प्रतिमा स्थित है।

राजिम से प्राप्त ब्रह्मा की प्रतिमा

इसी तरह शास्त्र-सम्मत निर्मित ब्रह्मा की प्रतिमाएं डीपाडीह और बेलसर से भी प्राप्त हुई है। बंकेश्वर मंदिर तुम्माण के प्रवेश द्वार में चतुर्भुजी ब्रह्मा की प्रतिमा उत्कीर्ण है। इस मंदिर परिसर के संग्रहालय में भी ब्रह्मा की प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा का काल दसवीं – ग्यारहवीं शताब्दी ईसवी माना गया है।

डीपाडिह से प्राप्त ब्रह्मा की प्रतिमा

सिलीपचराही उत्खनन में परिक्षेत्र क्रमांक-3 से ब्रह्मा की प्रतिमा प्राप्त हुई है। शिव मंदिर घटियारी में द्वार शाखा के सिरदल पर चतुर्भुजी ब्रह्मा का अंकन हुआ है। इसका निर्माण काल आठवी-नवमी शताब्दी ईसवी है।” शिवरीनारायण में अवस्थित केशव नारायण मंदिर की द्वार शाखा के मध्य में चतुर्भुजी ब्रह्मा की प्रतिमा अंकित है। इसका निर्माण काल दसवी शताब्दी ईसवी माना गया है।धमतरी जिले में शिव मंदिर देवखूट के परिसर में ब्रह्मा की प्रतिमा स्थित है जिसका निर्माण काल ग्यारहवी शताब्दी ईसवी है।

बेलसर से प्राप्त
ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश की प्रतिमाएं

इसी तरह ब्रह्मा का अंकन जांजगीर के विष्णु मंदिर की द्वार शाखा के सिरदल में हुआ है। बिलासपुर जिले में सरगांव स्थित धूमनाथ मंदिर में निचले पंक्ति मे त्रिसिर युक्त चतुर्भुजी ब्रह्मा का अंकन हुआ है। इस मंदिर का निर्माण तेरहवी शताब्दी ईसवी के पूर्वार्ध में माना गया है। शिव मंदिर नगपुरा के दक्षिणी जंघा भाग के भित्ति में ब्रह्मा की चतुर्भुजी प्रतिमा स्थित है। यह प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में स्थित है। जिसके चारों हाथों में त्रिशूल, अक्षमाला, वेद तथा एक हाथ में कमण्डलु धारण किए प्रदर्शित है। इस मंदिर के द्वार शाखा के ऊपरी सिरदल में दाएं तरफ चतुर्भुजी ब्रह्मा की एक अन्य प्रतिमा अंकित है। यह प्रतिमा भी जांजगीर मंदिर के समकालीन है।

छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला में ब्रह्मा अधिकांश जगह त्रिदेवों के रूप में प्राप्त हुए हैं परन्तु ब्रह्मा की स्वतंत्र प्रतिमाओं का अंकन इस अंचल में बहुत कम हुआ है। अभिलेखों एवं प्रतिमाओं में दृष्टव्य होने वाले विकासक्रम से ज्ञात होता है कि तत्कालीन युग में अन्य देवताओं की तरह ही ब्रह्मा की लोकप्रियता भी छत्तीसगढ़ अंचल में समान रूप से रही है।

संदर्भ ग्रंथ –

1.बनर्जी, जे. एन., द डेवलपमेन्ट ऑफ हिन्दू आइक्नोग्राफी, तृतीय संस्करण, मुंशीराम मनोहरलाल प्रकाशन, नई        दिल्ली, 1974.

2. ऋग्वेद, 10, 121, शतपथ ब्राह्मण

3. पद्मपुराण, उत्तर खण्ड, अध्याय 282.

4. एपिग्राफिया इंडिका, भाग-19.

5. जैन, बालचन्द्र, उत्कीर्ण लेख, संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व, छत्तीसगढ़, रायपुर, 2005.

6. वर्मा, कामता प्रसाद, छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला (मध्य छत्तीसगढ़ के विशेष संदर्भ में), संचालनालय, संस्कृति एवं पुरातत्व, छत्तीसगढ़, रायपुर, 2014.

7. बेगलर, जे. डी., 1878, कनिंघम ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट, बॉल्यूम 7, रिपोर्ट ऑफ अ टूर ऑफ बुन्देलखण्ड एण्ड मालवा, 1871-72, एण्ड इन द सेन्ट्रल प्रोविंसेज 1873-74, कलकत्ता.

 

आलेख

डॉ. शुभ्रा रजक तिवारी
संपादक – दक्षिण कोसल टुडे

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